समर्थक

मंगलवार, फ़रवरी 08, 2011

आजमगढ़ से आ रही है तुलसी की महक

भारतीय जनमानस की आस्था का केन्द्र मानी जाने वाली तुलसी अब आंगन की बजाय खेतों में लहलहा रही है। आजमगढ़ में जब तुलसी उगाने का विचार रखा गया तो किसानों को पहले-पहल अजीब लगा और किसी ने इसकी खेती करने के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

लेकिन जीवन के 87वें साल की दहलीज पर खड़े कैलाशनाथ सिंह ने आर्गेनिक इंडिया के प्रस्ताव पर विश्वास जताते हुए तुलसी की खेती को लेकर अपनी सहमती दे दी। बकौल कैलाशनाथ-``जब मैने फर्म की पद्धति को देखा तो मेरा संदेह विश्वास में परिवर्तित हो गया।´´ इस तरह एक वयोवृद्ध द्वारा दिखाए गया साहस बेहतर लाभांश दे रहा है। यही नहीं कैलाशनाथ की आय में बढ़ोत्तरी को देख अन्य किसानों भी उनका अनुसरण करने लगे हैं। आज पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों आजमगढ़, मऊ और सुल्तानपुर के अलावा सूखे की मार झेल चुके बुंदेलखंड के हजारों किसानों ने परंपरागत फसलों के साथ साथ नकदी फसल के रूप में तुलसी की खेती शुरु कर दी है। यहां करीब दो से ढाई हजार एकड़ जमीन में सालाना 2,000 टन से भी अधिक तुलसी का उत्पादन हो रहा है।

उल्ललेखनीय है कि आतंकवादियों की नर्सरी कहे जाने वाले आजमगढ़ में तुलसी की व्यावसायिक खेती से स्थानीय किसानों ने सफलता की एक नई कहानी का सूत्रपात किया है, जिससे किसानों के जीवन में प्रभावकारी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। कुछ समय पहले तक आजमगढ़ में धान और गेहूं की परंपरागत फसले पैदा की जाती रही हैं। लेकिन बेहतर मुनाफे के चलते रबी और खरीफ की परंपरागत फसलों के साथ साथ अब तुलसी की खेती पर स्थानीय लोगों की निर्भरता बढ़ती जा रही है।

आजमगढ़ राजनीतिक रूप से भले ही मजबूत रहा हो, लेकिन उद्योग धंधों की दृष्टि से पिछड़े इस क्षेत्र का अधिकतर कृषि क्षेत्र ऊसर है। किसानों के लिए कैश क्रॉप के रूप में पैदा होने वाले गन्ने की पैदावार में भी निरंतर कमी आई है, जिसके चलते यहां बची-खुची एक चीनी मिल को भी नहीं बचाया जा सका। लेकिन तुलसी की खेती ने स्थानीय लोगों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन किये हैं। बदलाव की कहानी आज़मगढ़ शहर से लगे कुम्हेपुर गांव से शुरु होती हैं। कुम्हेपुर में पैदा हुए डॉ. नरेन्द्र सिंह ने तुलसी के गुण, प्रभाव, उपयोग और इसकी मािर्कट वैल्यु को ध्यान में रखकर अध्ययन किया और अपने पैतृक गांव को ही इसकी प्रयोगशाला बनाया। वर्ष 2000 में कुम्हेपुर में डॉ. नरेन्द्र सिंह ने अपने ही खेतों में तुलसी की खेती शुरु कर दी। शुरुआती तीन वर्ष तो खेतों को रसायनिक खाद के दुष्प्रभाव से मुक्त करने में ही लग गए। इसके बाद वहां तुलसी के की जैविक पद्धति से खेती शुरु की गई। तुलसी की खेती के पीछे इस क्षेत्र के गरीब किसानों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने का उद्देश्य निहित था। कुछ समय बाद प्रयास रंग लाने लगा और करीब 6 साल के बाद कुम्हेपुर गांव में आरंभ हुई तुलसी की खेती आसपास के 13 गांवों में 700 एकड़ से अधिक क्षेत्र में की जा रही है और इससे यहां के किसान एक करोड़ रुपये तक सालाना कारोबार कर रहे हैं। जिसके कारण अन्य किसानों में भी तुलसी की खेती को लेकर रुचि बढ़ रही है।

