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रविवार, अप्रैल 24, 2011

पुल जो जोड़ने के लिए तरस रहा हैं. ---- तारकेश्वर गिरी.

आजमगढ़ मुख्यालय से लगभग ८ किलोमीटर उत्तर कि दिशा में आजमगढ़ - गोरखपुर मार्ग पर एक छोटी सी जगह हैं जिसे बनकट कहते हैं , बनकट एक छोटी सी बाज़ार हैं जो कि थाना मुबारक पुर से जुड़ा हुआ हैं. लेकिन मुबारक पुर जाने के लिए लगभग २० किलोमीटर घूम के जाना पड़ता हैं, अगर सीधे रास्ते से जाये तो बनकट से मुबारक पुर कि दुरी मात्र ८ किलोमीटर ही पड़ेगी. लेकिन उसके लिए टौंस नदी को पार करना जरुरी होता हैं.

पहले लोग टौंस नदी को नाव से पार करते थे मगर आज कल लोग नदी को पार करने के लिए पुल का सहारा लेते हैं. लेकिन सिर्फ पैदल या साईकिल या मोटर साईकिल से ही.

आज से लगभग दस साल पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्राम लारो -बलिया और विन्द मठिया व्यास गिरी गाँव के बीच टौंस नदी पर
एक बहुत ही खुबसूरत और मजबूत पुल बनवा रखा हैं. लेकिन सदियों से प्रशाशन कि उपेक्षा का शिकार रहा ये क्षेत्र आज भी लाचार हैं.

पिछले दो बार से बसपा के विधयाक और अब मंत्री रहे चंद्रदेव राम यादव उर्फ़ कैरैली उर्फ़ मेनेजर को और आजमगढ़ प्रशाशन को सिर्फ अपनी जेब भरना ही याद रहता हैं.

में ईस लेख के साथ गूगल का लिंक भी दे रहा हूँ, आप उस लिंक को खोल करके खुद देख सकते हैं कि किसी तरह से पुल के दोनों तरफ सड़क का अभाव हैं.

http://maps.google.com/maps?ll=26.115791,83.256961&spn=0.00132,0.001725&t=h&z=19&lci=com.panoramio.all

बुधवार, अप्रैल 20, 2011

आज फिर मौका मिला आजमगढ़ जाने का. ----------तारकेश्वर गिरी.

पुरे दस महीने व्यस्त रहने के बाद आज फिर मौका मिला हैं आजमगढ़ जाने का. दिल्ली कि भाग दौड़ कभी कभी तो बिना किसी काम के भी व्यस्त रहना ( दिल्ली वालो कि आदत हैं). खैर जैसे -जैसे शाम हो रही हैं उसी तरह से अपने गाँव कि यादे ताजा होती जा रही हैं. मन में फिर वही उठा पटक .

हर महीने माता जी से कहता रहा कि ईस महीने तो पक्का आऊंगा, मगर वो महीना भी पहले कि तरह निकलता चला गया. लेकिन ईस बार कुछ ऐसा जोश आया कि सारे काम छोड़ कर आज तैयारी कर ही ली.

मंगलवार, अप्रैल 19, 2011

राम शिव मूर्ति यादव को ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011‘ सम्मान

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित चारबाग के रवीन्द्रालय सभागार में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में प्रखर लेखक एवं समाज सेवी श्री राम शिव मूर्ति यादव को ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011‘ से सम्मानित किया गया। उक्त समारोह में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष श्री रामदास आठवले ने श्री यादव को यह सम्मान प्रदान किया एवं अम्बेडकरवादी साहित्य को प्रोत्साहित करने एवं तत्संबंधी लेखन हेतु उनके कार्य-कलापों की प्रशंसा करते हुए उसे समाज के लिए अनुकरणीय बताया। इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के 120 अम्बेडकरवादियों को सम्मानित किया गया।

उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात तहबरपुर-आजमगढ़ जनपद निवासी श्री राम शिव मूर्ति यादव एक लम्बे समय से शताधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक विषयों पर प्रखरता से लेखन कर रहे हैं। श्री यादव की ‘सामाजिक व्यवस्था एवं आरक्षण‘ नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। आपके तमाम लेख विभिन्न स्तरीय पुस्तकों और संकलनों में भी प्रकाशित हैं। इसके अलावा आपके लेख इंटरनेट पर भी तमाम चर्चित वेब/ई/ऑनलाइन पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाग्स पर पढ़े-देखे जा सकते हैं। श्री राम शिव मूर्ति यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ”यदुकुल” (www.yadukul.blogspot.com) ब्लॉग का आप द्वारा 10 नवम्बर 2008 से सतत संचालन किया जा रहा है।

इससे पूर्व आपको भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने सामाजिक न्याय सम्बन्धी लेखन एवं समाज सेवा के लिए ‘’ज्योतिबाफुले फेलोशिप सम्मान-2007‘‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ, इलाहाबाद ने विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना हेतु ‘‘भारती ज्योति’’ सम्मान एवं आसरा समिति, मथुरा ने ‘बृज गौरव‘, म0प्र0 की प्रतिष्ठित संस्था ‘समग्रता‘ शिक्षा साहित्य एवं कला परिषद, कटनी ने हिन्दी साहित्य सेवा के आधार पर वर्ष 2010 के लिए रचनात्मक क्षेत्र में सेवाओं के निमित्त ”भारत-भूषण“ की मानद उपाधि से अलंकृत किया है।

