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मंगलवार, जुलाई 03, 2012

आजमगढ़ के वरिष्ठ दलित साहित्यकार डॉ.तुलसीराम की आत्मकथा 'मुर्दहिया'

डॉ.तुलसीराम की आत्मकथा 'मुर्दहिया' अभी हाल ही में पुस्तक रूप में हमारे सामने प्रस्तुत हुई। इसके पहले यह सात खंडों में 'तद्भव' में प्रकाशित हो रही थी। साहित्य में आत्मकथा लेखन बहुत पुरानी विधा है। कई वर्षों से दलित आत्मकथाओं ने साहित्य जगत के बंधे-बंधाये मानदण्डों को तोड़कर अपने जीवन से जुड़े उस सच्चे और कड़ुवे यथार्थ को सबके सामने उजागर करने का प्रयास किया जिसे उन्होंने स्वयं झेला। डॉ. तुलसीराम ने अपनी इस आत्मकथा को सात उपशीर्षकों के माध्यम से अपने जीवन के एक-एक पड़ाव को पाठकों के सामने रखा है। तुलसीराम की यह आत्मकथा दलित समाज को और उस समय की परंपरा को प्रकट करती है। उन्होंने अपने प्रथम खण्ड 'भुतही पारिवारिक पृष्ठभूमि' के माध्यम से यह दिखाया है कि किस प्रकार समाज में भूत-प्रेत और अंधविश्वास का कड़ा मायाजाल समाज में एक न ठीक होने वाले रोग की तरह पफैला हुआ था और ऐसे ही समय में इसी दलित समाज में उनका जन्म हुआ। कहते हैं व्यक्ति जिस परिवेश में पला-बढ़ा होता है उसका असर उस पर अवश्य दिखाई देता है, पिफर इस उपर्युक्त कहे हुए मूर्खताजन्य और अंधविश्वास से तुलसीराम कैसे अछूते रह सकते थे। उन्होंने अपने इस प्रथम खण्ड में यह स्पष्ट कर दिया कि दलित और सवर्ण के भगवान अलग-अलग होते हैं और उनकी पूजा-अर्चना, प्रसाद और हर विधि अपना अलग स्थान रखती है। वे देवी-देवता के साथ भूतों को भी बहुत मानते हैं और डर के वशीभूत होकर जाने-अनजाने अपना और अपनों की क्षति कर डालते हैं। उन्हें इस बात का बिल्कुल ज्ञान नहीं होता कि क्या उचित है या क्या अनुचित? जिस के चलते तुलसी राम को चेचक जैसी भयानक बीमारी से अपनी एक आँख गंवानी पड़ती है जिसके चलते समाज उन्हें अपशगुन मानने लगा। तुलसी ने 'मुर्दहिया' आत्मकथा की भूमिका में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि 'यह सही मायनों में हमारी दलित बस्ती की ज़िंदगी थी।' इस ज़िंदगी को आत्मकथा के माध्यम से मैंने बाहर निकाला। उन्होंने बड़े विस्मयकारी ढंग से अपनी स्कूली शिक्षा के बारे में बताया है कि किस प्रकार ब्राह्मणों द्वारा किसी की आयी चिट्ठी को पढ़ने के दौरान कैसी अपमानजनक बातों का सामना करना पड़ता था। जिससे ऊबकर द्घरवालों ने उनका नाम प्राइमरी विद्यालय में लिखवाया था कि कम से कम किसी की चिट्ठी-पत्राी को पढ़ने के लिए ब्राह्मणों की गाली-गलौज का सामना तो नहीं करना पड़ेगा। यहीं से प्रारंभ होती है तुलसीराम की कष्टकारी शिक्षा यात्राा।

तुलसीराम ने इस आत्मकथा के दूसरे अंश 'मुर्दहिया तथा स्कूली जीवन' में शिक्षा के लिए किया जा रहा संद्घर्ष और उसमें गाँव से थोड़ा दूर स्थित मुर्दहिया की चौंकाने वाली द्घटनाओं को उदात्त रूप में प्रस्तुत किया। उस समय शिक्षा में ब्राह्मणों ने एक क्षत्राराज स्थापित कर लिया था और यदि कोई दलित या नीच जाति के व्यक्ति को स्कूल में दाखिला मिल भी जाता था तो उसे जातिसूचक शब्द या भद्दी गालियों से पुकारा जाता था। 'शुरू-शुरू में अधिकतर बच्चे 'उपस्थित' शब्द का उच्चारण नहीं कर पाते थे जिस पर मुंशी जी अविलंब गालियों की बौछार कर देते थे। विशेषकर दलित बच्चों को वे 'चमरकिट' कह कर अपना गुस्सा प्रकट करते थे' ;मुर्दहिया, डॉ. तुलसीराम, राजकमल प्रकाश, पृष्ठ-२४द्ध।

