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शुक्रवार, अगस्त 05, 2011

कैसे ही गाँवों का विकास ?

हल !
कि  जिसकी नोक से 
बेजान धरती खिल उठती
खिल उठता सारा जंगल 
चांदनी भी खिल उठती......
                गिरिजा कुमार माथुर की लिखी " ढाकबनी " कविता की  ये चंद पंक्तियाँ जिस हल के महत्व को बखूबी बयां कर रही है उसे आज किसान दीवाल पर टांग शहरों  कि तरफ मजदूर बनाने के लिये पलायन करता जा रहा है. कहा जाता है भारत गाँवों  का देश है  और उसकी आत्मा गाँवों में निवास करती है. देश की करीब अस्सी प्रतिशत जनसंख्या  गावों में निवास करती है. ये गाँव ही भारतीय अर्थवयवस्था के रीढ़ की हड्डी है और शहरों के विकास का रास्ता इन्हीं गाँवों से होकर जाता है

                मगर भारतीय गाँव आज इतने पिछड़े हुए क्यों है ? क्यों इनके विकास के लिये उचित प्रयास नहीं हुए ? ग्राम्य विकास में अडचने क्या है ? ना जाने कितने  सवाल जेहन में घूम जाते  है. आज आवश्यकता है गाँवों को उनके फटेहाल और गिरी हुई हालत से निकालकर एक समृद्धि  और उन्नत बनाने क़ी. गाँव सदियों से ही शोषण और दासता के शिकार रहे है. अंग्रेजी शासन काल में इन गावों की दशा पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया, उस समय जमींदारों और सेठ- साहूकारों ने खूब जमकर जनता का शोषण किया. स्वतंत्र प्राप्ति के बाद भी इसमें कुछ सुधार नहीं हुए और हमारे राजनेता इसे बखूबी जारी रख अपना पेट और घर भरते रहे

                 आर्थिक और सामाजिक संकरण कुछ ऐसे बुने गये की विकास के ज्यादातर प्रयास सिर्फ शहरों तक ही सीमित रह गयें. जहाँ शहरों में ऊँची- ऊँची अट्टालिकाये और फ्लैट बनते गये , अय्यासी और मौज मस्ती के सारे साधन मौजूद होते गये वहीं गाँव मूलभूत सुविधाओं से भी महरूम हैं 
                 
                  भारत कृषि प्रधान देश है फिर भी किसानों को उन्नत किस्म के कृषि यन्त्र और खाद्य सही समय पर नहीं मिल पाते. अगर थोड़ा बहुत कुछ प्रयास हुए भी तो वह जरुरतमंदों  को कम जुगाड़ू लोगों तक ज्यादा पहुंचे. महंगे कृषि के आधुनिक  यन्त्र गरीब जनता उठा  नहीं सकती  इसलिए आज भी कृषि बैल  और जैविक  खाद्यों  पर आश्रित है
                 कृषि पूरी तरह से मानसून  पर निर्भर है. जिस साल सही समय पर  मानसून गये उस साल तो ठीक है वरना सब बर्बादसिंचाई के दूसरे साधन जैसे नहरकुवाँ ,और तालाब हर जगह उपलब्ध नहीं होते . इसका परिणाम ये होता है कि कहीं फसलें  पानी  के बिना  सुख  जाती है तो कहीं पानी  में डूबकर  नष्ट  हो  जाती है. ऐसे  में सिंचाई  के पारंपरिक  साधन जैसे कुवाँ ,और तालाब भी धीरे  धीरे  अब  खात्मा  होने  लगे  है. तालाब अब पट चुके है उनपर दबंगों का कब्ज़ा है. इन पारंपरिक साधनों जैसे कुवों  तालाबों  और नहरों को फिर से खोदकर बंजर जमीनों को फिर से हरा भरा किया जा सकता है.  

                    गाँव शिक्षा के क्षेत्र में काफी पिछड़े हुए है. प्राथमिक विद्यालयों की हालत तो सबसे ख़राब है. इसके अध्यापक गण ज्यादातर दायित्वहीन, अकर्मण्य और आलसी होते है. उनका मन स्कूल में कम और अपने घर- गृहस्थी में ज्यादा रहता हैवे खुद  शहरों में रहकर अपने बच्चों को पब्लिक  स्कूलों में पढ़ना पसंद करते है और  प्राथमिक  विद्यालयों को सिर्फ एक आफिस से ज्यादा समझते हुए आकार ड्यूटी बजा कर चले जाते है. महिला शिक्षक तो स्वीटर बुनाई और बातों में ही ड्युटी पूरी कर लेती है. मजाल जो कोई कुछ बोल दे, वरना मियाँ जी हाजिर हो जायेगे दल बल के साथ
                   आज गाँव शिक्षा के क्षेत्र में काफी पिछड़े हुए  है. शिक्षा के लिए उच्च  संस्थानों की कमी  है. ऊँचीं शिक्षा के लिये शहरों का ही रुख करना पड़ता है. ग्रामीण लड़के तो किसी तरह शहरों का रुख कर लेते है मगर ग्रामीण लडकियाँ आज भी इससे वंचित रह जातीं है और या तो उनकी पढ़ाई छुट जाती है या फिर प्राईवेट बी. . करना पड़ता हैकहीं- कहीं स्कूल इतने दूर होते है की माँ बाप चाहकर भी  अपने बच्चियों को सिर्फ इसलिए  स्कूल नहीं भेज पाते की स्कूल आना जाना आसान नहीं होता
                   गावों में स्वास्थ्य की भी समुचित व्यवस्था नहीं है. यहाँ ज्यादातर लोग झोला छाप डाक्टरों के भरोसे ही रहते है क्योकि सरकारी चिकित्सालय नाममात्र के ही है और हर जगह उपलब्ध नहीं होते . और जो है भी उसे नर्स और दाई ही ज्यादातर सम्हाले हुए है. डाक्टर लोग अक्सर शहर  में अपनी प्राईवेट प्रेक्टिस में ही  व्यस्त होते है. ऐसे  में झोलाछाप डाक्टर अपनी अज्ञानता  के चलते बीमारी को और बढ़ा देते है और ऊपर से पैसे तो ऐठते ही है. अगर दवा किस्मत से क्लिक कर गयी तो ठीक वरना गरीब जनता को फिर शहरों की तरफ ही भागना पड़ता है.
                                 बिजली की  कमी गावों की एक बड़ी समस्या है. पर्याप्त बिजली मिल पाने से किसान अपना कृषि कार्य समय पर नहीं कर पाते. बिजली कर्मचारियों   से मिली भगत कर बिजली चोरी बदस्तूर जारी है. शाम होते ही कटिया लग  जाना आम बात है. टूटी फूटी सड़के भी गाँवों की  एक समस्या है. आवागमन  के साधन  भी काफी कम है. गावों को अगर सड़क, स्वास्थ्य, बिजली, शिक्षा और  पानी की समस्याओं से आज निज़ात दिला दी जाये तो यहाँ का शांत, खुला और मनोरम वातावरण शहरों की धुल-धक्कड़ , भाग - दौड़   और तंग वातावरण की जगह  कितना अच्छा हो जाता .  अंत में पं. सुमित्रा नंदन 'पन्त' की ये कविता , जो इन गावों और उनके निवासियों का सच्चा और स्वाभाविक चित्र अंकित करती है .:-
भारत माता ग्राम वासिनी ! 
खेतों में फैला है , स्यामल धूल भरा मैला सा  आँचल
गंगा-यमुना के आंसू जल , मिटटी की प्रतिमा उदासिनी
भारत माता ग्राम वासिनी !


                  ये तस्वीर  आधुनिक भारत के एक  गाँव में बिजली नहीं होने पर  हरिकेन लेम्प के उजाले में बर्थडे मानते हुये की है.............



उपेन्द्र ' उपेन '

शनिवार, जुलाई 30, 2011

रचनाधर्मिता के विविध आयामों को सहेजतीं : आकांक्षा यादव

ब्लागिंग-जगत में बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो एक साथ ही प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में भी निरंतर छप रहे हैं. इन्हीं में से एक नाम है-आकांक्षा यादव जी का. आकांक्षा जी कॉलेज में प्रवक्ता के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी उतनी ही प्रवृत्त हैं।

इण्डिया टुडे, कादम्बिनी, नवनीत, साहित्य अमृत, वर्तमान साहित्य, अक्षर पर्व, अक्षर शिल्पी, युगतेवर, आजकल, उत्तर प्रदेश, मधुमती, हरिगंधा, पंजाब सौरभ, हिमप्रस्थ, दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, स्वतंत्र भारत, राजस्थान पत्रिका, वीणा, अलाव, परती पलार, हिन्दी चेतना (कनाडा), भारत-एशियाई साहित्य, शुभ तारिका, राष्ट्रधर्म, पांडुलिपि, नारी अस्मिता, चेतांशी, बाल भारती, बाल वाटिका, गुप्त गंगा, संकल्य, प्रसंगम, पुष्पक, गोलकोंडा दर्पण इत्यादि शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित आकांक्षा यादव अंतर्जाल पर भी उतनी ही सक्रिय हैं. विभिन्न वेब पत्रिकाओं- अनुभूति, सृजनगाथा, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, वेब दुनिया हिंदी, रचनाकार, ह्रिन्द युग्म, हिंदीनेस्ट, हिंदी मीडिया, हिंदी गौरव, लघुकथा डाट काम, उदंती डाट काम, कलायन, स्वर्गविभा, हमारी वाणी, स्वतंत्र आवाज डाट काम, कवि मंच, इत्यादि पर आपकी रचनाओं का प्रकाशन निरंतर होता रहता है. विकिपीडिया पर भी आपकी तमाम रचनाओं के लिंक उपलब्ध हैं।

अपने व्यक्तिगत ब्लॉग 'शब्द-शिखर' के साथ-साथ पतिदेव कृष्ण कुमार जी के साथ युगल रूप में बाल-दुनिया, सप्तरंगी प्रेम, उत्सव के रंग ब्लॉगों का सञ्चालन उन्हें अग्रणी महिला ब्लागरों की पंक्ति में खड़ा करता है. इसके अलावा भी वे तमाम ब्लॉगों से जुडी हुयी हैं.