कैलाशनाथ की सफलता के बाद किसानों को तुलसी की खेती के लिए राजी करना मुश्किल नहीं रह गया। लखनऊ स्थित संस्था `आर्गेनिक इंडिया´ ने जब उत्पादन लागत एवं फसल उत्पादन में जोखिम वहन करने की घोषणा कर दी तो काम और भी आसान हो गया। स्थानीय बाजार में तुलसी की कीमत 10 से 15 रुपये किलो बताई जाती है, जबकि आर्गेनिक इंडिया 80 से 90 रुपये देकर किसानों से तुलसी खरीदने लगी। संस्था के सीईओ एवं प्रबंध निदेशक कृष्ण गुप्ता आर्गेनिक इंडिया के लिए भी इसे फायदे का सौदा बताते हैं। वे कहते हैं कि-``जो तुलसी ये किसान पैदा कर रहे हैं, वह पूर्णत: आर्गेनिक होती है, जिसके चलते अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसके बेहतर दाम मिल जाते हैं। यही नहीं रसायनिक खाद का उपयोग ना होने से उत्पादन लागत भी सस्ती है।´´ गुप्ता के मुताबिक किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए सिरदर्दी भी मोल नहीं लेनी पड़ती और समस्त उत्पाद संस्था द्वारा खरीद लिया जाता है। जनवरी से जून के फसल सीजन के दौरान अच्छी पैदावार के लिए कंपनी किसानों की मदद हेतु फील्ड एवं टेक्नीकल मैनेजर तैनात करती है। डॉ. नरेन्द्र और भारत मित्रा ने मिलकर `आर्गेनिक इंडिया फांउडेशन´ नाम की संस्था गठित की और आजमगढ़ में ही अमेरिकी पद्धति से एक छोटा सा उद्योग लगाया, जिसमें जैविक खेती से उत्पादित तुलसी चाय के रूप में प्रयोग किया, जो आज अनेक प्रकार की गंभीर बीमारियों में दवा के रूप में प्रयोग की जा रही है। अब यहां के किसान तुलसी की तीन प्रजातियों रामा तुलसी, श्यामा तुलसी तथा वन तुलसी की खेती करते हैं। तुलसी की ये तीनों प्रजातियां अलग-अलग रंगों में होती हैं।

बकौल डॉ. नरेन्द्र सिंह-``पूरे देश के किसान अधिक अनाज उत्पादन के लिए रसायनिक खादों का प्रयोग करते हैं, जिसके कारण खेत की मिट्टी की उर्वराशक्ति दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही और उत्पादित होने अनाज के सेवन से लोग हृदय एवं रक्त संबंधी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। लगातार कम होती मिट्टी की ताकत से भविष्य में अनाज का उत्पादन मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में अब जैविक खेती ही एकमात्र रास्ता है, जिसे अपनाकर किसान इन गंभीर परिणामों से मुक्त रह सकते हैं। अब किसान तुलसी के अलावा मटर, गेहूं, चना, अदरक, हल्दी जैसी चीजों की खेती कर रहे हैं और बिना रसायनिक खादों का उपयोग किए भरपूर उत्पादन प्राप्त कर हैं।´´

हालांकि अब कई स्थानों पर तुलसी की खेती हो रही है, लेकिन इसकी शुरुआत का श्रेय आजमगढ़ को ही जाता है। यहां की जैविक खेती से उत्पादित तुलसी अमेरिका, जर्मनी, जापान, स्विट्जरलैंड समेत दुनिया के अनेक देशों में भेजी जा रही है। आजमगढ़ की तर्ज पर उत्तरप्रदेश के ही सुल्तानपुर जिले के किसानों ने भी तुलसी की खेती को अपनाया है। गोसाईगंज के शहादतपुर गांव के शरद वर्मा, जामो के रामयज्ञ यादव, गौरीगंज विकासखंड के पजेहरी निवासी रणंजय सिंह ने धान एवं गेहूं के साथ साथ तुलसी की खेती भी आरंभ कर दी है। विभिन्न योजनाओं के जरिये तुलसी की खेती को बढ़ावा देने के लिए अब सरकार भी विभिन्न कार्यक्रम शुरु कर रही है। कृषि, उद्यान एवं कृषि प्रसार विभाग भी तुलसी की खेती को बढ़ावा देने के लिए काम करेंगे, जिसके अन्र्तगत चुनिंदा किसानों को प्रशिक्षित करके उन्हें मॉडल खेती हेतु तैयार किया जायेगा। किसानों को बाजार उपलब्ध हो इसकी भी योजना बनाई जा रही है।

फरवरी के आखिरी दिनों में नर्सरी तैयार करने साथ तुलसी की फसल उपजाने की कोशिश शुरु हो जाती है। अप्रैल आते आते इनका खेतों में पौध रोपण आरंभ हो जाता है।एक हेक्टेयर में तुलसी के रोपण के लिए ढाई सौ ग्राम बीज काफी माना जाता है। करीब बारह दिनों में बीज उग आते हैं और छह सप्ताह में पौध तैयार हो जाती है। भारत में आमतौर पर दो तरह की तुलसी उगाई जाती है। इनमें से एक `इंडियन बेसिल´ है तो दूसरी का नाम पूसा बेसिल है। इंडियन बेसिल की खेती तेल उत्पादन के लिए होती है। इस तेल का उपयोग देश विदेश की की फ्लेवर एवं सुगंधी निर्माता औद्योगिक इकाइयों में होता है। इसके अलावा तुलसी के अनेक औषधीय गुण हैं, जिसके चलते इसकी मांग काफी है। तुलसी के पौधों की डाल व तनों से भी तमाम औषधियां, माला एवं धार्मिक वस्तुएं निर्मित होती हैं। इंडियन बेसिल प्रजाति की तुलसी कम समय में तैयार होने वाली फसल मानी जाती है। विभिन्न जलवायु की दशाओं में यह करीब 75 से 80 दिन में तैयार हो जाती है, जिससे 15 से 20 हजार रुपये की कीमत का करीब 50 किलोग्राम तेल प्राप्त किया जा सकता है। दूसरी ओर पूसा बेसिल के पत्तों का उपयोग दवाइयों एवं हर्बल चाय के लिए होता है। बहरहाल संशय की स्थिति से बचने के लिए उत्पादन शुरु करने से पूर्व इसके बाजार एवं उत्पादन प्रक्रिया की पर्याप्त जानकारी जुटा लेना बेहतर होगा।

(उमाशंकर मिश्र)

साभार : विस्फोट.काम