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गुरुवार, जुलाई 19, 2012

पूर्वांचल में जड़ें जमाता प्रतिरोध का सिनेमा अभियान : आजमगढ़ में पहली बार फिल्म फेस्टिवल




 -मनोज सिंह
आजमगढ़ के नेहरू हाल में पहला आजमगढ़ फिल्म फेस्टिवल 14 और 15 जुलाई को आयोजित किया गया। जनसंस्कृति मंच और आजमगढ़ फिल्म सोसाइटी के संयुक्त तत्वावधान में प्रतिरोध का सिनेमा का यह 26 वां आयोजन था। पहले आजमगढ़ फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन प्रख्यात लेखिका एवं एक्टिविस्ट अरुंधति राय ने किया।
अरुंधति का वक्तव्य :

उद्घाटन वक्तव्य में अरुंधति ने कहा कि " वह आजमगढ में आकर खुश हैं। यह शहर कविता, गीत, संगीत का शहर है लेकिन मीडिया ने इसे इस तरह प्रचारित किया कि जैसे आजमगढ़ के खेतों में आतंकवादी उगते हैं और यहां के कारखानों में बम बनाए जाते हैं। इस मौके पर मैं सिनेमा के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहूंगी लेकिन इतना कहना चाहूंगी कि जैसे देश में जंग लड़ी जाती है, बांध बनाए जाते हैं, निजीकरण होता है तो वह भी गरीबों के नाम पर ही  होता है। उसकी तरह हमारे फिल्म स्टार, गरीबों के कंधे पर सवार होकर फिल्म स्टार बने हैं। आप देखिए पहले फिल्म के कैरेक्टर गरीब होते थे, झुग्गी झोपड़ी में रहते थे। अमिताभ बच्चन की फिल्म कुली याद करिए जिसमें वह इकबाल नाम के कुली हैं और ट्रेड यूनियन से जुड़े हैं। वह जमाना गया; आज हमारी फिल्म का  हीरो कौन है?  अम्बानी है । गुरू फिल्म को याद करें। तो आज की फिल्मों के ये हीरों हैं। आज कुछ फिल्में गरीबी पर बन जाती हैं, जैसे स्लमडाग मिलेनियर लेकिन इसमें गरीबी को साइक्लोन, भूकम्प की तरह भगवान का बनाया हुआ बताया जाता है। इसमें कोई विलेन नहीं होता और इस तरह से हमारे इमैजिनेशन पर कब्जा कर बत़ाया जाता है कि एनजीओ और कार्पोरेट की मदद से गरीबी को खत्म किया जा सकता है।
    30 वर्ष पहले हमारे देश में तो ताले एक साथ खुले। एक बाबरी मस्जिद का और दूसरा बाजार का। इस मैनुफैक्चरिंग प्रॉसेस प्रक्रिया ने एक तरफ मुस्लिम आतंकवाद को पैदा किया, तो दूसरे माओवाद को । आज ऐसी स्थिति बना दी गई है कि जो भी पार्टी सत्ता में आएगी,  वह राइट विंग ही होगी और वह हमारे देश को और ज्यादा पुलिस स्टेट बनाएंगे। इंडिया में जो इकनामिक प्रोग्रेस चल रहा है,  उसमें 30 करोड़ मिडिल क्लास आ गया है लेकिन इसके लिए 80 करोड़ लोगों को गरीबी में डूबो दिया गया है। ये 80 करोड़ लोग सिर्फ 20 रूपया रोज पर गुजारा करते हैं। ढाई लाख से अधिक किसानों ने खुदकुशी की। दुनिया के सबसे ज्यादे गरीब लोग हमारे देश में रहते हैं। इनको देने के लिए पानी, अस्पताल, स्कूल नहीं है लेकिन हम अरबों रूपयों का हथियार खरीदते हैं ताकि हमें सुपर पावर कहा जाए। मुकेश अम्बानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास दो लाख करोड़ की पूंजी है, तो खुद उनकी व्यक्त्तिगत सम्पति एक लाख करोड़ रूपए; देश के 100 सबसे अमीर लोगों के पास देश की जीडीपी की एक चौथाई के बराबर सम्पत्ति है। अम्बानी ने अभी 27 टीवी चैनलों को खरीद लिया। अब ये चैनल क्या दिखाएंगे और बताएंगे कि छत्तीसगढ़ में क्या हो रहा है। जिसके पास एक लाख करोड़ है, वह क्या नहीं खरीद सकते। सरकार, इलेक्शन , कोर्ट , मीडिया और सब कुछ। ये सरकार चलाते हैं, एजुकेशन, हेल्थ पालिसी बनाते हैं और अब हमारी जिंदगी भी चलाना चाहते हैं। भ्रष्टाचार व्यापक आर्थिक असंतुलन से पैदा होता है। यह है भ्रष्टाचार रूपी बीमारी का असली कारण। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड आदि प्रदेशों में 2004 में 100 से ज्यादा एमओयू किए गए। आदिवासियों  को बंदूक देकर सलवा जुडूम बनाया गया और जंगल में बहुत बड़ी लड़ाई खड़ी की गई  है । 600 गांव जला दिए गए। तीन लाख लोगों को उनके घर से भगा दिया गया। जिसने विरोध किया उसे माओवादी कह कर मार डाला या जेल में डाल दिया। अभी छत्तीसगढ़ में 20 आदिवासियों को मार दिया। सोनी सोरी के साथ क्या हुआ, आप जानते हैं। आज देश की हालत ऐसी हो गई है। इस स्थिति में लेखकों, एक्टिविस्टों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है लेकिन सरकार और कार्पोरेट घराने लेखकों से कहते हैं कि दूर जाकर बच्चों की कहानी लिखो, दिमाग बंद कर चिल्लाओ। ऐसा करने के लिए लिटरेचर, डांस, म्यूजिक फेस्टिवल को स्पान्सर किया जाता है। अमेरिका में राकफेलर फाउंडेशन ने सीआईए बनायी। काउंसिल फार फारेन रिलेशन (सीएफआर) बनाया। वर्ल्ड  बैंक बनाया। अब ये संस्थान माइक्रोफाइनेन्स से सबसे गरीब लोगों से पैसा खींच रहे हैं। माइक्रोफाइनेन्स के जाल में फंसकर एक साल में 200 लोगों को खुदकुशी करनी