30 जुलाई, 1982 को सैदपुर, गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मीं और सम्प्रति भारत के सुदूर अंडमान में हिंदी ब्लागिंग की पताका फहरा रहीं आकांक्षा जी न सिर्फ हिंदी को लेकर सचेत हैं बल्कि इसके प्रचार-प्रसार में भी भूमिका निभा रही हैं. दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित पुस्तकों/ संकलनों में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं तो आकाशवाणी से भी रचनाएँ तरंगित होती रहती हैं. नारी विमर्श, बाल विमर्श और सामाजिक मुद्दों से सम्बंधित विषयों पर आप प्रमुखता से लेखन कर रही हैं. कृष्ण कुमार जी के साथ "क्रांति-यज्ञ:1857-1947 की गाथा" पुस्तक का संपादन कर चुकीं आकांक्षा जी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर चर्चित बाल-साहित्यकार डा. राष्ट्रबंधु द्वारा सम्पादित "बाल साहित्य समीक्षा (कानपुर)" पत्रिका ने विशेषांक भी जारी किया है।

विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु उन्हें दर्जनाधिक सम्मान, पुरस्कार और मानद उपाधियाँ प्राप्त हैं. भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’भारती ज्योति’, ‘‘एस0एम0एस0‘‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार सहित तमाम सम्मान शामिल हैं. आकांक्षा जी के पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव भी चर्चित साहित्यकार और ब्लागर हैं, वहीँ इस दंपत्ति की पुत्री अक्षिता (पाखी) भी 'पाखी की दुनिया' के माध्यम से अभिव्यक्त होती रहती है. सहजता और विनम्रता की प्रतिमूर्ति आकांक्षा यादव अपनी रचनाधर्मिता के बारे में कहती हैं कि-'' मैंने एक रचनाधर्मी के रूप में रचनाओं को जीवंतता के साथ सामाजिक संस्कार देने का प्रयास किया है. बिना लाग-लपेट के सुलभ भाव-भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें, यही मेरी लेखनी की शक्ति है.''

आशा की जानी चाहिए कि आकांक्षा जी यूँ ही अपने लेखन में धार बनाये रखें, निरंतर लिखती-छपती रहें और हिंदी साहित्य और ब्लागिंग को समृद्ध करती रहें.

जन्म-दिन पर असीम शुभकामनाओं सहित...!!
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रत्नेश कुमार मौर्य :
जन्म- 14 जुलाई, 1977 को. मूलत: उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद के निवासी. आरंभिक शिक्षा-दीक्षा जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर-आजमगढ़ और तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में परास्नातक. सम्प्रति उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन कौशाम्बी जनपद में अध्यापन पेशे में संलग्न. अध्ययन, लेखन का शौक. फ़िलहाल इलाहाबाद में निवास. दर्शन शास्त्र का विद्यार्थी होने के चलते कई बार यह जीवन भी दर्शन ही लगने लगता है.अंतर्जाल पर ‘शब्द-साहित्य’ ब्लॉग के माध्यम से सक्रियता !!

सोमवार, जुलाई 18, 2011

खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्यकार : अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

आजमगढ़ की धरती को यह सौभाग्य प्राप्त है की यहाँ तमाम साहित्यकारों और मनीषियों ने जन्म लिया और इसे कर्म-भूमि बने. उन्हीं में से एक हैं- अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध'.अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (15 अप्रैल, 1865-16 मार्च, 1947) हिन्दी के एक सुप्रसिद्ध साहित्यकार है। यह हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति रह चुके हैं और सम्मेलन द्वारा विद्यावाचस्पति की उपाधि से सम्मानित किये जा चुके हैं। प्रिय प्रवास हरिऔध जी का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह हिंदी खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है और इसे मंगलाप्रसाद पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। 15 अप्रैल,1865 को आज़मगढ़ के निज़ामाबाद क़स्बे में जन्मे अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' के पिता का नाम भोलासिंह और माता का नाम रुक्मणि देवी था। अस्वस्थता के कारण हरिऔध जी का विद्यालय में पठन-पाठन न हो सका अतः इन्होने घर पर ही उर्दू, संस्कृत, फारसी, बंगला एवं अंग्रेजी का अध्ययन किया। 1883 में आप निजामाबाद के मिडिल स्कूल के हेडमास्टर हो गए। 1890 में कानूनगो की परीक्षा पास करने के बाद आप कानूनगो बन गए। सन 1923 में पद से अवकाश लेने पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बने । 16 मार्च ,सन 1947 को आपका निधन हो गया।

खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्यकार माने जाने वाले 'हरिऔध' जी का सृजनकाल हिन्दी के तीन युगों में विस्तृत है- भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग और छायावादी युग। इसीलिये हिन्दी कविता के विकास में ‘हरिऔध’ जी की भूमिका नींव के पत्थर के समान है। उन्होंने संस्कृत छंदों का हिन्दी में सफल प्रयोग किया है। ‘प्रियप्रवास’ की रचना संस्कृत वर्णवृत्त में करके जहां उन्होंने खड़ी बोली को पहला महाकाव्य दिया, वहीं आम हिन्दुस्तानी बोलचाल में ‘चोखे चौपदे’, तथा ‘चुभते चौपदे’ रचकर उर्दू जुबान की मुहावरेदारी की शक्ति भी रेखांकित की। प्रियप्रवास और वैदेही वनवास आपके महाकाव्य हैं। चोखे चौपदे, चुभते चौपदे, कल्पलता, बोलचाल, पारिजात और हरिऔध सतसई मुक्तक काव्य की श्रेणी में आते हैं। ठेठ हिंदी का ठाठ और अधखिला फूल नाम से आपने उपन्यास भी लिखे। इसके अतिरिक्त नाटक और आलोचना में भी आपने उल्लेखनीय योगदान दिया है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में हरिऔध जी का परिचय देते हुए लिखा है- “यद्यपि 'हरिऔध' जी इस समय खड़ी बोली के और आधुनिक विषयों के ही कवि प्रसिध्द हैं, पर प्रारंभकाल में ये भी पुराने ढंग की श्रृंगारी कविता बहुत सुंदर और सरस करते थे। इनके निवास स्थान निज़ामाबाद में सिख संप्रदाय के महंत बाबा सुमेरसिंह जी हिन्दी काव्य के बड़े प्रेमी थे। उनके यहाँ प्राय: कवि समाज एकत्र हुआ करता था, जिसमें उपाध्याय जी भी अपनी पूर्तियाँ पढ़ा करते थे। इनका हरिऔध उपनाम उसी समय का है। इनकी पुराने ढंग की कविताएँ ‘रसकलस’ में संगृहीत हैं जिसमें इन्होंने नायिकाओं के कुछ नए ढंग के भेद रखने का प्रयत्न किया है।''


हरिऔध जी ने ठेठ हिंदी का ठाठ, अधखिला फूल, हिंदी भाषा और साहित्य का विकास आदि ग्रंथ-ग्रंथों की भी रचना की, किंतु मूलतः वे कवि ही थे उनके उल्लेखनीय ग्रंथों में शामिल हैं: -

प्रिय प्रवास
वैदेही वनवास
पारिजात
रस-कलश
चुभते चौपदे,चौखे चौपदे
ठेठ हिंदी का ठाठ
अध खिला फूल
रुक्मिणी परिणय
हिंदी भाषा और साहित्य का विकास

अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए इस लिंक को क्लिक करें.