आजमगढ़ जिला के धरमपुर गाँव की सामाजिक और उस जिले की राजनीतिक माहौल का तुलसीराम के व्यक्तित्व पर बहुत गहरा असर दृष्टिगत होता है। यही उनके व्यक्तित्वके निर्माण में सहायक सि( हुआ। एक दिन तुलसीराम ने अपने मुन्नर चाचा को यह कहते हुए सुना कि 'अब भारत में समोही खेती होई, और सब कमाई सब खाई, नेहरू जी करखन्ना खोलिहीं आ पाँच साल में योजना बनइहीं। पहले हकबट होई पिफर चकबट'। ;वही, पृष्ठ-३७द्ध
तुलसीराम इस बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि सारी बातें तो मुझे समझ में नहीं आई 'किंतु 'हकबट' तथा 'चकबट' और 'सब कमाई सब खाई' मुझे अच्छी तरह समझ में आया था तथा यह भी कि यह सब रूस की देन है।' ;वही, पृष्ठ-३८द्ध ऐसा माना जाता है कि वर्तमान, अतीत के विचारों और कर्मों से मिलकर तैयार होता है। इसलिए आत्म कथा में व्यक्ति और समाज दोनों का इतिहास दिखाई पड़ता है।

तुलसीराम ने 'मुर्दहिया' के तीसरे अंश 'अकाल में अंध विश्वास' के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों को प्रस्तुत किया है। रचनाकार ने अपने आत्म के साथ-साथ समाज, उसका रहन-सहन, अंधविश्वास, ऊँच-नीच का भेदभाव जैसी अनेक समस्याओं को उभारा है। कह सकते हैं कि 'आत्मकथा में कई बार आत्म महत्वपूर्ण नहीं रह जाता उसके बहाने समय और समाज की कहानी कही जाती है, उनके विकास क्रम का चित्राण किया जाता है।' ;आत्मकथा की संस्कृति, पंकज चतुर्वेदी, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ-१९द्ध। इस आत्मकथा के चौथे अंश 'मुर्दहिया के गि( तथा लोक जीवन' और पाँचवें अंश 'भुतनिया नागिन' में तथा उपर्युक्त तीनों अंश में अकाल के समय की परेशानियों को प्रस्तुत किया है तथा यह भी दिखाया है कि ग्रामीण परिवेश के इन अनपढ़ लोगों में पफैला भूत-प्रेत का डर किस कदर इनके सामान्य जीवन को प्रभावित करता है। जिसके कारण इनका जीवन बद से बदतर हो जाता है। 'एक अंधविश्वास के चलते लोग बत्तख नामक पालतू पक्षी को बच्चे के ऊपर बैठने पर मजबूर करते हैं। इसमें मान्यता यह थी कि चुड़ैल भाग जाएगी। इन बीमार बच्चों को कोई दवा नहीं दी जाती। इस तरह कई बच्चे मर जाते, पिफर हुल्लड़ मच जाता कि चुड़ैल ने बच्चों को खा लिया।' ;वही, पृष्ठ-७४द्ध इन सबके अलावा तुलसीराम ने दलित समाज की संस्कृति, रीति-रिवाज, तीज-त्योहार के माध्यम से उनके समाज को प्रस्तुत किया है। इन सारी कुरीतियों, अंधविश्वासों के बीच तुलसीराम की शिक्षा धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। जिसमें अड़चनें तो बहुत थीं। लेकिन पढ़ाई में होशियार होने की वजह से उन्हें उसका पफल भी मिल रहा था।

