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मंगलवार, फ़रवरी 22, 2011

आजमगढ़ : और भी पहचान है मेरी .....

1974 के मार्च महीने की एक तारीख...पटना जाने वाली तमाम रेलगाड़ियां निरस्त कर दी गई हैं। 18 मार्च 1974 को नौजवानों ने पटना विधानसभा के घेराव का ऐलान कर रखा है। इसकी अगुआई जेपी को करनी है। घेराव को नाकामयाब बनाने के लिए बिहार के साथ ही केंद्र सरकार भी जुट गई है। इस घेराव में तब का एक क्रांतिकारी समाजवादी नेता भी शामिल होने को तैयार है। किसी तरह वाराणसी पहुंच गया है। रेलगाड़ियां बंद कर दी गई हैं। इसी बीच पता चलता है कि कोई रेलगाड़ी मुगलसराय होते हुए पटना जा रही है। क्रांतिकारी नेता पर पुलिस की निगाह है। उसके गिरफ्तार होने का खतरा है। लिहाजा काशीहिंदू विश्वविद्यालय के कुछ छात्र नेता रणनीति बनाते हैं। तय होता है कि ये नेता बुनकर के तौर पर जाएगा। लुंगी कुर्ता और गोलटोपी पहने कुछ लोगों का एक ग्रुप वाराणसी के काशी स्टेशन पर पहुंचता है। पुलिस होने के बावजूद ये नेता अपने हाथों बुनी साड़ियों का बंडल लिए ट्रेन में सवार हो जाता है।
18 मार्च 1974 को पटना में जो हुआ – अब इतिहास है। इसी घेराव में इनकम टैक्स चौराहे पर जेपी पर पुलिस ने जमकर लाठियां बरसाईं। इन लाठियों की धमक इतनी दूर तक सुनाई दी कि इंदिरा गांधी की सर्वशक्तिमान सरकार हिल गई। यहां अब बता देना जरूरी है कि बुनकर के भेष में पटना गए वे नेता थे जार्ज फर्नांडिस और उन्हें स्टेशन पर चढ़ाने आए थे आज के कांग्रेस के प्रवक्ता मोहन प्रकाश। जो तब बीएचयू छात्रसंघ के प्रभावी नेता थे। जिन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश की खाक छानी है – उन्हें पता है कि आजमगढ़ से लेकर मऊ तक पहले हथकरघे का जाल बिछा हुआ था। गांव-गांव में दरी, चादर और गमछे के साथ ही बनारसी साड़ियां बुनीं जाती थीं। इन्हें लेकर एक खास ड्रेस में लोग गांव-गांव बेचने के लिए निकलते थे। तब उन पर कोई सवाल नहीं उठाता था। लेकिन इसी आजमगढ़ के सरायमीर के अबू सलेम की अपराध की दुनिया में चर्चा क्या बढ़ी – पूरा आजमगढ़ अपराधियों और आतंकवाद का गढ़ नजर आने लगा है।
लेकिन आजमगढ़ की यही पहचान नहीं है। आज राष्ट्रीय क्षितिज पर जब भी हिंदू-मुस्लिम समभाव की बात की जाती है – इस्लाम के विद्वान के तौर पर मौलाना वहीदुद्दीन खान के बिना पूरी नहीं होती। वे वहीदुद्दीन साहब भी इसी आजमगढ़ में पले – बढ़े हैं। कैफी आजमी ने उर्दू शायरी की दुनिया में जो नए प्रतिमान खड़े किए, सिनेमा के गीतों को नया अंदाज दिया – वे इसी आजमगढ़ के मेजवां से निकले थे। चंद सिरफिरों के चलते आज आजमगढ़ की एक पूरी पीढ़ी को देशद्रोही और आतंकवादी का तमगा दिया जा रहा है – ऐसे लोगों को जानकर हैरत होगी कि कैफी आजमी ने अपनी जिंदगी के आखिरी साल अपनी माटी – अपनी हवा के बीच मेजवां में ही गुजारे। जबकि देश के सपनीले शहर मुंबई में उनके पास जिंदगी के वे सारे साजोसामान मौजूद थे – जिसकी खोज में आज हर कोई हलकान हुए जा रहा है। और एक बार हासिल होते ही वह अपनी माटी की महक को भूल जाना चाहता है। कैफी उन लोगों में से नहीं थे।
आज हैरी पोटर की लेखिका जेके रॉलिंग की दुनिया में खासी चर्चा है। बच्चों की लेखिका के तौर पर विख्यात रॉलिंग को जानने वालों की कमी नहीं है। लेकिन कितने लोगों को सनीमासीन खान का नाम पता है। बच्चों के लेखक के तौर पर दुनिया भर में विख्यात इस लेखक की कृतियां मलय, पश्तो, अरबी से लेकर तमाम पश्चिमी भाषाओं में हो चुका है। मुस्लिम बहुल जनसंख्या वाला शायद ही कोई देश हो – जहां खान की किताबों की प्रदर्शनी ना लगी हो।
आजमगढ़ की स्थापना 1665 में एक दबंग जमींदार आजमखान ने की थी। दिलचस्प बात ये है कि यह एक हिंदू जमींदार की मुस्लिम पत्नी का बेटा था। इतिहासकारों के मुताबिक विक्रमजीत गौतम राजपूत था। मेहनगर की मुस्लिम पत्नी से उसके दो बच्चे थे। दूसरे बच्चे अजमत ने किला बनाया। जो आज भी आजमगढ़ में अजमत के किले के तौर पर विख्यात है। हिंदू पिता और मुस्लिम पत्नी की संतान आजमगढ़ में दंगों का कोई गहरा इतिहास नहीं रहा है। दोनों परिवारों का ही संस्कार था कि यहां गंगजमुनी संस्कृति की धारा लगातार बहती रही। आजमगढ़ में राष्ट्रवाद किस कदर हिलोरें ले रहा था – इसकी मिसाल 1857 का संग्राम भी है। आजमगढ़ की धरती पर ही वीर कुंवर सिंह ने अंग्रेजों के दांत खट्टे किए थे। इसी दौर में यहां एक बड़े इस्लामिक विद्वान शिबली नोमानी ने यहां