मंगलवार, जून 28, 2011

चर्चित साहित्यकार व ब्लॉगर कृष्ण कुमार यादव के संपादन में प्रकाशित 'सरस्वती सुमन' का लघुकथा अंक अंडमान में लोकार्पित

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘चेतना’ के तत्वाधान में स्वर्गीय सरस्वती सिंह की 11 वीं पुण्यतिथि पर 26 जून, 2011 को मेगापोड नेस्ट रिसार्ट में आयोजित एक कार्यक्रम में देहरादून से प्रकाशित 'सरस्वती सुमन' पत्रिका के लघुकथा विशेषांक का विमोचन किया गया. इस अवसर पर ''बदलते दौर में साहित्य के सरोकार'' विषय पर संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में श्री एस. एस. चौधरी, प्रधान वन सचिव, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, अध्यक्षता देहरादून से पधारे डा. आनंद सुमन 'सिंह', प्रधान संपादक-सरस्वती सुमन एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर एवं डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर उपस्थित रहे. कार्यक्रम का आरंभ पुण्य तिथि पर स्वर्गीय सरस्वती सिंह के स्मरण और तत्पश्चात उनकी स्मृति में जारी पत्रिका 'सरस्वती सुमन' के लघुकथा विशेषांक के विमोचन से हुआ. इस विशेषांक का अतिथि संपादन चर्चित साहित्यकार और द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव द्वारा किया गया है. अपने संबोधन में मुख्य अतिथि एवं द्वीप समूह के प्रधान वन सचिव श्री एस.एस. चौधरी ने कहा कि सामाजिक मूल्यों में लगातार गिरावट के कारण चिंताजनक स्थिति पैदा हो गई है । >ऐसे में साहित्यकारों को अपनी लेखनी के माध्यम से जन जागरण अभियान शुरू करना चाहिए । उन्होंने कहा कि आज के समय में लघु कथाओं का विशेष महत्व है क्योंकि इस विधा में कम से कम शब्दों के माध्यम से एक बड़े घटनाक्रम को समझने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि देश-विदेश के 126 लघुकथाकारों की लघुकथाओं और 10 सारगर्भित आलेखों को समेटे सरस्वती सुमन के इस अंक का सुदूर अंडमान से संपादन आपने आप में एक गौरवमयी उपलब्धि मानी जानी चाहिए.

मूलत: आजमगढ़ के वासी युवा साहित्यकार एवं निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव ने बदलते दौर में लघुकथाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भूमण्डलीकरण एवं उपभोक्तावाद के इस दौर में साहित्य को संवेदना के उच्च स्तर को जीवन्त रखते हुए समकालीन समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने आप में समेटकर देखना चाहिए एवं साहित्यकार के सत्य और समाज के सत्य को मानवीय संवेदना की गहराई से भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिये। श्री यादव ने समाज के साथ-साथ साहित्य पर भी संकट की चर्चा की और कहा कि संवेदनात्मक सहजता व अनुभवीय आत्मीयता की बजाय साहित्य जटिल उपमानों और रूपकों में उलझा जा रहा है, ऐसे में इस ओर सभी को विचार करने की जरुरत है.

संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर ने कहा कि साहित्य के क्षेत्र में समग्रता के स्थान पर सीमित सोच के कारण उन विषयों पर लेखन होने लगा है जिनका सामाजिक उत्थान और जन कल्याण से कोई सरोकार नहीं है । केंद्रीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के निदेशक डा. आर. सी. श्रीवास्तव ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि आज बड़े पैमाने पर लेखन हो रहा है लेकिन रचनाकारों के सामने प्रकाशन और पुस्तकों के वितरण की समस्या आज भी मौजूद है । उन्होंने समाज में नैतिकता और मूल्यों के संर्वधन में साहित्य के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला । डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय ने अंडमान के सन्दर्भ में भाषाओँ और साहित्य की चर्चा करते हुए कहा कि यहाँ हिंदी का एक दूसरा ही रूप उभर कर सामने आया है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि साहित्य का एक विज्ञान है और यही उसे दृढ़ता भी देता है.अंडमान से प्रकाशित एकमात्र साहित्यिक पत्रिका 'द्वीप लहरी' के संपादक डा. व्यास मणि त्रिपाठी ने ने साहित्य में उभरते दलित विमर्श, नारी विमर्श, विकलांग विमर्श को केन्द्रीय विमर्श से जोड़कर चर्चा की और बदलते दौर में इसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया. उन्होंने साहित्य पर हावी होते बाजारवाद की भी चर्चा की और कहा कि कला व साहित्य को बढ़ावा देने के लिए लोगों को आगे आना होगा। पूर्व प्राचार्य डा. संत प्रसाद राय ने कहा कि कहा कि समाज और साहित्य एक सिक्के के दो पहलू हैं और इनमें से यदि किसी एक पर भी संकट आता है, तो दूसरा उससे अछूता नहीं रह सकता।

कार्यक्रम के अंत में अपने अध्यक्षीय संबोधन में ‘‘सरस्वती सुमन’’ पत्रिका के प्रधान सम्पादक डाॅ0 आनंद सुमन सिंह ने पत्रिका के लघु कथा विशेषांक के सुन्दर संपादन के लिए श्री कृष्ण कुमार यादव को बधाई देते हुए कहा कि कभी 'काला-पानी' कहे जानी वाली यह धरती क्रन्तिकारी साहित्य को अपने में समेटे हुए है, ऐसे में 'सरस्वती सुमन' पत्रिका भविष्य में अंडमान-निकोबार पर एक विशेषांक केन्द्रित कर उसमें एक आहुति देने का प्रयास करेगी. उन्होंने कहा कि सुदूर विगत समय में राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम घटनाएं घटी हैं और साहित्य इनसे अछूता नहीं रह सकता है। अपने देश में जिस तरह से लोगों में पाश्चात्य संस्कृति के प्रति अनुराग बढ़ रहा है, वह चिन्ताजनक है एवं इस स्तर पर साहित्य को प्रभावी भूमिका का निर्वहन करना होगा। उन्होंने रचनाकरों से अपील की कि वे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर स्वास्थ्य समाज के निर्माण में अपनी रचनात्मक भूमिका निभाएं। इस अवसर पर डा. सिंह ने द्वीप समूह में साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए और स्व. सरस्वती सिंह की स्मृति में पुस्तकालय खोलने हेतु अपनी ओर से हर संभव सहयोग देने का आश्वासन दिया।

कार्यक्रम के आरंभ में संस्था के संस्थापक महासचिव दुर्ग विजय सिंह दीप ने अतिथियों और उपस्थिति का स्वागत करते हुए आज के दौर में हो रहे सामाजिक अवमूल्यन पर चिंता व्यक्त की । कार्यक्रम का संचालन संस्था के उपाध्यक्ष अशोक कुमार सिंह ने किया और संस्था की निगरानी समिति के सदस्य आई.ए. खान ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर विभिन्न द्वीपों से आये तमाम साहित्यकार, पत्रकार व बुद्धिजीवी उपस्थित थे.

प्रस्तुति : दुर्ग विजय सिंह दीप
संयोजक- 'चेतना' (सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था)
उपनिदेशक- आकाशवाणी (समाचार अनुभाग)
पोर्टब्लेयर -744102











सोमवार, जून 13, 2011

आजमगढ़ जेल में उभरते रचनात्मकता के चित्र

सच मानिए, रचनात्मकता किसी खास-समय और स्थान की मोहताज नहीं होती, आजमगढ़ जेल के एक कैदी हैं- फिरोज अहमद, जिले के ही ठेकमा इलाके के सरायमोहन में चौकीदार थे, हंसी-खुशी जिंदगी चल रही थी। साल भर पहले, एक रात दोस्तों के उकसावे में निकल गए। कुछ 'ऊँच-नीच' करने, नतीजा जेल, बच्चों के साथ बीवी मायके चली गई। झाडुओं की सिंक और दूसरे कागज-गत्तों से कुछ तो भी बनाना शुरू कर दिया। पेंसिल हाथ में आई तो दीवारों का रूख लिया। हर ओर उभरने लगे फिरोज के चित्र। एक दिन जेल अधीक्षकअवधेश मिश्र की निगाह पड़ गई। उसके इन कारनामों पर उन्होंने बाजार से शिल्प कला और चित्रकारी के औजार मंगा कर थमा दिए। देखते ही देखते वह खास बन गया, दूसरे कैदियों की नजर में। मिश्र को बंगलुरू में कैदियों की राष्ट्रीय पेन्सिल ड्राइंग प्रतियोगिता की खबर मिली तो फिरोज के चित्र भी भेजे गए। उन चित्रों को 'ए' ग्रेड के दर्ज वाले सर्टिफिकेट हाल ही जब जेल पहुँचा तो कैदियों में हलचल मच गई, अब काफी खुश है फिरोज।

-सुधीर सिंह
(साभार : इण्डिया टुडे, 18 मई 2011)

रविवार, मई 15, 2011

कुछ शायरियाँ

शायरी _१


मुस्करा उठता है सारा जमाना
उनकी ईक मुस्कराहट पर
थोडा सा हम जो मुस्करा दिये
"उपेन्द्र " तो वो रूठ गये बुरा मान कर ।।


शायरी _

कल रात कटी बडी मुस्किल से
आज न जाने क्या हाल होगा ।
मगर अफसोस मेरी इस बेबशी का
"उपेन्द्र" उनको न जरा भी ख्याल होगा।।


शायरी _३

नाराज होकर वो चले गये वों आज मुझसे
बोलते थे दिल चीरकर दिखाइये तो यकीं आये
मैं डरता रहा कि अगर दिल चीरकर दिखाया तो "उपेन्द्र"
कहीं उनकी तस्वीर निकलकर धूल में ना गिर जाये ।।


शायरी _४

दुशमनों से क्या उम्मीद उनका काम ही था जलाना
वह चले गये घर हमारा जलाकर
अब उम्मीद अपने दोस्तों पर "उपेन्द्र"
मगर सब तमाशा देख रहे थे तालियां बजाकर ।। 
.