पड़ी। आदिवासी, मुसलमान, किसान, मजदूर सब इसकी मार की जद में हैं,  लेकिन हम एक होकर लड़ नहीं पा रहे क्योंकि इन्होंने हमें बांट रखा  है। दलितों और आदिवसियों में। मुसलमानों को शिया और सुन्नी में। यह बंटवारा खड़ा करने के लिए ये फाउंडेशन पहचान की राजनीति, धार्मिक अध्ययन के नाम पर स्कालरशिप, फेलोशिप देते हैं। जो इस पर सवाल खड़ा करता है, इन झांसों में नहीं आता उसे नक्सली, माओवादी, आतंकवादी कह कर जेल में डाला जाता है, मार दिया जाता है। आज देश में बड़ा प्रेशर बनाया जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाओ। गुजरात में मुसलमानों का संहार भूल जाओ। यह वही लोग हैं जो एक समय बाजार को खोलने के लिए मनमोहन सिंह को सिर पर बैठाए घूम रहे थे। आज  उन्हें एक कट्टर व्यक्ति की जरूरत है जो इस सिलसिले को तेजी से चलाए।"
    इस मौके पर चर्चित फिल्मकार संजय काक ने कहा कि दो दशकों में तकनीक का लाभ उठाकर अलग किस्म का सिनेमा बन रहा है, जिसने हमारे सामने एक नई दुनिया खोली है। बालीवुड का सिनेमा पैसे के बोझ से दबा है। वह न एक कदम आगे बढ़ सकता है,  न दाएं या बाएं देख सकता है। उसकी सारी कोशिश सिनेमा में लगाए गए पैसे को वापस लाने की होती है,  इसलिए वह जनता से नहीं जुड़ सकता। डाक्यूमेटरी सिनेमा अलग-अलग कहानी को कई तरीके से हमारे सामने ला रहा है। बड़ा पैसा, कल्चर को हमसे दूर की चीज बना देता है जबकि प्रतिरोध का सिनेमा यह बताता है कि वह लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा हुआ है।
      प्रतिरोध के सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने प्रतिरोध के सिनेमा की वर्ष 2006 से शुरू हुई यात्रा के बारे में बताते हुए कहा कि इन फिल्म समारोहों का आयोजन जनता के सहयोग से हो रहा है और छोटे शहरों में इसकी सफलता ने साबित किया है कि जनता के सुख, दुख और संघर्ष से जुड़ा सिनेमा ही असली सिनेमा है, न कि तमाशा खड़ा करने वाला वालीवुड।
इस मौके पर मंच पर उड़ीसा से आए फिल्मकार सूर्य शंकर दास , दिल्ली से आए पत्रकार जितेन्द्र कुमार, जन संस्कृति मंच के प्रदेश सचिव मनोज कुमार सिंह, आजमगढ फिल्म समारोह के अध्यक्ष डा. विजय बहादुर  राय उपस्थित थे। समारोह का संचालन फिल्म समारोह के संयोजक डा. विनय सिंह यादव ने किया।
दर्शकों के उत्साह ने कामयाब बनाया पहले आजमगढ़ फिल्म फेस्टिवल को  
आजमगढ़ में हो रहे पहले फिल्म फेस्टिवल के लिए लोगों में गजब का उत्साह था। शनिवार 14 जुलाई को 11 बजते-बजते नेहरू हाल खचाखच भर गया। उद्घाटन सत्र के बाद नार्मन मैक्लरेन की कमाल की एनिमेशन फिल्म नेबर और बर्ट हान्स्त्र की जू दिखाई गई। दोनों फिल्मों में कोई संवाद नहीं था। इसके बाद भारतीय सिनेमा के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर मृणाल सेन की अमर फिल्म भुवन शोम दिखाई गई ।
    दोपहर के सत्र में केपी ससी की म्यूजिक वीडियो गांव छोरब नाहीं दिखाई गई। पांच मिनट की इस वीडियो म्यूजिक में आदिवासियों के संघर्ष को गांव, जंगल पहाड़ बचाने के लिए किए जा रहे संघर्ष को खूबसूरत गीत में पिरोया गया है।वीपिंग लूम्स अरमा अंसारी की फिल्म है, जो बुनकरों की जिंदगी पर है।अरमा अंसारी खुद बुनकर परिवार की हैं और उन्होंने अपनी पढ़ाई के दौरान इसे बनाया। यह फिल्म एक कविता की तरह है जो बुनकरों और उनके घर की स्त्रियों, बच्चों की लूम से रिश्ते की कहानी कहती है। अमुधन आरपी की फिल्म पी मैला ढोने वालो की कहानी है। आजमगढ़ फिल्म सोसाइटी से जुड़े अंकित ने इसका हिंदी अनुवाद भी फिल्म के साथ - साथ दर्शकों के लिए किया। 
    अनुपमा श्रीनिवासन की फिल्म आई वंडर गुजरात, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडू के ग्रामीण बच्चों के स्कूल, घर और जिंदगी में झांकते हुए यह बताने की कोशिश करती है कि ये बच्चे अपने परिवेश से और स्कूल  में क्या सीख रहे हैं। फिल्म यह सवाल भी उठाती है कि आखिर स्कूल की कक्षाएं उनके लिए बोरिंग क्यों है।  पहले दिन के आखिर सत्र में संजय काक की फिल्म जश्न- ए -आजादी दिखाई गई। यह फिल्म इस बात से रूबरू कराती है कि कश्मीर में आजादी का मतलब क्या है। फिल्म के प्रदर्शन के बाद फिल्मकार संजय काक ने दर्शकों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब देते हुए कहा कि कश्मीर की आज की स्थिति को समझने के लिए उसके 500 साल के इतिहास को जानना और समझना होगा। इसको सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच का मामला बता कर नहीं समझा जा सकता। कश्मीरियों के अंदर 500 वर्ष की गुलामी की बात का गहरा घाव है। 1947 से पहले 100 वर्ष का डोगरा राज उनके लिए बहुत बुरा था। देश की आजादी के समय उन्हें लगा कि उनकी आजादी का समय आ गया, लेकिन  स्थितियां उनके लिए बिगड़ती चली गईं। कश्मीरी अपने  सिर से  500 साल की गुलामी हटाना चाहते हैं; उनके सिर पर एक किस्म का मनोवैज्ञानिक वजन  है। हमें उन्हें ही तय करने देना होगा कि उनकी आजादी की परिभाषा क्या है, उसके मायने क्या होंगे ? 