'मुर्दहिया' आत्मकथा का छठवाँ अंश 'चले बु( की राह' और सातवाँ अंश 'आजमगढ़ की पफाकाकशी' ने तुलसीराम के जीवन में एक नया मोड़ ला दिया। रचनाकार ने नौवीं कक्षा में गौतम बु(, अब्राहम लिंकन, गाँधी, नेहरू आदि महापुरुषों के बारे में जाना। पर तुलसीराम बु( से इतना प्रभावित हुए कि उनका बालमन हमेशा वैसी ही कल्पना करने लगा। 'बस एक ही धुन हरदम सवार थी कि हाईस्कूल समाप्त हो और मैं बु( की तरह द्घर से भाग जाऊँ। इस प्रक्रिया में मैं एकांतवासी होने लगा।' ;वही, पृष्ठ-१४५द्ध वह भी शिक्षा के लिए द्घर त्यागते हैं लेकिन परिस्थिति से मजबूर वापस आ जाते हैं। इन्हीं सारी परेशानियों से जूझते हुए तुलसीराम बु(, अम्बेडकर और मार्क्स से प्रभावित अपने जीवन से संद्घर्ष करते हुए आगे बढ़ते हैं। शिक्षा, साहित्य और भूमि आदि साधनों से वंचित और सामाजिक गतिविधियों से अलग-थलग दलितों को मजदूरों की श्रेणी में रखा गया। तुलसीराम ने इस आत्मकथा में दलित जीवन की उस सशक्त भूमि को अपनी लेखनी का माध्यम बनाया। इस आत्मकथा में मार्क्सवादी चिंतन का प्रभाव दृष्टिगत होता है।

निसंदेह तुलसीराम ने इस आत्मकथा में विरोधी परिस्थितियों में अदम्य जिजीविषा और जीवन संद्घर्ष की झलक दिखाई है। आत्मकथा समाज परिवर्तन की मांग करती है। यह कोई मनबहलाव की पुस्तक नहीं है बल्कि इस पर गहराई से सोचना होगा। इसके साथ ही 'मुर्दहिया' के अगले अंक की प्रतीक्षा भी है। तुलसीराम ने अपनी इस आत्मकथा की भूमिका में यह अंकित किया है कि 'जाहिर है, अब पहले जैसी उनकी पूजा नहीं होती। बढ़ते हुए शहरीकरण ने हर एक के जीवन को प्रभावित किया है। भूत भी इससे अछूते नहीं हैं।' दलित चिंतन की और भी बातें इस आत्मकथा के अगले अंक में हमारे सामने प्रस्तुत होंगी। 'मुर्दहिया' के लिए कहा जा सकता है कि यह उन आलोचकों के लिए करारा जवाब है जो दलित साहित्य में मानवीय मूल्यों की उपेक्षा करते हैं। यह आत्मकथा पूरे दलित समाज के अदम्य जीवन संदर्भ के साथ आगे बढ़ने का संदेश देती है तथा यह भी बताती है कि जो नारकीय या दासतापूर्ण जीवन दलितों को मिला है उसमें व्यक्ति विशेष का नहीं बल्कि व्यवस्था का अपराध है।

मुर्दहिया/डॉ. तुलसीराम/राजकमल प्रकाशन, दिल्ली/समीक्षक -सरिता रावत,म.गां.अं.हि.वि.वि,वर्धा ;महाराष्ट्रद्ध
साभार : पाखी

मंगलवार, मई 08, 2012

'जंगल में क्रिकेट' और 'चाँद पर पानी' : कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रह लोकार्पित