सोमवार, मई 09, 2011

आजमगढ़ की अक्षिता (पाखी) को 'निशंक' ने दिया 'बेस्ट बेबी ब्लागर अवार्ड'

नन्हीं ब्लॉगर अक्षिता यादव 'पाखी' को श्रेष्ठ नन्हीं ब्लॉगर के लिए 'हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-2010' अवार्ड दिया गया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, हिंदी कवि एवं साहित्यकार अशोक चक्रधर, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ रामदरश मिश्र, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे साहित्यकारों की उपस्थिति में 30 अप्रैल को हिंदी भवन में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर्स सम्मलेन में हिंदी साहित्य निकेतन, परिकल्पना डॉट कॉम और नुक्कड़ डॉट कॉम की त्रिवेणी ने हिंदी ब्लॉगिंग के उत्थान में अविस्मरणीय योगदान के लिए और भी 51 हिंदी ब्लॉगरों को यह सम्मान दिया। सबसे कम उम्र की अक्षिता पाखी का नाम इस सूची में सबसे ऊपर था। इन सभी को स्मृति चिन्ह, सम्मान पत्र, पुस्तकें और एक निश्चित धनराशि भी दी गई।

कानपुर में 25 मार्च 2007 को जन्मी अक्षिता इस समय पोर्टब्लेयर में कार्मेल स्कूल में केजी में पढ़ती है। अक्षिता का ब्लॉग 24 जून 2009 को 'पाखी की दुनिया' http://www.pakhi-akshita.blogspot.com नाम से अस्तित्व में आया। इस ब्लॉग पर उसने अन्य विषयों के साथ-साथ अंडमान के बारे में भी काफी जानकारियां और फोटोग्राफ पोस्ट किए हैं, जिन्हें यूजर्स काफी उत्सुकता से पढ़ते और सराहते हैं। इस ब्लॉग पर 150 से भी ज्यादा पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं और 140 से ज्यादा लोग इसका अनुसरण करते हैं। ब्लॉग का संचालन अक्षिता के माता-पिता करते हैं। अक्षिता के पिता कृष्ण कुमार यादव अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएं हैं और माँ आकांक्षा यादव उत्तर प्रदेश में एक कॉलेज में प्रवक्ता हैं।

दिल्ली से प्रकाशित अनेक समाचार पत्रों ने अक्षिता के लिए लिखा है कि अक्षिता बहुत छोटी है, लेकिन हिंदी ब्लॉगिंग में वह एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी है। उसका ब्लॉग बेहद लोकप्रिय है और फिलहाल हिंदी के टॉप 100 ब्लॉगों में से एक है। अक्षिता की तस्वीर बच्चों की एक पुस्तक के कवर पर भी छप चुकी है। इससे पूर्व अक्षिता पाखी को लोकसंघर्ष-परिकल्पना और लखनऊ ब्लॉगर्स एसोसिएशन के सह प्रायोजित ब्लॉगोत्सव-2010 में प्रकाशित रचनाओं की श्रेष्ठता के आधार पर वर्ष 2010 के लिए श्रेष्ठ नन्हीं ब्लॉगर का पुरस्कार मिल चुका है। अक्षिता सम्मान ग्रहण करने नहीं पहुंच सकी, इसलिए यह सम्मान उसके चाचा अमित कुमार यादव ने ग्रहण किया। मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, नन्हीं ब्लॉगर को यह पुरस्कार देते हुए उत्सुकता और भारी प्रसन्नता व्यक्त की।

साभार : स्वतंत्र आवाज़. com

रविवार, अप्रैल 24, 2011

पुल जो जोड़ने के लिए तरस रहा हैं. ---- तारकेश्वर गिरी.

आजमगढ़ मुख्यालय से लगभग ८ किलोमीटर उत्तर कि दिशा में आजमगढ़ - गोरखपुर मार्ग पर एक छोटी सी जगह हैं जिसे बनकट कहते हैं , बनकट एक छोटी सी बाज़ार हैं जो कि थाना मुबारक पुर से जुड़ा हुआ हैं. लेकिन मुबारक पुर जाने के लिए लगभग २० किलोमीटर घूम के जाना पड़ता हैं, अगर सीधे रास्ते से जाये तो बनकट से मुबारक पुर कि दुरी मात्र ८ किलोमीटर ही पड़ेगी. लेकिन उसके लिए टौंस नदी को पार करना जरुरी होता हैं.

पहले लोग टौंस नदी को नाव से पार करते थे मगर आज कल लोग नदी को पार करने के लिए पुल का सहारा लेते हैं. लेकिन सिर्फ पैदल या साईकिल या मोटर साईकिल से ही.

आज से लगभग दस साल पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्राम लारो -बलिया और विन्द मठिया व्यास गिरी गाँव के बीच टौंस नदी पर
एक बहुत ही खुबसूरत और मजबूत पुल बनवा रखा हैं. लेकिन सदियों से प्रशाशन कि उपेक्षा का शिकार रहा ये क्षेत्र आज भी लाचार हैं.

पिछले दो बार से बसपा के विधयाक और अब मंत्री रहे चंद्रदेव राम यादव उर्फ़ कैरैली उर्फ़ मेनेजर को और आजमगढ़ प्रशाशन को सिर्फ अपनी जेब भरना ही याद रहता हैं.

में ईस लेख के साथ गूगल का लिंक भी दे रहा हूँ, आप उस लिंक को खोल करके खुद देख सकते हैं कि किसी तरह से पुल के दोनों तरफ सड़क का अभाव हैं.

http://maps.google.com/maps?ll=26.115791,83.256961&spn=0.00132,0.001725&t=h&z=19&lci=com.panoramio.all

बुधवार, अप्रैल 20, 2011

आज फिर मौका मिला आजमगढ़ जाने का. ----------तारकेश्वर गिरी.

पुरे दस महीने व्यस्त रहने के बाद आज फिर मौका मिला हैं आजमगढ़ जाने का. दिल्ली कि भाग दौड़ कभी कभी तो बिना किसी काम के भी व्यस्त रहना ( दिल्ली वालो कि आदत हैं). खैर जैसे -जैसे शाम हो रही हैं उसी तरह से अपने गाँव कि यादे ताजा होती जा रही हैं. मन में फिर वही उठा पटक .

हर महीने माता जी से कहता रहा कि ईस महीने तो पक्का आऊंगा, मगर वो महीना भी पहले कि तरह निकलता चला गया. लेकिन ईस बार कुछ ऐसा जोश आया कि सारे काम छोड़ कर आज तैयारी कर ही ली.

मंगलवार, अप्रैल 19, 2011

राम शिव मूर्ति यादव को ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011‘ सम्मान

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित चारबाग के रवीन्द्रालय सभागार में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में प्रखर लेखक एवं समाज सेवी श्री राम शिव मूर्ति यादव को ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011‘ से सम्मानित किया गया। उक्त समारोह में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष श्री रामदास आठवले ने श्री यादव को यह सम्मान प्रदान किया एवं अम्बेडकरवादी साहित्य को प्रोत्साहित करने एवं तत्संबंधी लेखन हेतु उनके कार्य-कलापों की प्रशंसा करते हुए उसे समाज के लिए अनुकरणीय बताया। इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के 120 अम्बेडकरवादियों को सम्मानित किया गया।

उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात तहबरपुर-आजमगढ़ जनपद निवासी श्री राम शिव मूर्ति यादव एक लम्बे समय से शताधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक विषयों पर प्रखरता से लेखन कर रहे हैं। श्री यादव की ‘सामाजिक व्यवस्था एवं आरक्षण‘ नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। आपके तमाम लेख विभिन्न स्तरीय पुस्तकों और संकलनों में भी प्रकाशित हैं। इसके अलावा आपके लेख इंटरनेट पर भी तमाम चर्चित वेब/ई/ऑनलाइन पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाग्स पर पढ़े-देखे जा सकते हैं। श्री राम शिव मूर्ति यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ”यदुकुल” (www.yadukul.blogspot.com) ब्लॉग का आप द्वारा 10 नवम्बर 2008 से सतत संचालन किया जा रहा है।

इससे पूर्व आपको भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने सामाजिक न्याय सम्बन्धी लेखन एवं समाज सेवा के लिए ‘’ज्योतिबाफुले फेलोशिप सम्मान-2007‘‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ, इलाहाबाद ने विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना हेतु ‘‘भारती ज्योति’’ सम्मान एवं आसरा समिति, मथुरा ने ‘बृज गौरव‘, म0प्र0 की प्रतिष्ठित संस्था ‘समग्रता‘ शिक्षा साहित्य एवं कला परिषद, कटनी ने हिन्दी साहित्य सेवा के आधार पर वर्ष 2010 के लिए रचनात्मक क्षेत्र में सेवाओं के निमित्त ”भारत-भूषण“ की मानद उपाधि से अलंकृत किया है।

बुधवार, अप्रैल 13, 2011

राहुल सांकृत्यायन का घुमक्कड़ शास्त्र (पुण्यतिथि 14 अप्रैल पर विशेष)


21वीं सदी के इस दौर में जब संचार-क्रान्ति के साधनों ने समग्र विश्व को एकग्लोबल विलेजमें परिवर्तित कर दिया हो एवम् इण्टरनेट द्वारा ज्ञान का समूचा संसार क्षण भर में एक क्लिक पर सामने उपलब्ध हो, ऐसे में यह अनुमान लगाना कि कोई व्यक्ति दुर्लभ ग्रन्थों की खोज में हजारों मील दूर पहाड़ों नदियों के बीच भटकने के बाद, उन ग्रन्थों को खच्चरों पर लादकर अपने देश में लाए, रोमांचक लगता है। पर ऐसे ही थे भारतीय मनीषा के अग्रणी विचारक, साम्यवादी चिन्तक, सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत, सार्वदेशिक दृष्टि एवं घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के महान पुरूष महापण्डित राहुल सांकृत्यायन। 9 अप्रैल, 1893 को जन्मे राहुल सांकृत्यायन के जीवन का मूलमंत्र ही घुमक्कड़ी यानी गतिशीलता रही है। घुमक्कड़ी उनके लिए वृत्ति नहीं वरन् धर्म था। तीसरी कक्षा की पढ़ाई के दौरान ही राहुल ने इस्माइल मेरठी की ये पंक्तियाँ पढ़ीं और उसे अपने जीवन में आत्मसात् कर लिया-

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिन्दगानी फिर कहाँ?
जिन्दगी गर कुछ रही, तो नौजवानी फिर कहाँ?