की धरती के जरिए इस्लामिक दुनिया में अमिट छाप छोड़ी। सर सैय्यद अहमद खां के कभी सहयोगी रहे शिबली नोमानी इतिहास, इस्लाम, दर्शन और सूफीवाद के मशहूर मर्मज्ञ थे। उन्होंने मक्का तक हज की यात्रा की और मोहम्मद साहब से जुड़ी चीजों का संग्रह किया। इसे वे भले ही नहीं लिख पाए – लेकिन बाद में उनके उत्तराधिकारी सैय्यद सुलेमान नदवी ने लिखा। जिसे इस्लाम की दुनिया में आज भी खासे आदर के साथ लिया जाता है। शिबली के योगदान को आजमगढ़ ने आज भी शिबली कॉलेज के रूप में शिद्दत से याद रखा है। आजमगढ़ में उच्च शिक्षा के इस अहम केंद्र में ना सिर्फ मुस्लिम – बल्कि हिंदू छात्र भी अपना भविष्य संवारने का काम कर रहे हैं। शिबली की ही देन है कि आजमगढ़ कभी शिया शिक्षा का अहम केंद्र हुआ करता था। यहां दुनिया भर से लोग इस्लाम की शिया तहजीब का अध्ययन करने आते थे। इस धरती ने अमीन अहसान इस्लाही और जफरूल इस्लाम जैसे इस्लाम के जाने-माने विद्वान भी पैदा किए हैं तो इतिहासकारों की पंक्ति में आदर के साथ लिया जाने वाला नाम इश्तियाक अहमद जिल्दी भी यहीं के हैं और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं। इसी धरती के सपूत सम्सुर्रहमान फारूकी को भी भूलना कठिन है।
13 सितंबर के दिल्ली बम धमाकों के बाद आजमगढ़ एक बार फिर पूरी दुनिया की नजर में आ गया है। पिछले कुछ साल से आजमगढ़ की पहचान के प्रतीक बने हैं माफिया सरगना अबू सलेम। जयपुर और अहमदाबाद धमाके के मास्टरमाइंड के तौर पर जब से अबू बशर की गिरफ्तारी हुई है – पहचान की ये धारा और पुख्ता हुई। रही- सही कसर 13 सितंबर के धमाके में मारे गए आतिफ और साजिद के साथ ही सैफ की गिरफ्तारी ने पूरी कर दी है। इसके बाद आजमगढ़ को सिर्फ और सिर्फ आतंकवादियों के गढ़ के तौर पर पहचान दी गई है। यहां के ब्लैक पॉट्री नाम से दुनियाभर में मशहूर उर्दू पुस्तकालय के उल्लेख के बिना तो ये चर्चा अधूरी रहेगी। माना जाता है कि उर्दू अदीब की दुनिया में इस पुस्तकालय को काफी आदर के साथ देखा जाता है।
हिंदी के पहले महाकाव्य रचयिता अयोध्या सिंह उपाध्याय ’हरिऔध’ का नाम तो सभी जानते हैं। लेकिन इसी धरती के श्यामनारायण पांडे थे – जिन्होंने महाराणा प्रताप और अकबर के युद्ध को विषय बनाकर हल्दीघाटी नामक खंडकाव्य लिखा। राणा प्रताप के घोड़े चेतक का जो वर्णन उन्होंने किया है – उसे पढ़कर आज भी रोमांच हो जाता है। आजमगढ़ के मेंहनगर के विसहम में दाऊद इब्राहिम की रिश्तेदारी की जमकर चर्चा हो रही है। हाजी मस्तान की रिश्तेदारी को लेकर भी आजमगढ़ चर्चा में है। लेकिन लोग ये भूल गए हैं कि इसी जिले में हरिहरपुर नाम का एक ब्राह्मणबहुल गांव है – जहां तबला सम्राट गुदई महाराज की ससुराल थी। दूसरे तबला उस्ताद किशन महाराज और ठुमरी की विख्यात गायिका गिरिजा देवी की भी रिश्तेदारी इस गांव में है। आजमगढ़ में कला और संस्कृति की ये धारा ही रही है कि लोग फिल्म और टेलीविजन की दुनिया में भी जमकर नाम और दाम कमा रहे हैं। जीटीवी के मशहूर रियलिटी शो सारेगामापा के प्रोड्यूसर गजेंद्र सिंह और फिल्म निर्देशक राजेश सिंह भी इसी धरती के वासी हैं। राहुल सांकृत्यायन इसी जिले के पंदह के निवासी थे। जिनके दर्शन-दिग्दर्शन का लोहा पूरी दुनिया ने माना।
टाटा की नैनो कार को लेकर उत्सुकता अभी थमी नहीं है। पश्चिम बंगाल के सिंगूर से लेकर उत्तरांचल के पंतनगर तक इस कार की चर्चा है। लेकिन कितने लोगों को पता है कि आजमगढ़ के सत्रह साल के एक बच्चे चंदन ने दो सीटों वाली कार पहले ही बना ली है। जो एक लीटर पेट्रोल में चालीस किलोमीटर तक चल सकती है।
आजमगढ़ की इस गड्डमड्ड होती पहचान पर सबसे बेहतरीन टिप्पणी आतंकवाद से लोहा लेते रहे बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह की है। प्रकाश सिंह इसी धरती के बेटे हैं। उनका कहना है कि सरायमीर, निजामाबाद, खैराबाद, मुबारकपुर, बिलरियागंज, मोहम्मद खान और अतरौलिया से हजारों बच्चे दिल्ली, मुंबई, अलीगढ़, हैदराबाद और लखनऊ में पढ़ाई के साथ ही रोजी-रोजगार के लिए गए हैं। देश विरोधी ताकतें उन्हें बहका सकती हैं। लेकिन इसका माकूल जवाब इस पूरे इलाके को बदनाम करने की बजाय ऐसे मुकम्मल इंतजाम होने चाहिए – ताकि यहां के बच्चे बहकावे में आकर देशविरोधी ताकतों के हाथों का खिलौना ना बनें।
ये काम आजमगढ़ की मूल पहचान को बिगाड़कर तो नहीं ही किया जाना चाहिए। अन्यथा इससे जो नुकसान होगा – उसकी तासीर दूर और देर तक महसूस की जाती रहेगी।