    फेस्टिवल के दूसरे दिन रविवार को बच्चों पर आधारित सत्र में दो  फिल्में जन्नत के बच्चे और लाल गुब्बारा दिखाई गई। जन्नत के बच्चे प्रसिद्ध इरानी फिल्मकार माजिद मजीदी की फिल्म है।एक गरीब परिवार के भाई बहन अली और जहरा के बीच सिर्फ एक जोड़ी जूते हैं। वे अपने मां-बाप की माली हालत से वाकिफ हैं इसलिए नए जूते की फरमाइश नहीं करते। दोनों बारी-बारी एकमात्र जूते को पहनकर स्कूल जाते हैं। अली स्कूल की रेस कम्पटीशन में भाग लेता है और तीसरे स्थान पर आना चाहता है ताकि इनाम में एक जोड़ी जूता जीत सके लेकिन रेस के अंतिम समय में जब उसे लगता है  कि वह तीसरे स्थान पर भी नहीं आ पाएगा, तो पूरी ताकत लगाकर दौड़ पड़ता है। वह रेस में प्रथम स्थान पर आ जाता है और उसे बड़े-बड़े इनाम मिलते हैं लेकिन जूते न मिलने का दुख उसे सालता है और लोग उसे कंधों पर उठाए जश्न मना रहे हैं लेकिन उसका चेहरा आंसुओं में डूबा हुआ है। रेड बैलून फिल्म पास्कल नाम के एक बच्चे की लाल गुब्बारे से दोस्ती की फिल्म है। शरारती बच्चे एक दिन इस बैलून को नष्ट कर देते हैं जिससे पास्कल उदास हो जाता है। उसकी उदासी दूर करने के लिए सैकड़ों गुब्बारे उसके पास आ जाते  हैं और उसे पेरिस की सैर कराते हैं।
    दूसरे सत्र में दिखाई गई फिल्मों में सुपरमैन आफ मालेगांव में मालेगांव में वीडियो कैमरे पर फीचर फिल्में बनाने वाले फिल्मों के शौकीन युवाओं की कहानी को बहुत ही रोचक ढंग से फैजा अहमद खान ने उतारा है। महुआ मेंमवाज में विनोद राजा ने उड़ीसा, छत्तीसगढ, झारखंड, झारखंड, आंध्र प्रदेश में खनन कम्पनियों द्वारा आदिवासियों के विस्थापन और उसके संघर्ष को बयां किया है। यह फिल्म आदिवासियों की जीवन संस्कृति को बहुत संवेदनशील ढंग से सामने लाती है।काटन फार माई श्राउड नंदन सक्सेना और कविता बहल की फिल्म है जो विदर्भ में कपास किसानों की खुदकुशी के कारणों की तलाश करती है। फिल्म जमीनी नजरिए से यह समझने की कोशिश करती है कि कपास किसानों की हताशा का कारण क्या कृषि कर्ज का संकट है या वे विकास की गलत अवधारणा के शिकार हुए हैं। शकेब अहमद की फिल्म दास्तान-ए-खामोशी : आजमगढ़ में आजमगढ को आतंक के गढ़ के रूप में बदनाम किए जाने के दुष्प्रचार के षड्यंत्र को उजागर करते हुए आजमगढ़ के इतिहास और सांस्कृतिक वैशिष्टय से परिचय कराती है। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की फिल्म गोरखपुर डायरी-खामोशी में पूर्वी उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस की त्रासदी को संवेदनशील तरीके से सामने लाती है।
     फिल्म समारोह के अंत में उड़ीसा से आए फिल्मकार सूर्य शंकर दास  ने कई छोटी फिल्मों के जरिए उड़ीसा में खनन कम्पनियों के खेल, सरकार और मीडिया से उनकी सांठगांठ को उजागर किया। दर्शकों से संवाद करते हुए उन्होंने कहा  कि इस समय मुख्यधारा के  मीडिया ने अपना पूंजीपरस्त एजेंडा साफ कर दिया और इस बात की संभावना बहुत कम है कि उसमें सच्चाई को जगह मिल पाएगी। कई बार सच्चाई सामने लाने की बात तो दूर मीडिया घराने जन सामान्य के विरोध को आतंकवाद, नक्सलवाद का नाम देकर जनता के खिलाफ खड़े भी हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि इस मुश्किल दौर में भी कुछ स्वतंत्र फिल्मकारों, पत्रकारों ने वीडियो फुटेज, छोटी फिल्मों के जरिए जन प्रतिरोध को आवाज देने की लगातार कोशिश जारी रखी है ।
के के पाण्डेय ने आजमगढ़ फिल्म सोसाइटी की तरफ से आयोजन को सफल बनाने के लिए सभी लोगों का आभार व्यक्त किया और उम्मीद जताई की प्रतिरोध का अभियान का यह सिलसिला अब हर वर्ष आजमगढ़ में कायम रहेगा।
    आजमगढ़ का पहला फिल्म फेस्टिवल बहुत उमस वाले मौसम में बिना एसी वाले हाल के कारण दर्शकों को मुश्किल में तो डाल रहा था लेकिन नई चीजों को देखने- समझने के अहसास  के कारण वे समारोह में बने रहे । हाल के बाहर  अजय जेतली, अंकुर और मृत्युंजय द्वारा तैयार विश्व सिनेमा की प्रदर्शनी और गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के स्टाल की वजह से भी दर्शक आयोजन से बंधे रहे. इस मौके पर  अशोक भौमिक के उपन्यास ' शिप्रा एक नदी का नाम है ' का लोकार्पण उदघाटन सत्र में अरुंधति राय और संजय काक ने किया।
(लेखक  जन संस्कृति मंच ,उत्तर प्रदेश के सचिव हैं।ईमेलः manoj.singh2171@gmail.com)
courtesy:- http://www.yugjamana.org  

