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शनिवार, जनवरी 08, 2011

भोजपुरी लघु कथा--छलिया प्रेमी

 सुबह जब  बुढाये   के साँझ के गोदी  सोवै  जात रहल तै वो बेला में रजमतिया के खेत के मेडी से गुजरत देख मिसिर के लौंडा रतन  के मन मचल गएल . आपन इशारा से रतन रजमतिया के मकई  के खेते में बुलावनै .
" ना बाब ना ,  केहू देख लेई तै का होई  " रजमतिया सकुचात  आपन बात कही के भागे  लागल.
" अरे नाहीं रे केहू देखि लेई तै का हो जाई. हम तै तोहरा से  पियार  करी  ला " रतन आपन  बाहीं कै सहारा देत रजमतिया से बोलनै.
" अगर कुछो गड़बड़ भई गयेल तब "
" तब का हम तोहरा से वियाह कई लेबी "
" अऊर  अगर जात बिरादरी कै चक्कर पड़ी गयेल तब "
" हम अपने साथै तुहके शहरवा भगा ले चालब ना........ " रतन रजमतिया के अपने  पहलु में समेटत कहने .
रजमतिया भी अब एतना आसरा  पाके मन से  गदगद हो गइल  और अपने भविष्य कै सपना सजावत   समर्पण कै दिहले.
कुछे देर बाद मिसिर बाबा अपने खेते के निगरानी बदे  वहां से गुजरने तै कुछ गड़बड़ कै आशंका तुरंते भाप  चिल्लैनन " कौने हई रे खेतवा में.. .. आज  लगत बाये कुल मकई टुटी  जाई ."
उधर रजमतिया के गाले  पै  रतन कै थप्पड़ पड़ल और चिलाये के कहनै ," दौड़िहा  बाबू जी हम रजमतिया के पकड़ लिहले बानीं ."  इ ससुरी आज मकई तोरै बदे खेत में घुसल रहे , " रजमतिया के तनिको  ना समझ  में आवत  की ई   का  होत बाये. मगर रतानवा  सब  समझ  गयेल रहेल की   अब  रजमतिया के ही चोर   साबित  कईके उ  रजमतिया से पीछा  छुड़ा  सकत  हवे . काहें के  की अब रजमतिया के भोगले के बाद अब उमें रतन कै तनिको इच्छा ना रही गएल रहल .  अऊर इसे उ बिल्कुले पाक साफ बच जात रहने अपने बाप    के नज़र मे.
फिर  तै  मिसिर  बाबा अऊर    रतन   दोनों  रजमतिया पै सोंटा और लात - घुसन    कै बौछार कई देहेनें. इधर रजमतिया छलिया प्रेमी के ठगल बस देखत रही गएल.
उपेन्द्र " उपेन "