बुधवार, अप्रैल 13, 2011

राहुल सांकृत्यायन का घुमक्कड़ शास्त्र (पुण्यतिथि 14 अप्रैल पर विशेष)


21वीं सदी के इस दौर में जब संचार-क्रान्ति के साधनों ने समग्र विश्व को एकग्लोबल विलेजमें परिवर्तित कर दिया हो एवम् इण्टरनेट द्वारा ज्ञान का समूचा संसार क्षण भर में एक क्लिक पर सामने उपलब्ध हो, ऐसे में यह अनुमान लगाना कि कोई व्यक्ति दुर्लभ ग्रन्थों की खोज में हजारों मील दूर पहाड़ों नदियों के बीच भटकने के बाद, उन ग्रन्थों को खच्चरों पर लादकर अपने देश में लाए, रोमांचक लगता है। पर ऐसे ही थे भारतीय मनीषा के अग्रणी विचारक, साम्यवादी चिन्तक, सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत, सार्वदेशिक दृष्टि एवं घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के महान पुरूष महापण्डित राहुल सांकृत्यायन। 9 अप्रैल, 1893 को जन्मे राहुल सांकृत्यायन के जीवन का मूलमंत्र ही घुमक्कड़ी यानी गतिशीलता रही है। घुमक्कड़ी उनके लिए वृत्ति नहीं वरन् धर्म था। तीसरी कक्षा की पढ़ाई के दौरान ही राहुल ने इस्माइल मेरठी की ये पंक्तियाँ पढ़ीं और उसे अपने जीवन में आत्मसात् कर लिया-

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिन्दगानी फिर कहाँ?
जिन्दगी गर कुछ रही, तो नौजवानी फिर कहाँ?

राहुल का समग्र जीवन ही रचनाधर्मिता की यात्रा थी। जहाँ भी वे गए वहाँ की भाषा बोलियों को सीखा और इस तरह वहाँ के लोगों में घुलमिल कर वहाँ की संस्कृति, समाज साहित्य का गूढ़ अध्ययन किया। राहुल सांकृत्यायन उस दौर की उपज थे जब ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत भारतीय समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राजनीति सभी संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहे थे। वह दौर समाज सुधारकों का था एवं काग्रेस अभी शैशवावस्था में थी। इन सब से राहुल अप्रभावित रह सके एवं अपनी जिज्ञासु घुमक्कड़ प्रवृत्ति के चलते घर-बार त्याग कर साधु वेषधारी सन्यासी से लेकर वेदान्ती, आर्यसमाजी किसान नेता एवं बौद्ध भिक्षु से लेकर साम्यवादी चिन्तक तक का लम्बा सफर तय किया। सन् 1930 में श्रीलंका जाकर वे बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गये एवं तभी से वेरामोदर साधुसेराहुलहो गये और सांकृत्य गोत्र के कारण सांकृत्यायन कहलाये। उनकी अद्भुत तर्कशक्ति और अनुपम ज्ञान भण्डार को देखकर काशी के पंडितों ने उन्हें महापंडित की उपाधि दी एवं इस प्रकार वे केदारनाथ पाण्डे से महापंडित राहुल सांकृत्यायन हो गये। सन् 1937 में रूस के लेनिनग्राद में एक स्कूल में उन्होंने संस्कृत अध्यापक की नौकरी कर ली और उसी दौरान ऐलेना नामक महिला से दूसरी शादी कर ली, जिससे उन्हें इगोर राहुलोविच नामक पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ। छत्तीस भाषाओं के ज्ञाता राहुल ने उपन्यास, निबंध, कहानी, आत्मकथा, संस्मरण जीवनी आदि विधाओं में साहित्य सृजन किया परन्तु अधिकांश साहित्य हिन्दी में ही रचा। राहुल तथ्यान्वेषी जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे सो उन्होंने हर धर्म के ग्रन्थों का गहन अध्ययन किया। अपनी दक्षिण भारत यात्रा के दौरान संस्कृत-ग्रन्थों, तिब्बत प्रवास के दौरान पालि-ग्रन्थों तो लाहौर यात्रा के दौरान अरबी भाषा सीखकर इस्लामी धर्म-ग्रन्थों का अध्ययन किया। निश्चितत: राहुल सांकृत्यायन की मेधा को साहित्य, अध्यात्म, ज्योतिष, विज्ञान, इतिहास, समाज शास्त्र, राजनीति, भाषा, संस्कृति, धर्म एवम् दर्शन के टुकड़ों में बाँटकर नहीं देखा जा सकता वरन् वह तो समग्र भारतीयता के मूर्त रूप थे।