रविवार, जुलाई 08, 2012

गंगा-जमुनी तहजीब का हिस्सा है आजमगढ़ का निज़ामाबाद

आजमगढ़: ‘‘यह मस्जिद है, वह बुतखाना। या ये मानो या वो मानो। तुम्हें है एक ही राह जाना चाहे यह मानो या वो मानो।’’....अयोध्या नगरी के पड़ोसी जिले आजमगढ़ की फिजा यह एहसास कराती है कि कैसे वहां जब एक ही स्थान पर शिवालय की घंटिया, मस्जिद से उठती अजान की आवाज माहौल में साम्प्रदायिक एकता का रस घोलती है तो गुरूद्वारा भी खुशी से झूम ‘वाहे गुरू’ कह उठता है।

‘यह मस्जिद है, वह बुतखाना’ का फलसफा हमारी गंगा-जमुनी तहजीब का हिस्सा है और निजामाबाद में एक ही स्थान पर दो मस्जिदें, कई मंदिर और गुरूनानक की तपोस्थली साम्प्रदायिक एकता का सन्देश दूर तलक फैलाती है।

अयोध्या के विवादित स्थल के मालिकाना हक पर न्यायालय के फैसले को लेकर दुनिया की निगाहे अयोध्या पर टिकी हैं। तमाम तरह की आशंकाएं सरकार और समाज को भले ही कुछ सोचने पर मजबूर कर रही हों लेकिन अयोध्या के इस पड़ोसी जिले के बाशिंदे इन हालात के लिये धर्म के ठेकेदारों, वोट के सौदागरों और मीडिया के उस वर्ग को दोषी ठहराते हैं जो नकारात्मक बातों को सुखिर्यां बनाती है जिनसे अनावश्यक गलतफहमियां और दूरी पैदा होती है।