राहुल का समग्र जीवन ही रचनाधर्मिता की यात्रा थी। जहाँ भी वे गए वहाँ की भाषा बोलियों को सीखा और इस तरह वहाँ के लोगों में घुलमिल कर वहाँ की संस्कृति, समाज साहित्य का गूढ़ अध्ययन किया। राहुल सांकृत्यायन उस दौर की उपज थे जब ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत भारतीय समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राजनीति सभी संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहे थे। वह दौर समाज सुधारकों का था एवं काग्रेस अभी शैशवावस्था में थी। इन सब से राहुल अप्रभावित रह सके एवं अपनी जिज्ञासु घुमक्कड़ प्रवृत्ति के चलते घर-बार त्याग कर साधु वेषधारी सन्यासी से लेकर वेदान्ती, आर्यसमाजी किसान नेता एवं बौद्ध भिक्षु से लेकर साम्यवादी चिन्तक तक का लम्बा सफर तय किया। सन् 1930 में श्रीलंका जाकर वे बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गये एवं तभी से वेरामोदर साधुसेराहुलहो गये और सांकृत्य गोत्र के कारण सांकृत्यायन कहलाये। उनकी अद्भुत तर्कशक्ति और अनुपम ज्ञान भण्डार को देखकर काशी के पंडितों ने उन्हें महापंडित की उपाधि दी एवं इस प्रकार वे केदारनाथ पाण्डे से महापंडित राहुल सांकृत्यायन हो गये। सन् 1937 में रूस के लेनिनग्राद में एक स्कूल में उन्होंने संस्कृत अध्यापक की नौकरी कर ली और उसी दौरान ऐलेना नामक महिला से दूसरी शादी कर ली, जिससे उन्हें इगोर राहुलोविच नामक पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ। छत्तीस भाषाओं के ज्ञाता राहुल ने उपन्यास, निबंध, कहानी, आत्मकथा, संस्मरण जीवनी आदि विधाओं में साहित्य सृजन किया परन्तु अधिकांश साहित्य हिन्दी में ही रचा। राहुल तथ्यान्वेषी जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे सो उन्होंने हर धर्म के ग्रन्थों का गहन अध्ययन किया। अपनी दक्षिण भारत यात्रा के दौरान संस्कृत-ग्रन्थों, तिब्बत प्रवास के दौरान पालि-ग्रन्थों तो लाहौर यात्रा के दौरान अरबी भाषा सीखकर इस्लामी धर्म-ग्रन्थों का अध्ययन किया। निश्चितत: राहुल सांकृत्यायन की मेधा को साहित्य, अध्यात्म, ज्योतिष, विज्ञान, इतिहास, समाज शास्त्र, राजनीति, भाषा, संस्कृति, धर्म एवम् दर्शन के टुकड़ों में बाँटकर नहीं देखा जा सकता वरन् वह तो समग्र भारतीयता के मूर्त रूप थे।

राहुल सांकृत्यायन का मानना था कि घुमक्कड़ी मानव-मन की मुक्ति का साधन होने के साथ-साथ अपने क्षितिज विस्तार का भी साधन है। उन्होंने कहा भी था कि- "कमर बाँध लो भावी घुमक्कड़ों, संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है।" राहुल ने अपनी यात्रा के अनुभवों को आत्मसात् करते हुएघुमक्कड़ शास्त्रभी रचा। वे एक ऐसे घुमक्कड़ थे जो सच्चे ज्ञान की तलाश में था और जब भी सच को दबाने की कोशिश की गई तो वह बागी हो गया। उनका सम्पूर्ण जीवन अन्तर्विरोधों से भरा पड़ा है। वेदान्त के अध्ययन के पश्चात जब उन्होंने मंदिरों में बलि चढ़ाने की परम्परा के विरूद्ध व्याख्यान दिया तो अयोध्या के सनातनी पुरोहित उन पर लाठी लेकर टूट पड़े। बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बावजूद वह इसकेपुनर्जन्मवादको नहीं स्वीकार पाए। बाद में जब वे मार्क्सवाद की ओर उन्मुख हुए तो उन्होंने तत्कालीन सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी में घुसे सत्तालोलुप सुविधापरस्तों की तीखी आलोचना की और उन्हें आन्दोलन के नष्ट होने का कारण बताया। सन् 1947 में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रूप में उन्होंने पहले से छपे भाषण को बोलने से मना कर दिया एवं जो भाषण दिया, वह अल्पसंख्यक संस्कृति एवं भाषाई सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के विपरीत था। नतीजन पार्टी की सदस्यता से उन्हें वंचित होना पड़ा, पर उनके तेवर फिर भी नहीं बदले। इस कालावधि में वे किसी बंदिश से परे प्रगतिशील लेखन के सरोकारों और तत्कालीन प्रश्नों से लगातार जुड़े रहे। इस बीच मार्क्सवादी विचारधारा को उन्होंने भारतीय समाज की ठोस परिस्थितियों का आकलन करके ही लागू करने पर जोर दिया। अपनी पुस्तकवैज्ञानिक भौतिकवादएवंदर्शन-दिग्दर्शनमें इस सम्बन्ध में उन्होंने सम्यक प्रकाश डाला। अन्तत: सन् 1953-54 के दौरान पुन: एक बार वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बनाये गये।

एक कर्मयोगी योद्धा की तरह राहुल सांकृत्यायन ने बिहार के किसान-आन्दोलन में भी प्रमुख भूमिका निभाई। सन् 1940 के दौरान किसान-आन्दोलन के सिलसिले में उन्हें एक वर्ष की जेल हुई तो देवली कैम्प के इस जेल-प्रवास के दौरान उन्होंनेदर्शन-दिग्दर्शनग्रन्थ की रचना कर डाली। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के पश्चात जेल से निकलने पर किसान आन्दोलन के उस समय के शीर्ष नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक पत्रहुंकारका उन्हें सम्पादक बनाया गया। ब्रिटिश सरकार ने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाते हुए गैर कांग्रेसी पत्र-पत्रिकाओं में चार अंकों हेतुगुण्डों से लड़िएशीर्षक से एक विज्ञापन जारी किया। इसमें एक व्यक्ति गाँधी टोपी जवाहर बण्डी पहने आग लगाता हुआ दिखाया गया था। राहुल सांकृत्यायन ने इस विज्ञापन को छापने से इन्कार कर दिया पर विज्ञापन की मोटी धनराशि देखकर स्वामी सहजानन्द ने इसे छापने पर जोर दिया। अन्तत: राहुल ने अपने को पत्रिका के सम्पादन से ही अलग कर लिया। इसी प्रकार सन् 1940 मेंबिहार प्रान्तीय किसान सभाके अध्यक्ष रूप में जमींदारों के आतंक की परवाह किए बिना वे किसान सत्याग्रहियों के साथ खेतों में उतर हँसिया लेकर गन्ना काटने लगे। प्रतिरोध स्वरूप जमींदार के लठैतों ने उनके सिर पर वार कर लहुलुहान कर दिया पर वे हिम्मत नहीं हारे। इसी तरह जाने कितनी बार उन्होंने जनसंघर्षों का सक्रिय नेतृत्व किया और अपनी आवाज को मुखर अभिव्यक्ति दी।