साभार : उमेश चतुर्वेदी, balliabole

शुक्रवार, फ़रवरी 18, 2011

कृष्ण कुमार यादव को डा0 अम्बेडकर राष्ट्रीय फेलोशिप अवार्ड-2010

(कृष्ण कुमार यादव जी की रचनाधर्मिता बहुतेरे दिखती रहती है. समकालीन साहित्य में उभरते हुए वे एक सशक्त हस्ताक्षर हैं. मूलत: आजमगढ़ जिले के निवासी के.के. यादव जी वर्तमान में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं. अंडमान में रहते हुए भी हिंदी साहित्य के प्रति उनकी निष्ठा अटूट है. उन्हें यह भी गौरव प्राप्त है कि जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर आजमगढ़ के छात्र के रूप में उन्होंने ना सिर्फ प्रथम प्रयास में IAS जैसी कठिन परीक्षा पास की अपितु इन सेवाओं में चयनित वे पूरे भारत में प्रथम नवोदयी छात्र भी हैं. प्रशासन और साहित्य में सामानांतर स्थान रखने वाले युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव जी को हाल ही में भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने अपने रजत जयंती वर्ष में ‘’डा. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2010‘‘ से सम्मानित किया है। श्री यादव को यह सम्मान साहित्य सेवा एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान के लिए प्रदान किया गया है। इस सम्मान पर कृष्ण कुमार यादव जी को हार्दिक शुभकामनायें. आप यूँ ही सृजन कर्म में प्रवृत्त हों और प्रशासन के साथ-साथ साहित्य एवं ब्लॉग जगत को नए आयाम दें.)

सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय 33 वर्षीय श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य संग्रह), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह), अनुभूतियां और विमर्श (निबन्ध संग्रह) और इण्डिया पोस्टः 150 ग्लोरियस ईयर्स, क्रान्ति यज्ञः 1857 से 1947 की गाथा प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डाॅ0 राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुफ्तगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। शोधार्थियों हेतु आपके जीवन पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव‘‘ ( स0 डा0 दुर्गाचरण मिश्र) भी प्रकाशित हुई है। श्री यादव की रचनायें पचास से ज्यादा संकलनों में उपस्थिति दर्ज करा रहीं हैं और आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर और पोर्टब्लेयर से भी उनकी रचनाएँ और वार्ता प्रसारित हो चुके हैं. श्री कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ‘शब्द सृजन की ओर‘ और ‘डाकिया डाक लाया‘ नामक उनके ब्लॉग चर्चित हैं।

ऐसे विलक्षण व सशक्त, सारस्वत सुषमा के संवाहक श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्वे विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान -2009‘‘, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा काव्य शिरोमणि-2009 एवं महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, मध्य प्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी, प्रतापगढ द्वारा '' विवेकानंद सम्मान'' , महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ''महिमा साहित्य भूषण सम्मान'' नगर निगम डिग्री कालेज, अमीनाबाद, लखनऊ द्वारा ‘‘सोहनलाल द्विवेदी सम्मान‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘ व ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानोपाधि संस्थान, कुशीनगर द्वारा ‘‘राष्ट्रभाषा आचार्य‘‘ व ‘‘काव्य गौरव‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, दृष्टि संस्था, गुना द्वारा ‘‘अभिव्यक्ति सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘‘ब्रज गौरव‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘, खानाकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती, ठाणे द्वारा ‘‘साहित्य विद्यावाचस्पति‘‘, उत्तराखण्ड की साहित्यिक संस्था देवभूमि साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, सृजनदीप कला मंच पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘सृजनदीप सम्मान‘‘, मानस मण्डल कानपुर द्वारा ‘‘मानस मण्डल विशिष्ट सम्मान‘‘, नवयुग पत्रकार विकास एसोसियेशन, लखनऊ द्वारा ‘‘साहित्यकार रत्न‘‘, महिमा प्रकाशन छत्तीसगढ़ द्वारा ‘‘महिमा साहित्य सम्मान‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘ व ’’अक्षर शिल्पी सम्मान’’, न्यू ऋतम्भरा साहित्यिक मंच, दुर्ग द्वारा ‘‘ न्यू ऋतम्भरा विश्व शांति अलंकरण‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना (म0प्र0) द्वारा ’’अक्षर शिल्पी सम्मान-2010’’ , साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ''हिंदी भाषा भूषण-2010'' इत्यादि तमाम सम्मानों से अलंकृत किया गया है। ऐसे युवा प्रशासक एवं साहित्य मनीषी कृष्ण कुमार यादव को बधाईयाँ।

बुधवार, फ़रवरी 16, 2011

आज़मगढ़! बहुत बदल गया यह शहर...

आज़मगढ़! बहुत बदल गया यह शहर. हमारे बचपन मे यह हरा-भरा और खूबसूरत शहर हुआ करता था. पर आज़कल इस शहर में भीड़ बढ़ती जा रही है.जब भी घर जाता हूं, इसे और भी शोरगुल और भीड़ से भरा हुआ पाता हूं. इस बार जब रिक्शे पर बैठकर स्टेशन से घर की ओर चला, तो सड़क पर कुछ ज्यादा ही शोरगुल दिखा.टौंस पर बने पुल पर नए किस्म की लाइटें लगी हुई थीं. उस बड़े से मैदान जो अग्रेज़ो के ज़माने में पोलो ग्राउड हुआ करता था, में चल रहा आज़मगढ़ महोत्सव समाप्त हो चुका था. गिरजाघर चौराहा का नाम अब न्याय चौराहा हो चुका था. आज़मगढ़ महोत्सव इस बार काफ़ी भव्य रहा और हंगामेखेज भी. विवेकानंद की तस्वीर स्टेज पर रखने और स्कूली बच्चों द्वारा खेले जा रहे नाटक में सीता के जींस-टाप पहनने को लेकर खूब बवाल मचा।
देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी लोग धार्मिक रूप से काफ़ी संवेदनशील हो चुके हैं. हर बार की तरह इस बार भी टौंस नदी के घाट पर दोस्तों के साथ देर तक बैठा रहा. नाव की सैर की. नदी में नहाना भी चाहता था लेकिन अब टौंस का पानी इतना गदा हो चुका है कि नहाने लायक नहीं रहा. टौंस गंदी और छिछ्ली होती जा रही है. हमारे बचपन में टौंस के किनारे खेती होती थी अब इसके किनारे पर घर बनते जा रहे हैं. यही हाल रहा तो कुछ सालों में यह नदी गंदे नाले में बदल जाएगी. काश हम अपनी नदी तालाबों के प्रति भी थोड़े संवेदनशील हो पाते।


साभार : ब्रजेश का चायघर

मंगलवार, फ़रवरी 08, 2011

आजमगढ़ से आ रही है तुलसी की महक

भारतीय जनमानस की आस्था का केन्द्र मानी जाने वाली तुलसी अब आंगन की बजाय खेतों में लहलहा रही है। आजमगढ़ में जब तुलसी उगाने का विचार रखा गया तो किसानों को पहले-पहल अजीब लगा और किसी ने इसकी खेती करने के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

