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रविवार, नवंबर 03, 2013

हे दीप मालिके तेरा स्वागत



हे दीप मालिके तेरा स्वागत,

अभिनंदन

तेरी आगवानी में बिछी पलकें ,

तेरा वंदन।

अपनी जहाँ में बरसे खुशियाँ

हर घर आंगन,

दीनता हो कोसो दूर,

हर दिल बसे स्वर्णिम सद्भावना ,

जातिवाद अब ना

समता की उपजे हर दिल सदभावना ,

दुनिया जाने

जातिवाद कुचला है मनोकामना,

दीप मालिके मिट जाए

अपनी जहां से हर तम,

अपनी जहॉ में दीप मालिके,

तेरा आना मंगलमय हो 
,
तेरा अभिनंदन दीप मालिके

पूरी होवे मनोकामना।


- डा . नन्दलाल भारती -

मंगलवार, मार्च 08, 2011

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक कविता


आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की 101 वीं वर्षगांठ है. इस अवसर पर एक कविता 'शब्द-सृजन की ओर' ब्लॉग पर लिखी. इसे यहाँ भी प्रस्तुत कर रहा हूँ-

नहीं हूँ मैं माँस-मज्जा का एक पिंड
जिसे जब तुम चाहो जला दोगे
नहीं हूँ मैं एक शरीर मात्र
जिसे जब तुम चाहो भोग लोगे
नहीं हूँ मैं शादी के नाम पर अर्पित कन्या
जिसे जब तुम चाहो छोड़ दोगे
नहीं हूँ मैं कपड़ों में लिपटी एक चीज
जिसे जब तुम चाहो तमाशा बना दोगे।

मैं एक भाव हूँ, विचार हूँ
मेरा एक स्वतंत्र अस्तित्व है
ठीक वैसे ही, जैसे तुम्हारा
अगर तुम्हारे बिना दुनिया नहीं है
तो मेरे बिना भी यह दुनिया नहीं है।

फिर बताओं
तुम क्यों अबला मानते हो मुझे
क्यों पग-पग पर तिरस्कृत करते हो मुझे
क्या देह का बल ही सब कुछ है
आत्मबल कुछ नहीं
खामोश क्यों हो
जवाब क्यों नहीं देते........?

रविवार, दिसंबर 26, 2010

रमिया काकी !

( हमारे गाँव की रमिया काकी जो पुरे गाँव में सबके दुःख -सुख की साथी थी,  मगर अपने ही घर में दर- बदर . उनके ऊपर मैंने ये कविता ८ मई  १९९७ को लिखी थी.............)

तुमने भी तो काटा था बनवास
मगर किसी ने भी तो
नहीं कहा सीता सा तुम्हें
गलाया यौवन को
जवानी को दहलीज पर
किस तप से कम था
तुम्हारा वो तप
मगर किसी ने भी तो नहीं
अहिल्या सा कहा
तुमने अपने खून की
एक- एक बूँद को
निंचोड़ डाला था
बनाकर पसीना
अपने लिए नहीं
सिर्फ दूसरों को
जिंदा रखने के लिए
हार गया था यमराज
तुम्हारे सामने भी
मगर किसी ने भी तो नहीं
सावित्री सा कहा
मौत को जीता तुमने
अपने लिए नहीं
वरना औरों के लिए
मगर तुम भुला दी गयी
हक़दार कोई और हो गया
तुम्हारे वजूद का. . 
                      ( उपेन्द्र ' उपेन ' )