राहुल सांकृत्यायन सदैव घुमक्कड़ ही रहे। उनके शब्दों में- ‘‘समदर्शिता घुमक्कड़ का एकमात्र दृष्टिकोण है और आत्मीयता उसके हरेक बर्ताव का सार।’’ यही कारण था कि सारे संसार को अपना घर समझने वाले राहुल सन् 1910 में घर छोड़ने के पश्चात पुन: सन् 1943 में ही अपने ननिहाल पन्दहा पहुँचे। वस्तुत: बचपन में अपने घुमक्कड़ी स्वभाव के कारण पिताजी से मिली डाँट के पश्चात उन्होंने प्रण लिया था कि वे अपनी उम्र के पचासवें वर्ष में ही घर में कदम रखेंगे। चूँकि उनका पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा ननिहाल में ही हुआ था सो ननिहाल के प्रति ज्यादा स्नेह स्वाभाविक था। बहरहाल जब वे पन्दहा पहुँचे तो कोई उन्हें पहचान सका पर अन्तत: लोहार नामक एक वृद्ध व्यक्ति ने उन्हें पहचाना और स्नेहासक्ति रूधे कण्ठ सेकुलवन्ती के पूत केदारकहकर राहुल को अपनी बाँहों में भर लिया। अपनी जन्मभूमि पर एक बुजुर्ग की परिचित आवाज ने राहुल को भावविभोर कर दिया। उन्होंने अपनी डायरी में इसका उल्लेख भी किया है- ‘‘लाहौर नाना ने जब यह कहा किअरे जब भागत जाय भगइया गिरत जायतब मेरे सामने अपना बचपन नाचने लगा। उन दिनों गाँव के बच्चे छोटी पतली धोती भगई पहना करते थे। गाँववासी बड़े बुजुर्गों का यह भाव देखकर मुझे महसूस होने लगा कि तुलसी बाबा ने यह झूठ कहा है कि- "तुलसी तहाँ जाइये, जहाँ जन्म को ठाँव, भाव भगति को मरम जाने धरे पाछिलो नाँव’’

घुमक्कड़ी स्वभाव वाले राहुल सांकृत्यायन सार्वदेशिक दृष्टि की ऐसी प्रतिभा थे, जिनकी साहित्य, इतिहास, दर्शन संस्कृति सभी पर समान पकड़ थी। विलक्षण व्यक्तित्व के अद्भुत मनीषी, चिन्तक, दार्शनिक, साहित्यकार, लेखक, कर्मयोगी और सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत रूप में राहुल ने जिन्दगी के सभी पक्षों को जिया। यही कारण है कि उनकी रचनाधर्मिता शुद्ध कलावादी साहित्य नहीं है, वरन् वह समाज, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, विज्ञान, धर्म, दर्शन इत्यादि से अनुप्राणित है जो रूढ़ धारणाओं पर कुठाराघात करती है तथा जीवन-सापेक्ष बनकर समाज की प्रगतिशील शक्तियों को संगठित कर संघर्ष एवं गतिशीलता की राह दिखाती है। ऐसे मनीषी को अपने जीवन के अंतिम दिनों मेंस्मृति लोपजैसी अवस्था से गुजरना पड़ा एवं इलाज हेतु उन्हें मास्को भी ले जाया गया। पर घुमक्कड़ी को कौन बाँध पाया है, सो मार्च 1963 में वे पुन: मास्को से दिल्ली गए और 14 अप्रैल, 1963 को सत्तर वर्ष की आयु में सन्यास से साम्यवाद तक का उनका सफर पूरा हो गया पर उनका जीवन दर्शन और घुमक्कड़ी स्वभाव आज भी हमारे बीच जीवित है।

(कृष्ण कुमार यादव का यह लेख साहित्याशिल्पी पर पूर्व प्रकाशित है)

गुरुवार, मार्च 24, 2011

आजमगढ़ के मनोज यादव ने दिया ‘दे घुमा के..'


राहुल सांकृत्यायन, अल्लामा शिबली नोमानी और कैफी आजमी की धरती आजमगढ़ सदैव सुर्ख़ियों में रहती है, पर इस बार एक बेहद रचनात्मक और जोशीले वजह से। दरअसल देश में खेल से ज्यादा जुनून का दर्जा प्राप्त क्रिकेट के महाकुम्भ आईसीसी के थीम सांग लिखने का गौरव आजमगढ़ जिले के सपूत मनोज यादव को हासिल हुआ है।मनोज यादव के लिखे गीत को शंकर महादेवन ने गया है और संगीतबद्ध किया शंकर-एहसान-लाय ने। बरास्ता मनोज यादव, आजमगढ़वासी अपनी ओर अंगुली उठाने वालों को एक संदेश भी दे रहे हैं और कह रहे हैं......दे घुमा के.....!

‘दे घुमा के....आसमान में मार के डुबकी, उड़ा दे सूरज की झपकी, सर्र से चीर हवा का पर्दा बाँध ले पट्ठे जमके गर्दा.....‘ आजमगढ़ के वासी मनोज यादव के दिलो-दिमाग में जन्मा यह गीत देश को आज एक ऊर्जा, एक जोश दे रहा है। इससे आजमगढ़ की फिजां बदली-बदली सी नजर आ रही है। अब यहाँ सृजनात्मकता है, जोश है, देश की माथे की बिन्दी बनने का जज्बा है। जिले के सगड़ी तहसील के भरौली गाँव निवासी मनोज यादव की उपलब्धि पर पूरे जिले को नाज है।

बताए हैं कि मनोज यादव के पिता स्व0 हरिश्चन्द्र यादव जब मुम्बई गये थे तो उनकी आखों में तमाम सपने थे। दो पुत्रों मनोज व प्रमोद व एक पुत्री पुष्पा के पिता हरिश्चन्द्र रेमण्ड कम्पनी में सुपरवाइजर बनें। मनोज यादव ने पिता के सपनों को साकार करना सीखा और उतर गए फिल्मों-विज्ञापनों के लिए गीत व जिंगल लिखने में। गुलजार को प्रेरणा स्रोत मानने वाले मनोज की प्रतिभा को गायक शंकर महादेवन ने पहचाना और शंकर-एहसान-लाय के कहने पर ओ एण्ड एम कम्पनी ने आईसीसी वल्र्ड कप के थीम सांग को लिखने का जिम्मा सौंपा, जिसे मनोज ने बखूबी पूरा किया। गौरतलब है कि क्रिकेट विश्व कप 2011 का आयोजन भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका में 19 फरवरी 2011 से हो रहा है. इसलिए इस गीत को हिंदी, बांग्ला और सिंहली भाषाओं में तैयार किया गया.

(चित्र में मनोज यादव का गृहनगर आजमगढ़ में हुए अभिनन्दन की प्रेस कटिंग)

हम सभी की तरफ से मनोज यादव को इस सृजनात्मक उपलब्धि पर हार्दिक बधाइयाँ !!

शुक्रवार, मार्च 18, 2011

होली तेरे रूप अनेक

संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। त्यौहार जीवन के उत्सव हैं। हर संस्कार को एक उत्सव का रूप देकर उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करना भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। भारत में उत्सव व त्यौहारों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है और हर त्यौहार के पीछे एक ही भावना छिपी होती है- मानवीय गरिमा को समृद्ध करना। शायद यही कारण है कि एक समय किसी धर्म विशेष के त्यौहार माने जाने वाले पर्व आज सभी धर्मों के लोग आदर के साथ हँसी-खुशी मनाते हैं। उत्सव जीवन की लय और निरंतरता बनाते हैं। उत्सव मनते रहें इसलिए त्योहार इनके बहाने हैं।

होली भारतीय समाज का एक प्रमुख त्यौहार है, जिसका लोग बेसब्री के साथ इंतजार करते हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में होली मनाई जाती है। होली के रंग हमें प्रकृति से जोड़ते हैं। वसंत की फगुनाई के बीच घनी भूरी टहनियों पर हरे पत्तों के बीच चटक नांरगी रंग के टेसू के फूल इस उल्लास को और भी बढ़ा देते हैं। आखिर होली के रंग बनाने की शुरुआत तो इन्हीं टेसू के फूलों से ही हुई है। यह होली के समय कहाँ से और कैसे आते हैं, कोई नहीं जानता है? पर हर होली के समय आकर ये एक खुशी जरुर दे जाते हैं। जीवन के उत्सवों की भाँति इनका आना-जाना होली के रंग को और भी चटक बना जाता है। रबी की फसल की कटाई के बाद वसन्त पर्व में मादकता के अनुभवों के बीच मनाया जाने वाला होली पर्व उत्साह और उल्लास का परिचायक है। अबीर-गुलाल व रंगों के बीच भांग की मस्ती में फगुआ गाते इस दिन क्या बूढे़ व क्या बच्चे, सब एक ही रंग में रंगे नजर आते हैं।

नारद पुराण के अनुसार दैत्य राज हिरणकश्यप को यह घमंड था कि उससे सर्वश्रेष्ठ दुनिया में कोई नहीं, अतः लोगों को ईश्वर की पूजा करने की बजाय उसकी पूजा करनी चाहिए। पर उसका बेटा प्रहलाद जो कि विष्णु भक्त था, ने हिरणकश्यप की इच्छा के विरूद्ध ईश्वर की पूजा जारी रखी। हिरणकश्यप ने प्रहलाद को प्रताड़ित करने हेतु कभी उसे ऊंचे पहाड़ों से गिरवा दिया, कभी जंगली जानवरों से भरे वन में अकेला छोड़ दिया पर प्रहलाद की ईश्वरीय आस्था टस से मस न हुयी और हर बार वह ईश्वर की कृपा से सुरक्षित बच निकला। अंततः हिरणकश्यप ने अपनी बहन होलिका जिसके पास एक जादुई चुनरी थी, जिसे ओढ़ने के बाद अग्नि में भस्म न होने का वरदान प्राप्त था, की गोद में प्रहलाद को चिता में बिठा दिया ताकि प्रहलाद भस्म हो जाय। पर होनी को कुछ और ही मंजूर था, ईश्वरीय वरदान के गलत प्रयोग के चलते जादुई चुनरी ने उड़कर प्रहलाद को ढक लिया और होलिका जल कर राख हो गयी और प्रहलाद एक बार फिर ईश्वरीय कृपा से सकुशल बच निकला। दुष्ट होलिका की मृत्यु से प्रसन्न नगरवासियांे ने उसकी राख को उड़ा-उड़ा कर खुशी का इजहार किया। मान्यता है कि आधुनिक होलिकादहन और उसके बाद अबीर-गुलाल को उड़ाकर खेले जाने वाली होली इसी पौराणिक घटना का स्मृति प्रतीक है।