अयोध्या से महज 140 किलोमीटर दूर आजमगढ के लोग तो कुछ उत्सुक जरूर हैं मगर किसी प्रकार की क्रिया प्रतिक्रिया और नकारात्मक बातों को सिरे से खारिज करते हैं। हम बात कर रहे है आजमगढ़ जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर स्थित टाउन एरिया निजामाबाद की जो तमसा नदी के किनारे बसा है।

गुरुवार, जुलाई 05, 2012

Darul Musannefin Shibli Academy, Azamgarh : An Introduction


Darul Musannefin Shibli Academy Azamgarh (UP) India:

On November 21, 2012, Darul Musannefin Shibli Academy, Azamgarh, will be completing 98 years of its life. Widely acknowledged by scholars of our Asian neighbours, this Academy of letters specializes in research on Islamic Learning, medieval Indian history and oriental studies.Here we give a reprint of an article published by the Press Information Bureau, Government of India.“Moulded in the scholarly tradition of India’s ancient centre of learning, the Darul Musannefeen Shibli Academy in the old Azamgarh town of Uttar Pradesh has taken its place alongside some known modern research institutions. The small band of devoted scholars in the Academy, who preferred the pursuit of knowledge to the lure of status, comforts or emoluments, which could have been theirs for the asking, recalls the glory of the ancient scholars of Nalanda,Cairo, Taxila and Transoxonia. A well-equipped library and a well organised Publication Department, putting out original works or the fruits of modern research in oriental philosophy, history and culture, make it the envy of many an institution in the field.”

Darul Musannefin Shibli Academy was conceived by Maulana Shibli Nomani and established by his disciples headed by Maulana Hamiduddin Farahi on November 21, 1914, three days after his death with the following objectives:

* To nurture and sustain a body of scholarly authors.
* To provide a congenial environment for scholars to create, compile and translate literary works of high scholastic and historical value.
* To undertake printing and publication of the literary works of the Academy.

It aimed at effectively meeting increasing intellectual and ideological challenges faced by the Muslim community of the sub-continent after the collapse of their political authority and its replacement by the British power.

Over the period of more than nine decades the Academy had eminently succeeded in meeting these objectives. Inspired by Allama Shibli’s personal example and his legacy of well-researched and highly scholarly works, the scholars of the Academy continued to create scholarly works in the fields of Islamic history and literature. The Academy had so far published more than 250 books including such significant works as Siratun Nabi and Al Faruq. These books by the virtue of their rigorous standards of research are widely acclaimed and continue to be used as reference works. Besides these books of exceptional value, the Academy had maintained an unbroken tradition of publication of its renowned Urdu monthly journal ‘Maarif’ in uninterrupted circulation since July 1916. The Academy had nurtured a rare environment of single minded and selfless devotion to academic pursuits.

During the recent years due a combination of factors the Academy had been facing severe financial problems. Its precarious finances are barely adequate to maintain a skeletal staff on extremely meagre remuneration. Absolutely no funds are available for any kind of development plans. Even maintenance of basic services is not possible. Buildings have not seen repair and white wash for a long time and publication programme is badly affected. Modernisation of its famed library, preservation of rare manuscripts, publication of Hindi and English translations of its books and a number of other projects could not be undertaken due to the paucity of funds. Urgent help is needed to enable the Academy maintain its glorious tradition and continue to serve the community for which it was founded.


Courtesy : http://www.shibliacademy.org/

मंगलवार, जुलाई 03, 2012

आजमगढ़ के वरिष्ठ दलित साहित्यकार डॉ.तुलसीराम की आत्मकथा 'मुर्दहिया'