राहुल सांकृत्यायन का मानना था कि घुमक्कड़ी मानव-मन की मुक्ति का साधन होने के साथ-साथ अपने क्षितिज विस्तार का भी साधन है। उन्होंने कहा भी था कि- "कमर बाँध लो भावी घुमक्कड़ों, संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है।" राहुल ने अपनी यात्रा के अनुभवों को आत्मसात् करते हुएघुमक्कड़ शास्त्रभी रचा। वे एक ऐसे घुमक्कड़ थे जो सच्चे ज्ञान की तलाश में था और जब भी सच को दबाने की कोशिश की गई तो वह बागी हो गया। उनका सम्पूर्ण जीवन अन्तर्विरोधों से भरा पड़ा है। वेदान्त के अध्ययन के पश्चात जब उन्होंने मंदिरों में बलि चढ़ाने की परम्परा के विरूद्ध व्याख्यान दिया तो अयोध्या के सनातनी पुरोहित उन पर लाठी लेकर टूट पड़े। बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बावजूद वह इसकेपुनर्जन्मवादको नहीं स्वीकार पाए। बाद में जब वे मार्क्सवाद की ओर उन्मुख हुए तो उन्होंने तत्कालीन सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी में घुसे सत्तालोलुप सुविधापरस्तों की तीखी आलोचना की और उन्हें आन्दोलन के नष्ट होने का कारण बताया। सन् 1947 में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रूप में उन्होंने पहले से छपे भाषण को बोलने से मना कर दिया एवं जो भाषण दिया, वह अल्पसंख्यक संस्कृति एवं भाषाई सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के विपरीत था। नतीजन पार्टी की सदस्यता से उन्हें वंचित होना पड़ा, पर उनके तेवर फिर भी नहीं बदले। इस कालावधि में वे किसी बंदिश से परे प्रगतिशील लेखन के सरोकारों और तत्कालीन प्रश्नों से लगातार जुड़े रहे। इस बीच मार्क्सवादी विचारधारा को उन्होंने भारतीय समाज की ठोस परिस्थितियों का आकलन करके ही लागू करने पर जोर दिया। अपनी पुस्तकवैज्ञानिक भौतिकवादएवंदर्शन-दिग्दर्शनमें इस सम्बन्ध में उन्होंने सम्यक प्रकाश डाला। अन्तत: सन् 1953-54 के दौरान पुन: एक बार वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बनाये गये।

एक कर्मयोगी योद्धा की तरह राहुल सांकृत्यायन ने बिहार के किसान-आन्दोलन में भी प्रमुख भूमिका निभाई। सन् 1940 के दौरान किसान-आन्दोलन के सिलसिले में उन्हें एक वर्ष की जेल हुई तो देवली कैम्प के इस जेल-प्रवास के दौरान उन्होंनेदर्शन-दिग्दर्शनग्रन्थ की रचना कर डाली। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के पश्चात जेल से निकलने पर किसान आन्दोलन के उस समय के शीर्ष नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक पत्रहुंकारका उन्हें सम्पादक बनाया गया। ब्रिटिश सरकार ने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाते हुए गैर कांग्रेसी पत्र-पत्रिकाओं में चार अंकों हेतुगुण्डों से लड़िएशीर्षक से एक विज्ञापन जारी किया। इसमें एक व्यक्ति गाँधी टोपी जवाहर बण्डी पहने आग लगाता हुआ दिखाया गया था। राहुल सांकृत्यायन ने इस विज्ञापन को छापने से इन्कार कर दिया पर विज्ञापन की मोटी धनराशि देखकर स्वामी सहजानन्द ने इसे छापने पर जोर दिया। अन्तत: राहुल ने अपने को पत्रिका के सम्पादन से ही अलग कर लिया। इसी प्रकार सन् 1940 मेंबिहार प्रान्तीय किसान सभाके अध्यक्ष रूप में जमींदारों के आतंक की परवाह किए बिना वे किसान सत्याग्रहियों के साथ खेतों में उतर हँसिया लेकर गन्ना काटने लगे। प्रतिरोध स्वरूप जमींदार के लठैतों ने उनके सिर पर वार कर लहुलुहान कर दिया पर वे हिम्मत नहीं हारे। इसी तरह जाने कितनी बार उन्होंने जनसंघर्षों का सक्रिय नेतृत्व किया और अपनी आवाज को मुखर अभिव्यक्ति दी।

राहुल सांकृत्यायन सदैव घुमक्कड़ ही रहे। उनके शब्दों में- ‘‘समदर्शिता घुमक्कड़ का एकमात्र दृष्टिकोण है और आत्मीयता उसके हरेक बर्ताव का सार।’’ यही कारण था कि सारे संसार को अपना घर समझने वाले राहुल सन् 1910 में घर छोड़ने के पश्चात पुन: सन् 1943 में ही अपने ननिहाल पन्दहा पहुँचे। वस्तुत: बचपन में अपने घुमक्कड़ी स्वभाव के कारण पिताजी से मिली डाँट के पश्चात उन्होंने प्रण लिया था कि वे अपनी उम्र के पचासवें वर्ष में ही घर में कदम रखेंगे। चूँकि उनका पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा ननिहाल में ही हुआ था सो ननिहाल के प्रति ज्यादा स्नेह स्वाभाविक था। बहरहाल जब वे पन्दहा पहुँचे तो कोई उन्हें पहचान सका पर अन्तत: लोहार नामक एक वृद्ध व्यक्ति ने उन्हें पहचाना और स्नेहासक्ति रूधे कण्ठ सेकुलवन्ती के पूत केदारकहकर राहुल को अपनी बाँहों में भर लिया। अपनी जन्मभूमि पर एक बुजुर्ग की परिचित आवाज ने राहुल को भावविभोर कर दिया। उन्होंने अपनी डायरी में इसका उल्लेख भी किया है- ‘‘लाहौर नाना ने जब यह कहा किअरे जब भागत जाय भगइया गिरत जायतब मेरे सामने अपना बचपन नाचने लगा। उन दिनों गाँव के बच्चे छोटी पतली धोती भगई पहना करते थे। गाँववासी बड़े बुजुर्गों का यह भाव देखकर मुझे महसूस होने लगा कि तुलसी बाबा ने यह झूठ कहा है कि- "तुलसी तहाँ जाइये, जहाँ जन्म को ठाँव, भाव भगति को मरम जाने धरे पाछिलो नाँव’’