आजमगढ़ से जुड़े युगल दंपत्ति एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रह 'जंगल में क्रिकेट' एवं 'चाँद पर पानी' का विमोचन पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह और डा. रत्नाकर पाण्डेय (पूर्व सांसद) ने राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास एवं भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्, नई दिल्ली द्वारा गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में 27 अप्रैल, 2012 को किया. उद्योग नगर प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित इन दोनों बाल-गीत संग्रहों में कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के 30 -30 बाल-गीत संगृहीत हैं.
इस अवसर पर दोनों संग्रहों का विमोचन करते हुए अपने उद्बोधन में पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने युगल दम्पति की हिंदी साहित्य के प्रति समर्पण की सराहना की. उन्होंने कहा कि बाल-साहित्य बच्चों में स्वस्थ संस्कार रोपता है, अत: इसे बढ़ावा दिए जाने क़ी जरुरत है. पूर्व सांसद डा. रत्नाकर पाण्डेय ने युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति बढती अरुचि पर चिंता जताते हुए कहा कि, यह प्रसन्नता का विषय है कि भारतीय डाक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होते हुए भी श्री यादव अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं और यह बात उनकी कविताओं में भी झलकती है. युगल दम्पति के बाल-गीत संग्रह क़ी प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें आज का बचपन है और बीते कल का भी और यही बात इन संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है.
कार्यक्रम में राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास के संयोजक डा. उमाशंकर मिश्र ने कहा कि यदि युगल दंपत्ति आज यहाँ उपस्थित रहते तो कार्यक्रम कि रौनक और भी बढ़ जाती. गौरतलब है कि अपनी पूर्व व्यस्तताओं के चलते यादव दंपत्ति इस कार्यक्रम में शरीक न हो सके. आभार ज्ञापन उद्योग नगर प्रकाशन के विकास मिश्र द्वारा किया गया. इस कार्यक्रम में तमाम साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार इत्यादि उपस्थित थे.

- रत्नेश कुमार मौर्या
mauryark@indiatimes.com
http://shabdasahitya.blogspot.in/

मंगलवार, जून 28, 2011

चर्चित साहित्यकार व ब्लॉगर कृष्ण कुमार यादव के संपादन में प्रकाशित 'सरस्वती सुमन' का लघुकथा अंक अंडमान में लोकार्पित

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘चेतना’ के तत्वाधान में स्वर्गीय सरस्वती सिंह की 11 वीं पुण्यतिथि पर 26 जून, 2011 को मेगापोड नेस्ट रिसार्ट में आयोजित एक कार्यक्रम में देहरादून से प्रकाशित 'सरस्वती सुमन' पत्रिका के लघुकथा विशेषांक का विमोचन किया गया. इस अवसर पर ''बदलते दौर में साहित्य के सरोकार'' विषय पर संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में श्री एस. एस. चौधरी, प्रधान वन सचिव, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, अध्यक्षता देहरादून से पधारे डा. आनंद सुमन 'सिंह', प्रधान संपादक-सरस्वती सुमन एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर एवं डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर उपस्थित रहे. कार्यक्रम का आरंभ पुण्य तिथि पर स्वर्गीय सरस्वती सिंह के स्मरण और तत्पश्चात उनकी स्मृति में जारी पत्रिका 'सरस्वती सुमन' के लघुकथा विशेषांक के विमोचन से हुआ. इस विशेषांक का अतिथि संपादन चर्चित साहित्यकार और द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव द्वारा किया गया है. अपने संबोधन में मुख्य अतिथि एवं द्वीप समूह के प्रधान वन सचिव श्री एस.एस. चौधरी ने कहा कि सामाजिक मूल्यों में लगातार गिरावट के कारण चिंताजनक स्थिति पैदा हो गई है । >ऐसे में साहित्यकारों को अपनी लेखनी के माध्यम से जन जागरण अभियान शुरू करना चाहिए । उन्होंने कहा कि आज के समय में लघु कथाओं का विशेष महत्व है क्योंकि इस विधा में कम से कम शब्दों के माध्यम से एक बड़े घटनाक्रम को समझने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि देश-विदेश के 126 लघुकथाकारों की लघुकथाओं और 10 सारगर्भित आलेखों को समेटे सरस्वती सुमन के इस अंक का सुदूर अंडमान से संपादन आपने आप में एक गौरवमयी उपलब्धि मानी जानी चाहिए.

मूलत: आजमगढ़ के वासी युवा साहित्यकार एवं निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव ने बदलते दौर में लघुकथाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भूमण्डलीकरण एवं उपभोक्तावाद के इस दौर में साहित्य को संवेदना के उच्च स्तर को जीवन्त रखते हुए समकालीन समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने आप में समेटकर देखना चाहिए एवं साहित्यकार के सत्य और समाज के सत्य को मानवीय संवेदना की गहराई से भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिये। श्री यादव ने समाज के साथ-साथ साहित्य पर भी संकट की चर्चा की और कहा कि संवेदनात्मक सहजता व अनुभवीय आत्मीयता की बजाय साहित्य जटिल उपमानों और रूपकों में उलझा जा रहा है, ऐसे में इस ओर सभी को विचार करने की जरुरत है.

संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर ने कहा कि साहित्य के क्षेत्र में समग्रता के स्थान पर सीमित सोच के कारण उन विषयों पर लेखन होने लगा है जिनका सामाजिक उत्थान और जन कल्याण से कोई सरोकार नहीं है । केंद्रीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के निदेशक डा. आर. सी. श्रीवास्तव ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि आज बड़े पैमाने पर लेखन हो रहा है लेकिन रचनाकारों के सामने प्रकाशन और पुस्तकों के वितरण की समस्या आज भी मौजूद है । उन्होंने समाज में नैतिकता और मूल्यों के संर्वधन में साहित्य के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला । डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय ने अंडमान के सन्दर्भ में भाषाओँ और साहित्य की चर्चा करते हुए कहा कि यहाँ हिंदी का एक दूसरा ही रूप उभर कर सामने आया है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि साहित्य का एक विज्ञान है और यही उसे दृढ़ता भी देता है.अंडमान से प्रकाशित एकमात्र साहित्यिक पत्रिका 'द्वीप लहरी' के संपादक डा. व्यास मणि त्रिपाठी ने ने साहित्य में उभरते दलित विमर्श, नारी विमर्श, विकलांग विमर्श को केन्द्रीय विमर्श से जोड़कर चर्चा की और बदलते दौर में इसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया. उन्होंने साहित्य पर हावी होते बाजारवाद की भी चर्चा की और कहा कि कला व साहित्य को बढ़ावा देने के लिए लोगों को आगे आना होगा। पूर्व प्राचार्य डा. संत प्रसाद राय ने कहा कि कहा कि समाज और साहित्य एक सिक्के के दो पहलू हैं और इनमें से यदि किसी एक पर भी संकट आता है, तो दूसरा उससे अछूता नहीं रह सकता।

कार्यक्रम के अंत में अपने अध्यक्षीय संबोधन में ‘‘सरस्वती सुमन’’ पत्रिका के प्रधान सम्पादक डाॅ0 आनंद सुमन सिंह ने पत्रिका के लघु कथा विशेषांक के सुन्दर संपादन के लिए श्री कृष्ण कुमार यादव को बधाई देते हुए कहा कि कभी 'काला-पानी' कहे जानी वाली यह धरती क्रन्तिकारी साहित्य को अपने में समेटे हुए है, ऐसे में 'सरस्वती सुमन' पत्रिका भविष्य में अंडमान-निकोबार पर एक विशेषांक केन्द्रित कर उसमें एक आहुति देने का प्रयास करेगी. उन्होंने कहा कि सुदूर विगत समय में राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम घटनाएं घटी हैं और साहित्य इनसे अछूता नहीं रह सकता है। अपने देश में जिस तरह से लोगों में पाश्चात्य संस्कृति के प्रति अनुराग बढ़ रहा है, वह चिन्ताजनक है एवं इस स्तर पर साहित्य को प्रभावी भूमिका का निर्वहन करना होगा। उन्होंने रचनाकरों से अपील की कि वे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर स्वास्थ्य समाज के निर्माण में अपनी रचनात्मक भूमिका निभाएं। इस अवसर पर डा. सिंह ने द्वीप समूह में साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए और स्व. सरस्वती सिंह की स्मृति में पुस्तकालय खोलने हेतु अपनी ओर से हर संभव सहयोग देने का आश्वासन दिया।

कार्यक्रम के आरंभ में संस्था के संस्थापक महासचिव दुर्ग विजय सिंह दीप ने अतिथियों और उपस्थिति का स्वागत करते हुए आज के दौर में हो रहे सामाजिक अवमूल्यन पर चिंता व्यक्त की । कार्यक्रम का संचालन संस्था के उपाध्यक्ष अशोक कुमार सिंह ने किया और संस्था की निगरानी समिति के सदस्य आई.ए. खान ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर विभिन्न द्वीपों से आये तमाम साहित्यकार, पत्रकार व बुद्धिजीवी उपस्थित थे.

प्रस्तुति : दुर्ग विजय सिंह दीप
संयोजक- 'चेतना' (सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था)
उपनिदेशक- आकाशवाणी (समाचार अनुभाग)
पोर्टब्लेयर -744102