डॉ.तुलसीराम की आत्मकथा 'मुर्दहिया' अभी हाल ही में पुस्तक रूप में हमारे सामने प्रस्तुत हुई। इसके पहले यह सात खंडों में 'तद्भव' में प्रकाशित हो रही थी। साहित्य में आत्मकथा लेखन बहुत पुरानी विधा है। कई वर्षों से दलित आत्मकथाओं ने साहित्य जगत के बंधे-बंधाये मानदण्डों को तोड़कर अपने जीवन से जुड़े उस सच्चे और कड़ुवे यथार्थ को सबके सामने उजागर करने का प्रयास किया जिसे उन्होंने स्वयं झेला। डॉ. तुलसीराम ने अपनी इस आत्मकथा को सात उपशीर्षकों के माध्यम से अपने जीवन के एक-एक पड़ाव को पाठकों के सामने रखा है। तुलसीराम की यह आत्मकथा दलित समाज को और उस समय की परंपरा को प्रकट करती है। उन्होंने अपने प्रथम खण्ड 'भुतही पारिवारिक पृष्ठभूमि' के माध्यम से यह दिखाया है कि किस प्रकार समाज में भूत-प्रेत और अंधविश्वास का कड़ा मायाजाल समाज में एक न ठीक होने वाले रोग की तरह पफैला हुआ था और ऐसे ही समय में इसी दलित समाज में उनका जन्म हुआ। कहते हैं व्यक्ति जिस परिवेश में पला-बढ़ा होता है उसका असर उस पर अवश्य दिखाई देता है, पिफर इस उपर्युक्त कहे हुए मूर्खताजन्य और अंधविश्वास से तुलसीराम कैसे अछूते रह सकते थे। उन्होंने अपने इस प्रथम खण्ड में यह स्पष्ट कर दिया कि दलित और सवर्ण के भगवान अलग-अलग होते हैं और उनकी पूजा-अर्चना, प्रसाद और हर विधि अपना अलग स्थान रखती है। वे देवी-देवता के साथ भूतों को भी बहुत मानते हैं और डर के वशीभूत होकर जाने-अनजाने अपना और अपनों की क्षति कर डालते हैं। उन्हें इस बात का बिल्कुल ज्ञान नहीं होता कि क्या उचित है या क्या अनुचित? जिस के चलते तुलसी राम को चेचक जैसी भयानक बीमारी से अपनी एक आँख गंवानी पड़ती है जिसके चलते समाज उन्हें अपशगुन मानने लगा। तुलसी ने 'मुर्दहिया' आत्मकथा की भूमिका में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि 'यह सही मायनों में हमारी दलित बस्ती की ज़िंदगी थी।' इस ज़िंदगी को आत्मकथा के माध्यम से मैंने बाहर निकाला। उन्होंने बड़े विस्मयकारी ढंग से अपनी स्कूली शिक्षा के बारे में बताया है कि किस प्रकार ब्राह्मणों द्वारा किसी की आयी चिट्ठी को पढ़ने के दौरान कैसी अपमानजनक बातों का सामना करना पड़ता था। जिससे ऊबकर द्घरवालों ने उनका नाम प्राइमरी विद्यालय में लिखवाया था कि कम से कम किसी की चिट्ठी-पत्राी को पढ़ने के लिए ब्राह्मणों की गाली-गलौज का सामना तो नहीं करना पड़ेगा। यहीं से प्रारंभ होती है तुलसीराम की कष्टकारी शिक्षा यात्राा।

तुलसीराम ने इस आत्मकथा के दूसरे अंश 'मुर्दहिया तथा स्कूली जीवन' में शिक्षा के लिए किया जा रहा संद्घर्ष और उसमें गाँव से थोड़ा दूर स्थित मुर्दहिया की चौंकाने वाली द्घटनाओं को उदात्त रूप में प्रस्तुत किया। उस समय शिक्षा में ब्राह्मणों ने एक क्षत्राराज स्थापित कर लिया था और यदि कोई दलित या नीच जाति के व्यक्ति को स्कूल में दाखिला मिल भी जाता था तो उसे जातिसूचक शब्द या भद्दी गालियों से पुकारा जाता था। 'शुरू-शुरू में अधिकतर बच्चे 'उपस्थित' शब्द का उच्चारण नहीं कर पाते थे जिस पर मुंशी जी अविलंब गालियों की बौछार कर देते थे। विशेषकर दलित बच्चों को वे 'चमरकिट' कह कर अपना गुस्सा प्रकट करते थे' ;मुर्दहिया, डॉ. तुलसीराम, राजकमल प्रकाश, पृष्ठ-२४द्ध।

आजमगढ़ जिला के धरमपुर गाँव की सामाजिक और उस जिले की राजनीतिक माहौल का तुलसीराम के व्यक्तित्व पर बहुत गहरा असर दृष्टिगत होता है। यही उनके व्यक्तित्वके निर्माण में सहायक सि( हुआ। एक दिन तुलसीराम ने अपने मुन्नर चाचा को यह कहते हुए सुना कि 'अब भारत में समोही खेती होई, और सब कमाई सब खाई, नेहरू जी करखन्ना खोलिहीं आ पाँच साल में योजना बनइहीं। पहले हकबट होई पिफर चकबट'। ;वही, पृष्ठ-३७द्ध
तुलसीराम इस बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि सारी बातें तो मुझे समझ में नहीं आई 'किंतु 'हकबट' तथा 'चकबट' और 'सब कमाई सब खाई' मुझे अच्छी तरह समझ में आया था तथा यह भी कि यह सब रूस की देन है।' ;वही, पृष्ठ-३८द्ध ऐसा माना जाता है कि वर्तमान, अतीत के विचारों और कर्मों से मिलकर तैयार होता है। इसलिए आत्म कथा में व्यक्ति और समाज दोनों का इतिहास दिखाई पड़ता है।