घुमक्कड़ी स्वभाव वाले राहुल सांकृत्यायन सार्वदेशिक दृष्टि की ऐसी प्रतिभा थे, जिनकी साहित्य, इतिहास, दर्शन संस्कृति सभी पर समान पकड़ थी। विलक्षण व्यक्तित्व के अद्भुत मनीषी, चिन्तक, दार्शनिक, साहित्यकार, लेखक, कर्मयोगी और सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत रूप में राहुल ने जिन्दगी के सभी पक्षों को जिया। यही कारण है कि उनकी रचनाधर्मिता शुद्ध कलावादी साहित्य नहीं है, वरन् वह समाज, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, विज्ञान, धर्म, दर्शन इत्यादि से अनुप्राणित है जो रूढ़ धारणाओं पर कुठाराघात करती है तथा जीवन-सापेक्ष बनकर समाज की प्रगतिशील शक्तियों को संगठित कर संघर्ष एवं गतिशीलता की राह दिखाती है। ऐसे मनीषी को अपने जीवन के अंतिम दिनों मेंस्मृति लोपजैसी अवस्था से गुजरना पड़ा एवं इलाज हेतु उन्हें मास्को भी ले जाया गया। पर घुमक्कड़ी को कौन बाँध पाया है, सो मार्च 1963 में वे पुन: मास्को से दिल्ली गए और 14 अप्रैल, 1963 को सत्तर वर्ष की आयु में सन्यास से साम्यवाद तक का उनका सफर पूरा हो गया पर उनका जीवन दर्शन और घुमक्कड़ी स्वभाव आज भी हमारे बीच जीवित है।

(कृष्ण कुमार यादव का यह लेख साहित्याशिल्पी पर पूर्व प्रकाशित है)

गुरुवार, मार्च 24, 2011

आजमगढ़ के मनोज यादव ने दिया ‘दे घुमा के..'


राहुल सांकृत्यायन, अल्लामा शिबली नोमानी और कैफी आजमी की धरती आजमगढ़ सदैव सुर्ख़ियों में रहती है, पर इस बार एक बेहद रचनात्मक और जोशीले वजह से। दरअसल देश में खेल से ज्यादा जुनून का दर्जा प्राप्त क्रिकेट के महाकुम्भ आईसीसी के थीम सांग लिखने का गौरव आजमगढ़ जिले के सपूत मनोज यादव को हासिल हुआ है।मनोज यादव के लिखे गीत को शंकर महादेवन ने गया है और संगीतबद्ध किया शंकर-एहसान-लाय ने। बरास्ता मनोज यादव, आजमगढ़वासी अपनी ओर अंगुली उठाने वालों को एक संदेश भी दे रहे हैं और कह रहे हैं......दे घुमा के.....!

‘दे घुमा के....आसमान में मार के डुबकी, उड़ा दे सूरज की झपकी, सर्र से चीर हवा का पर्दा बाँध ले पट्ठे जमके गर्दा.....‘ आजमगढ़ के वासी मनोज यादव के दिलो-दिमाग में जन्मा यह गीत देश को आज एक ऊर्जा, एक जोश दे रहा है। इससे आजमगढ़ की फिजां बदली-बदली सी नजर आ रही है। अब यहाँ सृजनात्मकता है, जोश है, देश की माथे की बिन्दी बनने का जज्बा है। जिले के सगड़ी तहसील के भरौली गाँव निवासी मनोज यादव की उपलब्धि पर पूरे जिले को नाज है।

बताए हैं कि मनोज यादव के पिता स्व0 हरिश्चन्द्र यादव जब मुम्बई गये थे तो उनकी आखों में तमाम सपने थे। दो पुत्रों मनोज व प्रमोद व एक पुत्री पुष्पा के पिता हरिश्चन्द्र रेमण्ड कम्पनी में सुपरवाइजर बनें। मनोज यादव ने पिता के सपनों को साकार करना सीखा और उतर गए फिल्मों-विज्ञापनों के लिए गीत व जिंगल लिखने में। गुलजार को प्रेरणा स्रोत मानने वाले मनोज की प्रतिभा को गायक शंकर महादेवन ने पहचाना और शंकर-एहसान-लाय के कहने पर ओ एण्ड एम कम्पनी ने आईसीसी वल्र्ड कप के थीम सांग को लिखने का जिम्मा सौंपा, जिसे मनोज ने बखूबी पूरा किया। गौरतलब है कि क्रिकेट विश्व कप 2011 का आयोजन भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका में 19 फरवरी 2011 से हो रहा है. इसलिए इस गीत को हिंदी, बांग्ला और सिंहली भाषाओं में तैयार किया गया.

(चित्र में मनोज यादव का गृहनगर आजमगढ़ में हुए अभिनन्दन की प्रेस कटिंग)

हम सभी की तरफ से मनोज यादव को इस सृजनात्मक उपलब्धि पर हार्दिक बधाइयाँ !!