लेकिन जीवन के 87वें साल की दहलीज पर खड़े कैलाशनाथ सिंह ने आर्गेनिक इंडिया के प्रस्ताव पर विश्वास जताते हुए तुलसी की खेती को लेकर अपनी सहमती दे दी। बकौल कैलाशनाथ-``जब मैने फर्म की पद्धति को देखा तो मेरा संदेह विश्वास में परिवर्तित हो गया।´´ इस तरह एक वयोवृद्ध द्वारा दिखाए गया साहस बेहतर लाभांश दे रहा है। यही नहीं कैलाशनाथ की आय में बढ़ोत्तरी को देख अन्य किसानों भी उनका अनुसरण करने लगे हैं। आज पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों आजमगढ़, मऊ और सुल्तानपुर के अलावा सूखे की मार झेल चुके बुंदेलखंड के हजारों किसानों ने परंपरागत फसलों के साथ साथ नकदी फसल के रूप में तुलसी की खेती शुरु कर दी है। यहां करीब दो से ढाई हजार एकड़ जमीन में सालाना 2,000 टन से भी अधिक तुलसी का उत्पादन हो रहा है।

उल्ललेखनीय है कि आतंकवादियों की नर्सरी कहे जाने वाले आजमगढ़ में तुलसी की व्यावसायिक खेती से स्थानीय किसानों ने सफलता की एक नई कहानी का सूत्रपात किया है, जिससे किसानों के जीवन में प्रभावकारी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। कुछ समय पहले तक आजमगढ़ में धान और गेहूं की परंपरागत फसले पैदा की जाती रही हैं। लेकिन बेहतर मुनाफे के चलते रबी और खरीफ की परंपरागत फसलों के साथ साथ अब तुलसी की खेती पर स्थानीय लोगों की निर्भरता बढ़ती जा रही है।

आजमगढ़ राजनीतिक रूप से भले ही मजबूत रहा हो, लेकिन उद्योग धंधों की दृष्टि से पिछड़े इस क्षेत्र का अधिकतर कृषि क्षेत्र ऊसर है। किसानों के लिए कैश क्रॉप के रूप में पैदा होने वाले गन्ने की पैदावार में भी निरंतर कमी आई है, जिसके चलते यहां बची-खुची एक चीनी मिल को भी नहीं बचाया जा सका। लेकिन तुलसी की खेती ने स्थानीय लोगों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन किये हैं। बदलाव की कहानी आज़मगढ़ शहर से लगे कुम्हेपुर गांव से शुरु होती हैं। कुम्हेपुर में पैदा हुए डॉ. नरेन्द्र सिंह ने तुलसी के गुण, प्रभाव, उपयोग और इसकी मािर्कट वैल्यु को ध्यान में रखकर अध्ययन किया और अपने पैतृक गांव को ही इसकी प्रयोगशाला बनाया। वर्ष 2000 में कुम्हेपुर में डॉ. नरेन्द्र सिंह ने अपने ही खेतों में तुलसी की खेती शुरु कर दी। शुरुआती तीन वर्ष तो खेतों को रसायनिक खाद के दुष्प्रभाव से मुक्त करने में ही लग गए। इसके बाद वहां तुलसी के की जैविक पद्धति से खेती शुरु की गई। तुलसी की खेती के पीछे इस क्षेत्र के गरीब किसानों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने का उद्देश्य निहित था। कुछ समय बाद प्रयास रंग लाने लगा और करीब 6 साल के बाद कुम्हेपुर गांव में आरंभ हुई तुलसी की खेती आसपास के 13 गांवों में 700 एकड़ से अधिक क्षेत्र में की जा रही है और इससे यहां के किसान एक करोड़ रुपये तक सालाना कारोबार कर रहे हैं। जिसके कारण अन्य किसानों में भी तुलसी की खेती को लेकर रुचि बढ़ रही है।

कैलाशनाथ की सफलता के बाद किसानों को तुलसी की खेती के लिए राजी करना मुश्किल नहीं रह गया। लखनऊ स्थित संस्था `आर्गेनिक इंडिया´ ने जब उत्पादन लागत एवं फसल उत्पादन में जोखिम वहन करने की घोषणा कर दी तो काम और भी आसान हो गया। स्थानीय बाजार में तुलसी की कीमत 10 से 15 रुपये किलो बताई जाती है, जबकि आर्गेनिक इंडिया 80 से 90 रुपये देकर किसानों से तुलसी खरीदने लगी। संस्था के सीईओ एवं प्रबंध निदेशक कृष्ण गुप्ता आर्गेनिक इंडिया के लिए भी इसे फायदे का सौदा बताते हैं। वे कहते हैं कि-``जो तुलसी ये किसान पैदा कर रहे हैं, वह पूर्णत: आर्गेनिक होती है, जिसके चलते अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसके बेहतर दाम मिल जाते हैं। यही नहीं रसायनिक खाद का उपयोग ना होने से उत्पादन लागत भी सस्ती है।´´ गुप्ता के मुताबिक किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए सिरदर्दी भी मोल नहीं लेनी पड़ती और समस्त उत्पाद संस्था द्वारा खरीद लिया जाता है। जनवरी से जून के फसल सीजन के दौरान अच्छी पैदावार के लिए कंपनी किसानों की मदद हेतु फील्ड एवं टेक्नीकल मैनेजर तैनात करती है। डॉ. नरेन्द्र और भारत मित्रा ने मिलकर `आर्गेनिक इंडिया फांउडेशन´ नाम की संस्था गठित की और आजमगढ़ में ही अमेरिकी पद्धति से एक छोटा सा उद्योग लगाया, जिसमें जैविक खेती से उत्पादित तुलसी चाय के रूप में प्रयोग किया, जो आज अनेक प्रकार की गंभीर बीमारियों में दवा के रूप में प्रयोग की जा रही है। अब यहां के किसान तुलसी की तीन प्रजातियों रामा तुलसी, श्यामा तुलसी तथा वन तुलसी की खेती करते हैं। तुलसी की ये तीनों प्रजातियां अलग-अलग रंगों में होती हैं।