तुलसीराम ने 'मुर्दहिया' के तीसरे अंश 'अकाल में अंध विश्वास' के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों को प्रस्तुत किया है। रचनाकार ने अपने आत्म के साथ-साथ समाज, उसका रहन-सहन, अंधविश्वास, ऊँच-नीच का भेदभाव जैसी अनेक समस्याओं को उभारा है। कह सकते हैं कि 'आत्मकथा में कई बार आत्म महत्वपूर्ण नहीं रह जाता उसके बहाने समय और समाज की कहानी कही जाती है, उनके विकास क्रम का चित्राण किया जाता है।' ;आत्मकथा की संस्कृति, पंकज चतुर्वेदी, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ-१९द्ध। इस आत्मकथा के चौथे अंश 'मुर्दहिया के गि( तथा लोक जीवन' और पाँचवें अंश 'भुतनिया नागिन' में तथा उपर्युक्त तीनों अंश में अकाल के समय की परेशानियों को प्रस्तुत किया है तथा यह भी दिखाया है कि ग्रामीण परिवेश के इन अनपढ़ लोगों में पफैला भूत-प्रेत का डर किस कदर इनके सामान्य जीवन को प्रभावित करता है। जिसके कारण इनका जीवन बद से बदतर हो जाता है। 'एक अंधविश्वास के चलते लोग बत्तख नामक पालतू पक्षी को बच्चे के ऊपर बैठने पर मजबूर करते हैं। इसमें मान्यता यह थी कि चुड़ैल भाग जाएगी। इन बीमार बच्चों को कोई दवा नहीं दी जाती। इस तरह कई बच्चे मर जाते, पिफर हुल्लड़ मच जाता कि चुड़ैल ने बच्चों को खा लिया।' ;वही, पृष्ठ-७४द्ध इन सबके अलावा तुलसीराम ने दलित समाज की संस्कृति, रीति-रिवाज, तीज-त्योहार के माध्यम से उनके समाज को प्रस्तुत किया है। इन सारी कुरीतियों, अंधविश्वासों के बीच तुलसीराम की शिक्षा धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। जिसमें अड़चनें तो बहुत थीं। लेकिन पढ़ाई में होशियार होने की वजह से उन्हें उसका पफल भी मिल रहा था।

'मुर्दहिया' आत्मकथा का छठवाँ अंश 'चले बु( की राह' और सातवाँ अंश 'आजमगढ़ की पफाकाकशी' ने तुलसीराम के जीवन में एक नया मोड़ ला दिया। रचनाकार ने नौवीं कक्षा में गौतम बु(, अब्राहम लिंकन, गाँधी, नेहरू आदि महापुरुषों के बारे में जाना। पर तुलसीराम बु( से इतना प्रभावित हुए कि उनका बालमन हमेशा वैसी ही कल्पना करने लगा। 'बस एक ही धुन हरदम सवार थी कि हाईस्कूल समाप्त हो और मैं बु( की तरह द्घर से भाग जाऊँ। इस प्रक्रिया में मैं एकांतवासी होने लगा।' ;वही, पृष्ठ-१४५द्ध वह भी शिक्षा के लिए द्घर त्यागते हैं लेकिन परिस्थिति से मजबूर वापस आ जाते हैं। इन्हीं सारी परेशानियों से जूझते हुए तुलसीराम बु(, अम्बेडकर और मार्क्स से प्रभावित अपने जीवन से संद्घर्ष करते हुए आगे बढ़ते हैं। शिक्षा, साहित्य और भूमि आदि साधनों से वंचित और सामाजिक गतिविधियों से अलग-थलग दलितों को मजदूरों की श्रेणी में रखा गया। तुलसीराम ने इस आत्मकथा में दलित जीवन की उस सशक्त भूमि को अपनी लेखनी का माध्यम बनाया। इस आत्मकथा में मार्क्सवादी चिंतन का प्रभाव दृष्टिगत होता है।

निसंदेह तुलसीराम ने इस आत्मकथा में विरोधी परिस्थितियों में अदम्य जिजीविषा और जीवन संद्घर्ष की झलक दिखाई है। आत्मकथा समाज परिवर्तन की मांग करती है। यह कोई मनबहलाव की पुस्तक नहीं है बल्कि इस पर गहराई से सोचना होगा। इसके साथ ही 'मुर्दहिया' के अगले अंक की प्रतीक्षा भी है। तुलसीराम ने अपनी इस आत्मकथा की भूमिका में यह अंकित किया है कि 'जाहिर है, अब पहले जैसी उनकी पूजा नहीं होती। बढ़ते हुए शहरीकरण ने हर एक के जीवन को प्रभावित किया है। भूत भी इससे अछूते नहीं हैं।' दलित चिंतन की और भी बातें इस आत्मकथा के अगले अंक में हमारे सामने प्रस्तुत होंगी। 'मुर्दहिया' के लिए कहा जा सकता है कि यह उन आलोचकों के लिए करारा जवाब है जो दलित साहित्य में मानवीय मूल्यों की उपेक्षा करते हैं। यह आत्मकथा पूरे दलित समाज के अदम्य जीवन संदर्भ के साथ आगे बढ़ने का संदेश देती है तथा यह भी बताती है कि जो नारकीय या दासतापूर्ण जीवन दलितों को मिला है उसमें व्यक्ति विशेष का नहीं बल्कि व्यवस्था का अपराध है।