शुक्रवार, मार्च 18, 2011

होली तेरे रूप अनेक

संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। त्यौहार जीवन के उत्सव हैं। हर संस्कार को एक उत्सव का रूप देकर उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करना भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। भारत में उत्सव व त्यौहारों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है और हर त्यौहार के पीछे एक ही भावना छिपी होती है- मानवीय गरिमा को समृद्ध करना। शायद यही कारण है कि एक समय किसी धर्म विशेष के त्यौहार माने जाने वाले पर्व आज सभी धर्मों के लोग आदर के साथ हँसी-खुशी मनाते हैं। उत्सव जीवन की लय और निरंतरता बनाते हैं। उत्सव मनते रहें इसलिए त्योहार इनके बहाने हैं।

होली भारतीय समाज का एक प्रमुख त्यौहार है, जिसका लोग बेसब्री के साथ इंतजार करते हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में होली मनाई जाती है। होली के रंग हमें प्रकृति से जोड़ते हैं। वसंत की फगुनाई के बीच घनी भूरी टहनियों पर हरे पत्तों के बीच चटक नांरगी रंग के टेसू के फूल इस उल्लास को और भी बढ़ा देते हैं। आखिर होली के रंग बनाने की शुरुआत तो इन्हीं टेसू के फूलों से ही हुई है। यह होली के समय कहाँ से और कैसे आते हैं, कोई नहीं जानता है? पर हर होली के समय आकर ये एक खुशी जरुर दे जाते हैं। जीवन के उत्सवों की भाँति इनका आना-जाना होली के रंग को और भी चटक बना जाता है। रबी की फसल की कटाई के बाद वसन्त पर्व में मादकता के अनुभवों के बीच मनाया जाने वाला होली पर्व उत्साह और उल्लास का परिचायक है। अबीर-गुलाल व रंगों के बीच भांग की मस्ती में फगुआ गाते इस दिन क्या बूढे़ व क्या बच्चे, सब एक ही रंग में रंगे नजर आते हैं।

नारद पुराण के अनुसार दैत्य राज हिरणकश्यप को यह घमंड था कि उससे सर्वश्रेष्ठ दुनिया में कोई नहीं, अतः लोगों को ईश्वर की पूजा करने की बजाय उसकी पूजा करनी चाहिए। पर उसका बेटा प्रहलाद जो कि विष्णु भक्त था, ने हिरणकश्यप की इच्छा के विरूद्ध ईश्वर की पूजा जारी रखी। हिरणकश्यप ने प्रहलाद को प्रताड़ित करने हेतु कभी उसे ऊंचे पहाड़ों से गिरवा दिया, कभी जंगली जानवरों से भरे वन में अकेला छोड़ दिया पर प्रहलाद की ईश्वरीय आस्था टस से मस न हुयी और हर बार वह ईश्वर की कृपा से सुरक्षित बच निकला। अंततः हिरणकश्यप ने अपनी बहन होलिका जिसके पास एक जादुई चुनरी थी, जिसे ओढ़ने के बाद अग्नि में भस्म न होने का वरदान प्राप्त था, की गोद में प्रहलाद को चिता में बिठा दिया ताकि प्रहलाद भस्म हो जाय। पर होनी को कुछ और ही मंजूर था, ईश्वरीय वरदान के गलत प्रयोग के चलते जादुई चुनरी ने उड़कर प्रहलाद को ढक लिया और होलिका जल कर राख हो गयी और प्रहलाद एक बार फिर ईश्वरीय कृपा से सकुशल बच निकला। दुष्ट होलिका की मृत्यु से प्रसन्न नगरवासियांे ने उसकी राख को उड़ा-उड़ा कर खुशी का इजहार किया। मान्यता है कि आधुनिक होलिकादहन और उसके बाद अबीर-गुलाल को उड़ाकर खेले जाने वाली होली इसी पौराणिक घटना का स्मृति प्रतीक है।

भविष्य पुराण में वर्णन आता है कि राजा रघु के राज्य में धुंधि नामक राक्षसी को भगवान शिव द्वारा वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु न ही देवताओं, न ही मनुष्यों, न ही हथियारों, न ही सर्दी-गर्मी-बरसात से होगी। इस वरदान के बाद उसकी दुष्टतायें बढ़ती गयीं और अंततः भगवान शिव ने ही उसे यह शाप दे दिया कि उसकी मृत्यु बालकों के उत्पात से होगी। धुंधि की दुष्टताओं से परेशान राजा रघु को उनके पुरोहित ने सुझाव दिया कि फाल्गुन मास की 15वीं तिथि को जब सर्दियों पश्चात गर्मियाँ आरम्भ होती हैं, बच्चे घरों से लकड़ियाँ व घास-फूस इत्यादि एकत्र कर ढेर बनायें और इसमें आग लगाकर खूब हल्ला-गुल्ला करें। बच्चों के ऐसा ही करने से भगवान शिव के शाप स्वरूप राक्षसी धुंधि ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। ऐसा माना जाता है कि होली का पंजाबी स्वरूप ‘धुलैंडी’ धुंधि की मृत्यु से ही जुड़ा हुआ है। आज भी इसी याद में होलिकादहन किया जाता है और लोग अपने हर बुरे कर्म इसमें भस्म कर देते हैं।