बकौल डॉ. नरेन्द्र सिंह-``पूरे देश के किसान अधिक अनाज उत्पादन के लिए रसायनिक खादों का प्रयोग करते हैं, जिसके कारण खेत की मिट्टी की उर्वराशक्ति दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही और उत्पादित होने अनाज के सेवन से लोग हृदय एवं रक्त संबंधी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। लगातार कम होती मिट्टी की ताकत से भविष्य में अनाज का उत्पादन मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में अब जैविक खेती ही एकमात्र रास्ता है, जिसे अपनाकर किसान इन गंभीर परिणामों से मुक्त रह सकते हैं। अब किसान तुलसी के अलावा मटर, गेहूं, चना, अदरक, हल्दी जैसी चीजों की खेती कर रहे हैं और बिना रसायनिक खादों का उपयोग किए भरपूर उत्पादन प्राप्त कर हैं।´´

हालांकि अब कई स्थानों पर तुलसी की खेती हो रही है, लेकिन इसकी शुरुआत का श्रेय आजमगढ़ को ही जाता है। यहां की जैविक खेती से उत्पादित तुलसी अमेरिका, जर्मनी, जापान, स्विट्जरलैंड समेत दुनिया के अनेक देशों में भेजी जा रही है। आजमगढ़ की तर्ज पर उत्तरप्रदेश के ही सुल्तानपुर जिले के किसानों ने भी तुलसी की खेती को अपनाया है। गोसाईगंज के शहादतपुर गांव के शरद वर्मा, जामो के रामयज्ञ यादव, गौरीगंज विकासखंड के पजेहरी निवासी रणंजय सिंह ने धान एवं गेहूं के साथ साथ तुलसी की खेती भी आरंभ कर दी है। विभिन्न योजनाओं के जरिये तुलसी की खेती को बढ़ावा देने के लिए अब सरकार भी विभिन्न कार्यक्रम शुरु कर रही है। कृषि, उद्यान एवं कृषि प्रसार विभाग भी तुलसी की खेती को बढ़ावा देने के लिए काम करेंगे, जिसके अन्र्तगत चुनिंदा किसानों को प्रशिक्षित करके उन्हें मॉडल खेती हेतु तैयार किया जायेगा। किसानों को बाजार उपलब्ध हो इसकी भी योजना बनाई जा रही है।

फरवरी के आखिरी दिनों में नर्सरी तैयार करने साथ तुलसी की फसल उपजाने की कोशिश शुरु हो जाती है। अप्रैल आते आते इनका खेतों में पौध रोपण आरंभ हो जाता है।एक हेक्टेयर में तुलसी के रोपण के लिए ढाई सौ ग्राम बीज काफी माना जाता है। करीब बारह दिनों में बीज उग आते हैं और छह सप्ताह में पौध तैयार हो जाती है। भारत में आमतौर पर दो तरह की तुलसी उगाई जाती है। इनमें से एक `इंडियन बेसिल´ है तो दूसरी का नाम पूसा बेसिल है। इंडियन बेसिल की खेती तेल उत्पादन के लिए होती है। इस तेल का उपयोग देश विदेश की की फ्लेवर एवं सुगंधी निर्माता औद्योगिक इकाइयों में होता है। इसके अलावा तुलसी के अनेक औषधीय गुण हैं, जिसके चलते इसकी मांग काफी है। तुलसी के पौधों की डाल व तनों से भी तमाम औषधियां, माला एवं धार्मिक वस्तुएं निर्मित होती हैं। इंडियन बेसिल प्रजाति की तुलसी कम समय में तैयार होने वाली फसल मानी जाती है। विभिन्न जलवायु की दशाओं में यह करीब 75 से 80 दिन में तैयार हो जाती है, जिससे 15 से 20 हजार रुपये की कीमत का करीब 50 किलोग्राम तेल प्राप्त किया जा सकता है। दूसरी ओर पूसा बेसिल के पत्तों का उपयोग दवाइयों एवं हर्बल चाय के लिए होता है। बहरहाल संशय की स्थिति से बचने के लिए उत्पादन शुरु करने से पूर्व इसके बाजार एवं उत्पादन प्रक्रिया की पर्याप्त जानकारी जुटा लेना बेहतर होगा।