मुर्दहिया/डॉ. तुलसीराम/राजकमल प्रकाशन, दिल्ली/समीक्षक -सरिता रावत,म.गां.अं.हि.वि.वि,वर्धा ;महाराष्ट्रद्ध
साभार : पाखी

रविवार, जुलाई 01, 2012

पर्यटन की दृष्टि से आजमगढ़

गंगा और घाघरा नदी के मध्य बसा तमसा नदी के तट पर स्थित आजमगढ़ उत्तर प्रदेश राज्य का एक महत्‍वपूर्ण जिला है। यह जिला उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थित है। आजमगढ़ गंगा और घाघरा नदी के मध्य बसा हुआ है। ऐतिहासिक द़ष्टि से भी यह स्थान काफी महत्वपूर्ण था। यह जिला मऊ,गोरखपुर, गाजीपुर, जौनपुर, सुल्तानपुर और अम्बेडकर जिले की सीमा से लगा हुआ है। पर्यटन की द़ष्टि से महाराजगंज, दुर्वासा, मुबारकपुर, मेहनगर, भवरनाथ मंदिर और अवन्तिकापुरी आदि विशेष रूप से प्रसिद्ध है। विक्रमजीत के पुत्र आजम खान, जो एक शक्तिशाली जमींदार था, शाहजहां के शासनकाल के दौरान 1665 ई. में आजमगढ़ की स्थापना करवाई थी। इसी कारण इस जगह को आजमगढ़ के नाम से जाना जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय में भी इस जगह का विशेष महत्व रहा है।

प्रमुख स्थान :

महाराजगंज: छोटी सरयू नदी के तट पर बसा महाराजगंज जिला मुख्यालय से लगभग 23 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आजमगढ़ में राजाओं की नामावली अधिक लम्बी है यहीं वजह है कि इस जगह को महाराजगंज के नाम से जाना जाता है। यहां एक काफी पुराना मंदिर भी है। यह मंदिर भैरों बाबा को समर्पित है। भैरों बाबा को देओतरि के नाम से भी जाना जाता है। इसके अतिरिक्त यह वहीं स्थान है जहां भगवान शिव की पत्‍नी पार्वती दक्ष यजन वेदी में सती हुई थी। प्रत्येक माह पूर्णिमा के दिन यहां मेले का आयोजन किया जाता है।

मुबारकपुर: मुबारकपुर जिला मुख्यालय के उत्तर-पूर्व से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पहले इस जगह को कासिमाबाद के नाम से जाना जाता था। कुछ समय बाद इस जगह का पुर्ननिर्माण करवाया गया। इस जगह को दुबारा राजा मुबारक ने बनवाया था। यह जगह बनारसी साड़ियों के लिए काफी प्रसिद्ध है। इन बनारसी साड़ियों का निर्यात पूरे विश्व में होता है। इसके अलावा यहां ठाकुरजी का एक पुराना मंदिर और राजा साहिब की मस्जिद भी स्थित है।

मेहनगर: यह जगह जिला मुख्यालय के पूर्व-दक्षिण में 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां एक प्रसिद्ध किला है जिसका निर्माण राजा हरिबन ने करवाया था। इस किले में एक स्मारक और सरोवर है जो कि काफी प्रसिद्ध है। इस सरोवर को मदिलाह सरोवर के नाम से जाना जाता है । प्रत्येक वर्ष सरोवर से तीन किलोमीटर की दूरी पर धार्मिक मेले का आयोजन किया जाता है।

दुर्वासा: यह स्थान फूलपुर तहसील मुख्यालय के उत्तर से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह जगह यहां स्थित दुर्वासा ऋषि के आश्रम के लिए काफी प्रसिद्ध है। प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। हजारों की संख्या में विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने यहां आया करते थे।

भवरनाथ मंदिर: यह मंदिर आजमगढ़ जिले के प्रमुख मंदिरों में से एक हैं। भवरनाथ मंदिर शहर से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर लगभग सौ वर्ष पुराना है। माना जाता है कि जो भी सच्चे मन से इस मंदिर में आता है उसकी मुराद जरूर पूरी होती है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। हजारों की संख्या में भक्त इस मेले में एकत्रित होते हैं।

अवन्तिकापुरी: मुहम्मदपुर स्थित अविन्कापुरी काफी प्रसिद्ध स्थान है। ऐसा माना जाता है कि राजा जन्मेजय ने एक बार पृथ्वी पर जितने भी सांप है उन्हें मारने के लिए यहां एक यज्ञ का आयोजन किया था। यहां स्थित मंदिर व सरोवर भी काफी प्रसिद्ध है। काफी संख्या में लोग इस सरोवर में डुबकी लगाते हैं।

कैसे जाएं-
वायु मार्ग: यहां का सबसे निकटतम हवाई अड्डा वाराणसी है।

रेल मार्ग: यहां रेल मार्ग से प्रमुख शहरों व स्‍थानों से जुड़ा हुआ है।

सड़क मार्ग: आजमगढ़ सड़कमार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है।