होली की रंगत बरसाने की लट्ठमार होली के बिना अधूरी ही कही जायेगी। कृष्ण-लीला भूमि होने के कारण फाल्गुन शुल्क नवमी को ब्रज में बरसाने की लट्ठमार होली का अपना अलग ही महत्व है। ब्रज में तो वसंत पंचमी के दिन ही मंदिरों में डांढ़ा गाड़े जाने के साथ ही होली का शुभारंभ हो जाता है। बरसाना में हर साल फाल्गुन शुक्ल नवमी के दिन होने वाली लट्ठमार होली देखने व राधारानी के दर्शनों की एक झलक पाने के लिए यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु व पर्यटक देश-विदेश से खिंचे चले आते हैं। इस दिन नन्दगाँव के कृष्णसखा ‘हुरिहारे’ बरसाने में होली खेलने आते हैं, जहाँ राधा की सखियाँ लाठियों से उनका स्वागत करती हैं। यहाँ होली खेलने वाले नंदगाँव के हुरियारों के हाथों में लाठियों की मार से बचने के लिए मजबूत ढाल होती है। परंपरागत वेशभूषा में सजे-धजे हुरियारों की कमर में अबीर-गुलाल की पोटलियाँ बंधी होती हैं तो दूसरी ओर बरसाना की हुरियारिनों के पास मोटे-मोटे तेल पिलाए लट्ठ होते हैं। बरसाना की रंगीली गली में पहुँचते ही हुरियारों पर चारांे ओर से टेसू के फूलों से बने रंगों की बौछार होने लगती है। परंपरागत शास्त्रीय गान ‘ढप बाजै रे लाल मतवारे को‘ का गायन होने लगता है। हुरियारे ‘फाग खेलन बरसाने आए हैं नटवर नंद किशोर‘, का गायन करते हैं तो हुरियारिनें ‘होली खेलने आयै श्याम आज जाकूं रंग में बोरै री‘, का गायन करती हैं। भीड़ के एक छोर से गोस्वामी समाज के लोग परंपरागत वाद्यों के साथ महौल को शास्त्रीय रुप देते हैं। ढप, ढोल, मृदंग की ताल पर नाचते-गाते दोनों दलों में हंसी-ठिठोली होती है। हुरियारिनें अपनी पूरी ताकत से हुरियारों पर लाठियों के वार करती हैं तो हुरियार अपनी ढालों पर लाठियों की चोट सहते हैं। हुरियारे मजबूत ढालों से अपने शरीर की रक्षा करते हैं एवं चोट लगने पर वहाँ ब्रजरज लगा लेते हैं। बरसाना की होली के दूसरे दिन फाल्गुन शुक्ल दशमी को सायंकाल ऐसी ही लट्ठमार होली नन्दगाँव में भी खेली जाती है। अन्तर मात्र इतना है कि इसमें नन्दगाँव की नारियाँ बरसाने के पुरूषों का लाठियों से सत्कार करती हैं। इसमें बरसाना के हुरियार नंदगाँव की हुरियारिनों से होली खेलने नंदगाँव पहुँचते हैं। फाल्गुन की नवमी व दशमी के दिन बरसाना व नंदगाँव के लट्ठमार आयोजनों के पश्चात होली का आकर्षण वंृदावन के मंदिरों की ओर हो जाता है, जहाँ रंगभरी एकादशी के दिन पूरे वृंदावन में हाथी पर बिठा राधावल्लभ लाल मंदिर से भगवान के स्वरुपों की सवारी निकाली जाती है। बाद में भी ठाकुर के स्वरूप पर गुलाल और केशर के छींटे डाले जाते हैं। ब्रज की होली की एक और विशेषता यह है कि धूलैड़ी मना लेने के साथ ही जहाँ देश भर में होली का खूमार टूट जाता है, वहीं ब्रज में इसके चरम पर पहुँचने की शुरुआत होती है।

फागुन में जब रंगों की फुहारें भगवान श्री कृष्ण के बरसाने के होली उत्सव की याद दिलाती हैं तो रामलीला का आयोजन कुछ अजीब लगता है, लेकिन बरेली शहर में होली के रंगो में भगवान राम के आदर्श भी गूंजते हैं। 150 से भी अधिक साल से यहाँ फागुन में वमनपुरी की रामलीला होती आ रही है। संभवतः देश में यह अकेला ऐसी रामलीला है जो होली के उपलक्ष्य में होती है। यहांँ चैत्र कृष्ण एकादशी पर रामलीला का मंचन शुरु हो जाता है और धुलंडी के दिन तक रोज विभिन्न प्रसंगों का मंचन होता है। रामलीला का समापन नृसिंह भगवान की शोभा यात्रा के साथ होता है। होली के दिन रामलीला से निकलने वाली राम बारात शहर में अनूठे रंग बिखेरती है। इसमें सौहार्द के फूल बरसते हैं। हिन्दू हो या मुस्लिम सभी पुष्पवर्षा कर राम बारात का स्वागत करते हैं। फागुनी फिजाओं में रामलीला का यह उत्सव वाकई अद्भुत है। इसी प्रकार बनारस की होली का भी अपना अलग अन्दाज है। बनारस को भगवान शिव की नगरी कहा गया है। यहाँ होली को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाते हैं और बाबा विश्वनाथ के विशिष्ट श्रृंगार के बीच भक्त भांग व बूटी का आन्नद लेते हैं।