भविष्य पुराण में वर्णन आता है कि राजा रघु के राज्य में धुंधि नामक राक्षसी को भगवान शिव द्वारा वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु न ही देवताओं, न ही मनुष्यों, न ही हथियारों, न ही सर्दी-गर्मी-बरसात से होगी। इस वरदान के बाद उसकी दुष्टतायें बढ़ती गयीं और अंततः भगवान शिव ने ही उसे यह शाप दे दिया कि उसकी मृत्यु बालकों के उत्पात से होगी। धुंधि की दुष्टताओं से परेशान राजा रघु को उनके पुरोहित ने सुझाव दिया कि फाल्गुन मास की 15वीं तिथि को जब सर्दियों पश्चात गर्मियाँ आरम्भ होती हैं, बच्चे घरों से लकड़ियाँ व घास-फूस इत्यादि एकत्र कर ढेर बनायें और इसमें आग लगाकर खूब हल्ला-गुल्ला करें। बच्चों के ऐसा ही करने से भगवान शिव के शाप स्वरूप राक्षसी धुंधि ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। ऐसा माना जाता है कि होली का पंजाबी स्वरूप ‘धुलैंडी’ धुंधि की मृत्यु से ही जुड़ा हुआ है। आज भी इसी याद में होलिकादहन किया जाता है और लोग अपने हर बुरे कर्म इसमें भस्म कर देते हैं।

होली की रंगत बरसाने की लट्ठमार होली के बिना अधूरी ही कही जायेगी। कृष्ण-लीला भूमि होने के कारण फाल्गुन शुल्क नवमी को ब्रज में बरसाने की लट्ठमार होली का अपना अलग ही महत्व है। ब्रज में तो वसंत पंचमी के दिन ही मंदिरों में डांढ़ा गाड़े जाने के साथ ही होली का शुभारंभ हो जाता है। बरसाना में हर साल फाल्गुन शुक्ल नवमी के दिन होने वाली लट्ठमार होली देखने व राधारानी के दर्शनों की एक झलक पाने के लिए यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु व पर्यटक देश-विदेश से खिंचे चले आते हैं। इस दिन नन्दगाँव के कृष्णसखा ‘हुरिहारे’ बरसाने में होली खेलने आते हैं, जहाँ राधा की सखियाँ लाठियों से उनका स्वागत करती हैं। यहाँ होली खेलने वाले नंदगाँव के हुरियारों के हाथों में लाठियों की मार से बचने के लिए मजबूत ढाल होती है। परंपरागत वेशभूषा में सजे-धजे हुरियारों की कमर में अबीर-गुलाल की पोटलियाँ बंधी होती हैं तो दूसरी ओर बरसाना की हुरियारिनों के पास मोटे-मोटे तेल पिलाए लट्ठ होते हैं। बरसाना की रंगीली गली में पहुँचते ही हुरियारों पर चारांे ओर से टेसू के फूलों से बने रंगों की बौछार होने लगती है। परंपरागत शास्त्रीय गान ‘ढप बाजै रे लाल मतवारे को‘ का गायन होने लगता है। हुरियारे ‘फाग खेलन बरसाने आए हैं नटवर नंद किशोर‘, का गायन करते हैं तो हुरियारिनें ‘होली खेलने आयै श्याम आज जाकूं रंग में बोरै री‘, का गायन करती हैं। भीड़ के एक छोर से गोस्वामी समाज के लोग परंपरागत वाद्यों के साथ महौल को शास्त्रीय रुप देते हैं। ढप, ढोल, मृदंग की ताल पर नाचते-गाते दोनों दलों में हंसी-ठिठोली होती है। हुरियारिनें अपनी पूरी ताकत से हुरियारों पर लाठियों के वार करती हैं तो हुरियार अपनी ढालों पर लाठियों की चोट सहते हैं। हुरियारे मजबूत ढालों से अपने शरीर की रक्षा करते हैं एवं चोट लगने पर वहाँ ब्रजरज लगा लेते हैं। बरसाना की होली के दूसरे दिन फाल्गुन शुक्ल दशमी को सायंकाल ऐसी ही लट्ठमार होली नन्दगाँव में भी खेली जाती है। अन्तर मात्र इतना है कि इसमें नन्दगाँव की नारियाँ बरसाने के पुरूषों का लाठियों से सत्कार करती हैं। इसमें बरसाना के हुरियार नंदगाँव की हुरियारिनों से होली खेलने नंदगाँव पहुँचते हैं। फाल्गुन की नवमी व दशमी के दिन बरसाना व नंदगाँव के लट्ठमार आयोजनों के पश्चात होली का आकर्षण वंृदावन के मंदिरों की ओर हो जाता है, जहाँ रंगभरी एकादशी के दिन पूरे वृंदावन में हाथी पर बिठा राधावल्लभ लाल मंदिर से भगवान के स्वरुपों की सवारी निकाली जाती है। बाद में भी ठाकुर के स्वरूप पर गुलाल और केशर के छींटे डाले जाते हैं। ब्रज की होली की एक और विशेषता यह है कि धूलैड़ी मना लेने के साथ ही जहाँ देश भर में होली का खूमार टूट जाता है, वहीं ब्रज में इसके चरम पर पहुँचने की शुरुआत होती है।

फागुन में जब रंगों की फुहारें भगवान श्री कृष्ण के बरसाने के होली उत्सव की याद दिलाती हैं तो रामलीला का आयोजन कुछ अजीब लगता है, लेकिन बरेली शहर में होली के रंगो में भगवान राम के आदर्श भी गूंजते हैं। 150 से भी अधिक साल से यहाँ फागुन में वमनपुरी की रामलीला होती आ रही है। संभवतः देश में यह अकेला ऐसी रामलीला है जो होली के उपलक्ष्य में होती है। यहांँ चैत्र कृष्ण एकादशी पर रामलीला का मंचन शुरु हो जाता है और धुलंडी के दिन तक रोज विभिन्न प्रसंगों का मंचन होता है। रामलीला का समापन नृसिंह भगवान की शोभा यात्रा के साथ होता है। होली के दिन रामलीला से निकलने वाली राम बारात शहर में अनूठे रंग बिखेरती है। इसमें सौहार्द के फूल बरसते हैं। हिन्दू हो या मुस्लिम सभी पुष्पवर्षा कर राम बारात का स्वागत करते हैं। फागुनी फिजाओं में रामलीला का यह उत्सव वाकई अद्भुत है। इसी प्रकार बनारस की होली का भी अपना अलग अन्दाज है। बनारस को भगवान शिव की नगरी कहा गया है। यहाँ होली को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाते हैं और बाबा विश्वनाथ के विशिष्ट श्रृंगार के बीच भक्त भांग व बूटी का आन्नद लेते हैं।

होली को लेकर देश के विभिन्न अंचलों में तमाम मान्यतायें हैं और शायद यही विविधता में एकता की भारतीय संस्कृति का परिचायक भी है। उत्तर पूर्व भारत में होलिकादहन को भगवान कृष्ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध दिवस से जोड़कर पूतना दहन के रूप में मनाया जाता है तो दक्षिण भारत में मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने कामदेव को तीसरा नेत्र खोल भस्म कर दिया था और उनकी राख को अपने शरीर पर मल कर नृत्य किया था। तत्पश्चात कामदेव की पत्नी रति के दुख से द्रवित होकर भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया, जिससे प्रसन्न हो देवताओं ने रंगों की वर्षा की। इसी कारण होली की पूर्व संध्या पर दक्षिण भारत र्में अिग्न प्रज्वलित कर उसमें गन्ना, आम की बौर और चन्दन डाला जाता है। यहाँ गन्ना कामदेव के धनुष, आम की बौर कामदेव के बाण, प्रज्वलित अग्नि शिव द्वारा कामदेव का दहन एवं चन्दन की आहुति कामदेव को आग से हुई जलन हेतु शांत करने का प्रतीक है। मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में अवस्थित धूंधड़का गाँव में होली तो बिना रंगों के खेली जाती है और होलिकादहन के दूसरे दिन ग्रामवासी अमल कंसूबा (अफीम का पानी) को प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं और सभी ग्रामीण मिलकर उन घरों में जाते हैं जहाँ बीते वर्ष में परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो चुकी होती है। उस परिवार को सांत्वना देने के साथ होली की खुशी में शामिल किया जाता है।