(उमाशंकर मिश्र)

साभार : विस्फोट.काम

बुधवार, फ़रवरी 02, 2011

आ से आजमगढ़, आ से आईपीएल

सोहेल तनवीर और कामरान खान एक सिक्के के दो पहलू. एक के देश पर आतंकवादी का ठप्पा है तो दूसरे के जिले पर।

दोनों में अंतर इतना है कि पाकिस्तान का होने के नाते सोहेल आईपीएल में नहीं खेल पा रहा है, वहीं उसकी जगह कामरान को अवसर मिला है. बाएं हाथ से गेंदबाजी करने वाले सोहेल ने जिस तरह राजस्थान रायल्स को पहला आईपीएल जिताने में अहम भूमिका अदा की थी, उसी भूमिका में बाएं हाथ से 140 किमी की रफ्तार से गेंद फेकने वाले कामरान की यार्कर अपने विरोधियों के लिए खतरनाक साबित हो रही है. राजस्थान रायल्स के कोच डेरिन बैरी के शब्दों में “हमें एक युवा खिलाड़ी की जरुरत थी जो मैच का पासा पलट सके.” शायद इसी खूबी के चलते शेनवार्न ने कामरान का निक नेम बवंडर रखा है. इस बवंडर को क्रिकेटिया सांचे में ढालने वाले पूर्व रणजी खिलाड़ी उबैद कमाल कहते हैं “वो मेरी कल्पनाओं का इकबाल है.”

इस बवंडर की जड़ो की तलाश में जब पिछले दिनों आजमगढ़ रोडवेज पर पहुंचा तो चाय की दुकानों से लेकर पेपर वालों तक हर तरफ कामरान के उस विकेट की चर्चा हो रही थी जिसे उसने हाल ही में दिल्ली डेयरडेविल्स के खिलाफ लिया था. बातों ही बातों में चाय की दुकान पर बैठे मनोज सिंह से मुखातिब हुआ. बकौल मनोज सिंह “एक महीना पहले आया था तब उसे हम स्टेडियम ले गए थे. ऐसी शानदार गेंद फेंक रहा था कि हमें विश्वास नहीं हो रहा था कि ये वही कामरान है.” मनोज आजमगढ़ क्रिकेट संघ के सहसचिव हैं. उन्होंने बताया कि कामरान का घर आजमगढ़-मऊ जिले की सरहद पर बसे नदवासराय में है. वैसे तो उसका घर मऊ जिले में है पर उसने क्रिकेट सीखा और खेला आजमगढ़ में ही. इसलिए आजमगढ़ उसकी पहचान बन गयी.

शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी सुनील कुमार दत्ता हमारी ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि आजमगढ़ मीडिया का भुक्त भोगी है, कल वही लोग यहां की गलियों में खेलने वाले बच्चों के फुटेज दिखा-दिखाकर हमको आतंकवादी कह रहे थे, आज वही लोग अपनी जरुरतों के चलते फिर आ गए हैं.देश में हुई आतंकवादी घटनाओं के बाद आजमगढ़ के लोगों के पकड़े जाने और संदिग्ध बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद आज इस जिले के लोगों को लखनऊ, दिल्ली, मुबंई समेत पूरे देश में किराये पर कमरे तक नहीं मिल रहे हैं. क्रिकेट खिलाड़ी पंकज पाण्डे कहते हैं कि जो लोग हमें बदनाम कर रहे हैं, उन्हें जानना चाहिए कि कामरान ही नहीं अब्दुल्ला इकबाल जैसे आईपीएल खिलाड़ी से लेकर नोमान जैसे यूपी के सबसे तेज बालर आजमगढ़ की ही देन हैं. पंकज के साथ अब्दुल्ला के घर बदरका जाना हुआ. जहां अब्दुल्ला पुकारने पर उसकी छोटी बहन आयशा ने दरवाजा खोला- “भाईजान खलने गए हैं.” बाद में नियाज अहमद से मुलाकात हुई जो बेटे के क्रिकेट की प्रशंसा करते हुए बड़ी फिक्र के साथ कहते हैं कि पूरे देश में हमारे जिले के प्रति जो माहौल बनाया जा रहा है वो हमारे बच्चों की तरक्की में रोड़ा बन रहा है. बहुत तल्ख भाव से वे कहते हैं “ सबसे खतरनाक मीडिया है. उसका कोई उसूल नहीं रह गया है.” कामरान के भाई नौशाद कहते हैं- “ यकीन नहीं होता, लकड़ी के बैट से गली में क्रिकेट खेलने वाला मेरा भाई विलायत में खेल रहा है.” बहन कहकशां कहती हैं कि बिजली नहीं रहती पर भाईजान के मैच वाले दिन किराए का जनरेटर लेकर पूरे गांव के साथ क्रिकेट देखा जाता है. परिवार के लोग कामरान का क्रिकेट देखने के लिए दक्षिण अफ्रीका जाना चाहते हैं पर घर की माली हालत उन्हें इजाजत नहीं देती.
गरीबी-मुफलिसी की सौगात लिए कामरान के जीवन में पांच साल पहले एक अहम मोड़ आया, जब जिले के ही कोच नौशाद ने उसे मुंबई चलने को कहा था पर वालिद के इंतकाल के चलते वो नहीं जा पाया.