होली को लेकर देश के विभिन्न अंचलों में तमाम मान्यतायें हैं और शायद यही विविधता में एकता की भारतीय संस्कृति का परिचायक भी है। उत्तर पूर्व भारत में होलिकादहन को भगवान कृष्ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध दिवस से जोड़कर पूतना दहन के रूप में मनाया जाता है तो दक्षिण भारत में मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने कामदेव को तीसरा नेत्र खोल भस्म कर दिया था और उनकी राख को अपने शरीर पर मल कर नृत्य किया था। तत्पश्चात कामदेव की पत्नी रति के दुख से द्रवित होकर भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया, जिससे प्रसन्न हो देवताओं ने रंगों की वर्षा की। इसी कारण होली की पूर्व संध्या पर दक्षिण भारत र्में अिग्न प्रज्वलित कर उसमें गन्ना, आम की बौर और चन्दन डाला जाता है। यहाँ गन्ना कामदेव के धनुष, आम की बौर कामदेव के बाण, प्रज्वलित अग्नि शिव द्वारा कामदेव का दहन एवं चन्दन की आहुति कामदेव को आग से हुई जलन हेतु शांत करने का प्रतीक है। मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में अवस्थित धूंधड़का गाँव में होली तो बिना रंगों के खेली जाती है और होलिकादहन के दूसरे दिन ग्रामवासी अमल कंसूबा (अफीम का पानी) को प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं और सभी ग्रामीण मिलकर उन घरों में जाते हैं जहाँ बीते वर्ष में परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो चुकी होती है। उस परिवार को सांत्वना देने के साथ होली की खुशी में शामिल किया जाता है।

कानपुर में होली का अपना अलग ही इतिहास है। यहाँ अवस्थित जाजमऊ और उससे लगे बारह गाँवों में पाँच दिन बाद होली खेली जाती है। बताया जाता है कि कुतुबुद्दीन ऐबक की हुकुमत के दौरान ईरान के शहर जंजान के शहर काजी सिराजुद्दीन के शिष्यों के जाजमऊ पहुँचने पर तत्कालीन राजा ने उन्हें जाजमऊ छोड़ने का हुक्म दिया तो दोनो पक्षों में जंग आरम्भ हो गई। इसी जंग के बीच राजा जाज का किला पलट गया और किले के लोग मारे गये। संयोग से उस दिन होली थी पर इस दुखद घटना के चलते नगरवासियों ने निर्णय लिया कि वे पाँचवें दिन होली खेलेंगे, तभी से यहाँ होली के पाँचवें दिन पंचमी का मेला लगता है। इसी प्रकार वर्ष 1923 के दौरान होली मेले के आयोजन को लेकर कानपुर के हटिया में चन्द बुद्धिजीवियों व्यापारियों और साहित्यकारों (गुलाबचन्द्र सेठ, जागेश्वर त्रिवेदी, पं0 मुंशीराम शर्मा ‘सोम’, रघुबर दयाल, बाल कृष्ण शर्मा ‘नवीन’, श्याम लाल गुप्त ‘पार्षद’, बुद्धूलाल मेहरोत्रा और हामिद खाँ) की एक बैठक हो रही थी। तभी पुलिस ने इन आठों लोगों को हुकूमत के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में गिरफतार करके सरसैया घाट स्थित जिला कारागार में बन्द कर दिया। इनकी गिरफ्तारी का कानपुर की जनता ने भरपूर विरोध किया। आठ दिनों पश्चात् जब उन्हें रिहा किया गया, तो उस समय ‘अनुराधा-नक्षत्र’ लगा हुआ था। जैसे ही इनके रिहा होने की खबर लोगों तक पहुँची, लोग कारागार के फाटक पर पहुँच गये। उस दिन वहीं पर मारे खुशी के पवित्र गंगा जल में स्नान करके अबीर-गुलाल और रंगों की होली खेली। देखते ही देखते गंगा तट पर मेला सा लग गया। तभी से परम्परा है कि होली से अनुराधा नक्षत्र तक कानपुर में होली की मस्ती छायी रहती है और आठवें दिन प्रतिवर्ष गंगा तट पर गंगा मेले का आयोजन किया जाता है।