कानपुर में होली का अपना अलग ही इतिहास है। यहाँ अवस्थित जाजमऊ और उससे लगे बारह गाँवों में पाँच दिन बाद होली खेली जाती है। बताया जाता है कि कुतुबुद्दीन ऐबक की हुकुमत के दौरान ईरान के शहर जंजान के शहर काजी सिराजुद्दीन के शिष्यों के जाजमऊ पहुँचने पर तत्कालीन राजा ने उन्हें जाजमऊ छोड़ने का हुक्म दिया तो दोनो पक्षों में जंग आरम्भ हो गई। इसी जंग के बीच राजा जाज का किला पलट गया और किले के लोग मारे गये। संयोग से उस दिन होली थी पर इस दुखद घटना के चलते नगरवासियों ने निर्णय लिया कि वे पाँचवें दिन होली खेलेंगे, तभी से यहाँ होली के पाँचवें दिन पंचमी का मेला लगता है। इसी प्रकार वर्ष 1923 के दौरान होली मेले के आयोजन को लेकर कानपुर के हटिया में चन्द बुद्धिजीवियों व्यापारियों और साहित्यकारों (गुलाबचन्द्र सेठ, जागेश्वर त्रिवेदी, पं0 मुंशीराम शर्मा ‘सोम’, रघुबर दयाल, बाल कृष्ण शर्मा ‘नवीन’, श्याम लाल गुप्त ‘पार्षद’, बुद्धूलाल मेहरोत्रा और हामिद खाँ) की एक बैठक हो रही थी। तभी पुलिस ने इन आठों लोगों को हुकूमत के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में गिरफतार करके सरसैया घाट स्थित जिला कारागार में बन्द कर दिया। इनकी गिरफ्तारी का कानपुर की जनता ने भरपूर विरोध किया। आठ दिनों पश्चात् जब उन्हें रिहा किया गया, तो उस समय ‘अनुराधा-नक्षत्र’ लगा हुआ था। जैसे ही इनके रिहा होने की खबर लोगों तक पहुँची, लोग कारागार के फाटक पर पहुँच गये। उस दिन वहीं पर मारे खुशी के पवित्र गंगा जल में स्नान करके अबीर-गुलाल और रंगों की होली खेली। देखते ही देखते गंगा तट पर मेला सा लग गया। तभी से परम्परा है कि होली से अनुराधा नक्षत्र तक कानपुर में होली की मस्ती छायी रहती है और आठवें दिन प्रतिवर्ष गंगा तट पर गंगा मेले का आयोजन किया जाता है।

पग-पग पर बदले बोली, पग-पग पर बदले भेष, वाले भारतवर्ष में होली का त्यौहार धूम-धाम से विभिन्न रंगों में मनाया जाता है। भारतीय उत्सवों को लोकरस और लोकानंद का मेल कहा गया है। भूमण्डलीकरण और उपभोक्तावाद के बढ़ते दायरों के बीच इस रस और आनंद में डूबा भारतीय जन-मानस आज भी न तो बड़े-बड़े माल और क्लबों में मनने वाले फेस्ट से चहकार भरता है और न ही किसी कम्पनी के सेल आफर को लेकर आन्तरिक उल्लास से भरता है। होली पर्व के पीछे तमाम धार्मिक मान्यताएं, मिथक, परम्पराएं और ऐतिहासिक घटनाएं छुपी हुई हैं पर अंततः इस पर्व का उद्देश्य मानव-कल्याण ही है। लोकसंगीत, नृत्य, नाट्य, लोककथाओं, किस्से-कहानियों और यहाँ तक कि मुहावरों में भी होली के पीछे छिपे संस्कारों, मान्यताओं व दिलचस्प पहलुओं की झलक मिलती है। नए वó, नया श्रृंगार और लज़ीज़ पकवानों के बीच होली पर्व मनाने का एक मनोवैज्ञानिक कारण भी गिनाया जाता है कि यह पर्व के बहाने समाज एवं व्यक्तियों के अन्दर से कुप्रवृत्तियों एवं गन्दगी को बाहर निकालने का माध्यम है। होली पर खेले गए रंग गन्दगी के नहीं बल्कि इस विचार के प्रतीक हैं कि इन रंगों के धुलने के साथ-साथ व्यक्ति अपने राग-द्वेष भी धुल दे। होली पर रंग-पुते चेहरों की भी अपनी महत्ता है। एक तरफ ये हास्य की सृष्टि में सहायक होते हैं वहीँ दूसरों को रंगने या मूर्ख बनाने की चेष्टा में खुद को रँगा जाना या मूर्ख बन जाना, रंग लगाने के बहाने थोड़ी छूट लेने के प्रयास में पकड़े जाना और उपहास का पात्र बनना-ये सब क्रिया-कलाप करने वालों को और देखने वाले को भी गुदगुदाते हैं। सही रूप में देखें तो होली के माध्यम से जीवन में व्याप्त निराशाजनक विचारों से मुक्त होकर नए आशावादी विचारों के साथ उल्लासपूर्वक जीवन का आरंभ संभव है। यही कारण है कि रंगों को धुलने के बाद लोग मस्ती में फगुआ गाते हैं और एक दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर भाईचारे का प्रदर्शन करते हैं। आज जब चारों तरफ आतंक और खून की होली खेली जा रही है, वहां रंगों का यह त्योहार यह सन्देश भी देता है कि इंसानियत का रंग एक ही है। हंसी खुशी, उल्लास का रंग एक है।

साभार : कृष्ण कुमार यादव : हमारीवाणी

मंगलवार, मार्च 08, 2011

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक कविता


आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की 101 वीं वर्षगांठ है. इस अवसर पर एक कविता 'शब्द-सृजन की ओर' ब्लॉग पर लिखी. इसे यहाँ भी प्रस्तुत कर रहा हूँ-

नहीं हूँ मैं माँस-मज्जा का एक पिंड
जिसे जब तुम चाहो जला दोगे
नहीं हूँ मैं एक शरीर मात्र
जिसे जब तुम चाहो भोग लोगे
नहीं हूँ मैं शादी के नाम पर अर्पित कन्या
जिसे जब तुम चाहो छोड़ दोगे
नहीं हूँ मैं कपड़ों में लिपटी एक चीज
जिसे जब तुम चाहो तमाशा बना दोगे।

मैं एक भाव हूँ, विचार हूँ
मेरा एक स्वतंत्र अस्तित्व है
ठीक वैसे ही, जैसे तुम्हारा
अगर तुम्हारे बिना दुनिया नहीं है
तो मेरे बिना भी यह दुनिया नहीं है।

फिर बताओं
तुम क्यों अबला मानते हो मुझे
क्यों पग-पग पर तिरस्कृत करते हो मुझे
क्या देह का बल ही सब कुछ है
आत्मबल कुछ नहीं
खामोश क्यों हो
जवाब क्यों नहीं देते........?

बुधवार, मार्च 02, 2011

आजमगढ़ की आकांक्षा यादव को 'न्यू ऋतंभरा भारत-भारती साहित्य सम्मान'


युवा कवयित्री एवँ साहित्यकार सुश्री आकांक्षा यादव को हिन्दी साहित्य में प्रखर रचनात्मकता एवँ अनुपम कृतित्व के लिए छत्तीसगढ़ की प्रमुख साहित्यिक संस्था न्यू ऋतंभरा साहित्य मंच, दुर्ग द्वारा ''भारत-भारती साहित्य सम्मान-2010'' से सम्मानित किया गया है। गौरतलब है कि सुश्री आकांक्षा यादव की आरंभिक रचनाएँ दैनिक जागरण और कादम्बिनी में प्रकाशित हुई और फ़िलहाल वे देश की शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवँ सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली सुश्री आकांक्षा यादव के लेख, कवितायेँ और लघुकथाएं जहाँ तमाम संकलनों/पुस्तकों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीँ आपकी तमाम रचनाएँ आकाशवाणी से भी तरंगित हुई हैं। पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ अंतर्जाल पर भी सक्रिय सुश्री आकांक्षा यादव की रचनाएँ इंटरनेट पर तमाम वेब/ ई-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर भी पढ़ी-देखी जा सकती हैं।

आपकी तमाम रचनाओं के लिंक विकिपीडिया पर भी दिए गए हैं। 'शब्द-शिखर', 'सप्तरंगी-प्रेम', 'बाल-दुनिया' और 'उत्सव के रंग' ब्लॉग आप द्वारा संचालित/सम्पादित हैं। 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' पुस्तक का संपादन करने वाली सुश्री आकांक्षा के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ. राष्ट्रबन्धु जी ने ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है।

मूलत: उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में प्रवक्ता सुश्री आकांक्षा यादव वर्तमान में अपने पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ अंडमान-निकोबार में रह रही हैं और वहाँ रहकर भी हिन्दी को समृद्ध कर रही हैं। श्री यादव भी हिन्दी की युवा पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं। एक रचनाकार के रूप में बात करें तो सुश्री आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।

सुश्री आकांक्षा यादव को इससे पूर्व भी विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘, ‘‘एस0एम0एस0‘‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवँ कला परिषद द्वारा ‘‘शब्द माधुरी‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘‘आसरा‘‘ द्वारा ‘‘ब्रज-शिरोमणि‘‘ सम्मान, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘‘भारत गौरव‘‘, अभिव्यंजना संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘काव्य-कुमुद‘‘, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ’महिमा साहित्य भूषण सम्मान’, अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था, ठाणे, महाराष्ट्र द्वारा ‘‘सरस्वती रत्न‘‘, अन्तज्र्योति सेवा संस्थान गोला-गोकर्णनाथ, खीरी द्वारा श्रेष्ठ कवयित्री की मानद उपाधि इत्यादि प्रमुख हैं। सुश्री आकांक्षा यादव को इस अलंकरण हेतु हार्दिक बधाईयाँ।