“आजमगढ़ के क्रिकेट का इतिहास बहुत रोचक है ”, कहते हुए मसीउद्दीन संजरी बताते हैं “ 80 के दौर में निजामाबाद में एक बंगाली बाबू हुआ करते थे, जिन पर क्रिकेट का भूत सवार था. जो अक्सर छुट्टियों के बाद अलीगढ़ में पढ़ने वालों के आ जाने पर मैदान में उतर जाता था.” वे याद करते हुए बताते हैं कि शायद यहीं से जिले में टूर्नामेंटों की शुरुवात हुई जिसका केंद्र सरायमीर हुआ करता था. जहां की देन कामरान और नोमान जैसे खिलाड़ी हैं. आजमगढ़ जैसे पिछड़े जिलों में सैकड़ों कामरान और नोमान हैं जिन पर उनके शहर की बिगाड़ी गई छवि का कोई असर नहीं पड़ेगा.दोनों के साथ खेले और साथ ही लखनऊ गए वसीउद्दीन कहते हैं कि दोनों का पढ़ाई में कभी मन नहीं लगा, शायद वे क्रिकेट के लिए ही पैदा हुए हैं. नोमान को फोन करके बाजार में आने के लिए कहते हुए बताते हैं “ दोनों का फार्म-वार्म हम ही लोग भरवाते हैं.”

सरायमीर के इसरौली गांव के रहने वाले मोहम्मद नोमान यूपी अण्डर 22 में खेलते हैं. कामरान और नोमान अल्फा क्लब इसरौली से खेलते थे, जिसके कप्तान नोमान हुआ करते थे. नोमान बताते हैं कि डेढ़-दो साल पहले दोनों लखनऊ गए, जहां कामरान को उबैद कमाल का सानिध्य मिला, वहीं मुझे पूर्व रणजी खिलाड़ी शाहनवाज बख्तियार का. नोमान बताते हैं कि ज्यादा मैच सरायमीर इलाके में होता था और हम लोग टेनिस बाल से खेलते थे. घर दूर होने के कारण कामरान मेरे ही घर रहता था. नोमान जनवरी 08 में हुए यूपीसीए कैंप को दोनों के लिए वरदान मानते हैं. नोमान कहते हैं “ उबैद सर के अण्डर में बीते दस दिनों ने हमारी लाईफ चेंज कर दी और जहां तक मेरा सवाल है तो मेरी पूरी गेंदबाजी को शाहनवाज सर ने निखारा.” उबैद कमाल कहते हैं “ कामरान जब मेरे पास आया था तो उसके रनअप आदि में खामियां थी जिसे मैने काफी हद तक सुधारने की कोशिश की और जहां तक नोमान का सवाल है तो नो डाउट वह भी एक दिन टीम इंडिया की टी शर्ट पहनेगा.” शाहनवाज बख्तियार कहते हैं कि आजमगढ़ जैसे पिछड़े जिलों में सैकड़ों कामरान और नोमान हैं, जिन पर उनके शहर की बिगाड़ी गई छवि का कोई असर नहीं पड़ेगा.

यहां एक तल्ख सच्चाई यह है कि कामरान हो या नोमान सभी ने उसी संजरपुर गांव के मैदान पर अपने क्रिकेटिया जीवन के शुरुआती मैचों को खेला और सीखा जिस पर आज आतंकवादियों के गांव का ठप्पा लगाया गया है. यहीं के तारिक शफीक के साथ आरिफ के घर जाना हुआ, जिस पर देश में हुए कई बम धमाकों का आरोप है. घर की खामोशी को तोड़ते हुए एक आवाज आई “ मेरे बेटे का क्या कसूर था ? सिर्फ यह ना कि उसे पढ़ने के लिए लखनऊ भेज दिया था.” यह बोलते हुए आरिफ की मां फरजाना बेगम आलमारी में भरे पड़े दर्जनों सील्डों और ट्राफियों की तरफ इशारा करते हुए कहती हैं “ मेरा बेटा मुल्क के लिए क्रिकेट खेलना चाहता था पर हुकूमत ने उसे अपने खिलाफ खेल खेलने के झूठे आरोप में फंसा दिया.”

सन्नाटा फिर पसर गया.

रविवार पर राजीव यादव का 29 मई, 2009 को प्रकाशित यह लेख साभार.