पग-पग पर बदले बोली, पग-पग पर बदले भेष, वाले भारतवर्ष में होली का त्यौहार धूम-धाम से विभिन्न रंगों में मनाया जाता है। भारतीय उत्सवों को लोकरस और लोकानंद का मेल कहा गया है। भूमण्डलीकरण और उपभोक्तावाद के बढ़ते दायरों के बीच इस रस और आनंद में डूबा भारतीय जन-मानस आज भी न तो बड़े-बड़े माल और क्लबों में मनने वाले फेस्ट से चहकार भरता है और न ही किसी कम्पनी के सेल आफर को लेकर आन्तरिक उल्लास से भरता है। होली पर्व के पीछे तमाम धार्मिक मान्यताएं, मिथक, परम्पराएं और ऐतिहासिक घटनाएं छुपी हुई हैं पर अंततः इस पर्व का उद्देश्य मानव-कल्याण ही है। लोकसंगीत, नृत्य, नाट्य, लोककथाओं, किस्से-कहानियों और यहाँ तक कि मुहावरों में भी होली के पीछे छिपे संस्कारों, मान्यताओं व दिलचस्प पहलुओं की झलक मिलती है। नए वó, नया श्रृंगार और लज़ीज़ पकवानों के बीच होली पर्व मनाने का एक मनोवैज्ञानिक कारण भी गिनाया जाता है कि यह पर्व के बहाने समाज एवं व्यक्तियों के अन्दर से कुप्रवृत्तियों एवं गन्दगी को बाहर निकालने का माध्यम है। होली पर खेले गए रंग गन्दगी के नहीं बल्कि इस विचार के प्रतीक हैं कि इन रंगों के धुलने के साथ-साथ व्यक्ति अपने राग-द्वेष भी धुल दे। होली पर रंग-पुते चेहरों की भी अपनी महत्ता है। एक तरफ ये हास्य की सृष्टि में सहायक होते हैं वहीँ दूसरों को रंगने या मूर्ख बनाने की चेष्टा में खुद को रँगा जाना या मूर्ख बन जाना, रंग लगाने के बहाने थोड़ी छूट लेने के प्रयास में पकड़े जाना और उपहास का पात्र बनना-ये सब क्रिया-कलाप करने वालों को और देखने वाले को भी गुदगुदाते हैं। सही रूप में देखें तो होली के माध्यम से जीवन में व्याप्त निराशाजनक विचारों से मुक्त होकर नए आशावादी विचारों के साथ उल्लासपूर्वक जीवन का आरंभ संभव है। यही कारण है कि रंगों को धुलने के बाद लोग मस्ती में फगुआ गाते हैं और एक दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर भाईचारे का प्रदर्शन करते हैं। आज जब चारों तरफ आतंक और खून की होली खेली जा रही है, वहां रंगों का यह त्योहार यह सन्देश भी देता है कि इंसानियत का रंग एक ही है। हंसी खुशी, उल्लास का रंग एक है।

साभार : कृष्ण कुमार यादव : हमारीवाणी

मंगलवार, मार्च 08, 2011

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक कविता


आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की 101 वीं वर्षगांठ है. इस अवसर पर एक कविता 'शब्द-सृजन की ओर' ब्लॉग पर लिखी. इसे यहाँ भी प्रस्तुत कर रहा हूँ-

नहीं हूँ मैं माँस-मज्जा का एक पिंड
जिसे जब तुम चाहो जला दोगे
नहीं हूँ मैं एक शरीर मात्र
जिसे जब तुम चाहो भोग लोगे
नहीं हूँ मैं शादी के नाम पर अर्पित कन्या
जिसे जब तुम चाहो छोड़ दोगे
नहीं हूँ मैं कपड़ों में लिपटी एक चीज
जिसे जब तुम चाहो तमाशा बना दोगे।

मैं एक भाव हूँ, विचार हूँ
मेरा एक स्वतंत्र अस्तित्व है
ठीक वैसे ही, जैसे तुम्हारा
अगर तुम्हारे बिना दुनिया नहीं है
तो मेरे बिना भी यह दुनिया नहीं है।

फिर बताओं
तुम क्यों अबला मानते हो मुझे
क्यों पग-पग पर तिरस्कृत करते हो मुझे
क्या देह का बल ही सब कुछ है
आत्मबल कुछ नहीं
खामोश क्यों हो
जवाब क्यों नहीं देते........?

बुधवार, मार्च 02, 2011

आजमगढ़ की आकांक्षा यादव को 'न्यू ऋतंभरा भारत-भारती साहित्य सम्मान'


युवा कवयित्री एवँ साहित्यकार सुश्री आकांक्षा यादव को हिन्दी साहित्य में प्रखर रचनात्मकता एवँ अनुपम कृतित्व के लिए छत्तीसगढ़ की प्रमुख साहित्यिक संस्था न्यू ऋतंभरा साहित्य मंच, दुर्ग द्वारा ''भारत-भारती साहित्य सम्मान-2010'' से सम्मानित किया गया है। गौरतलब है कि सुश्री आकांक्षा यादव की आरंभिक रचनाएँ दैनिक जागरण और कादम्बिनी में प्रकाशित हुई और फ़िलहाल वे देश की शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवँ सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली सुश्री आकांक्षा यादव के लेख, कवितायेँ और लघुकथाएं जहाँ तमाम संकलनों/पुस्तकों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीँ आपकी तमाम रचनाएँ आकाशवाणी से भी तरंगित हुई हैं। पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ अंतर्जाल पर भी सक्रिय सुश्री आकांक्षा यादव की रचनाएँ इंटरनेट पर तमाम वेब/ ई-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर भी पढ़ी-देखी जा सकती हैं।

आपकी तमाम रचनाओं के लिंक विकिपीडिया पर भी दिए गए हैं। 'शब्द-शिखर', 'सप्तरंगी-प्रेम', 'बाल-दुनिया' और 'उत्सव के रंग' ब्लॉग आप द्वारा संचालित/सम्पादित हैं। 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' पुस्तक का संपादन करने वाली सुश्री आकांक्षा के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ. राष्ट्रबन्धु जी ने ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है।

मूलत: उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में प्रवक्ता सुश्री आकांक्षा यादव वर्तमान में अपने पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ अंडमान-निकोबार में रह रही हैं और वहाँ रहकर भी हिन्दी को समृद्ध कर रही हैं। श्री यादव भी हिन्दी की युवा पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं। एक रचनाकार के रूप में बात करें तो सुश्री आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।

सुश्री आकांक्षा यादव को इससे पूर्व भी विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘, ‘‘एस0एम0एस0‘‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवँ कला परिषद द्वारा ‘‘शब्द माधुरी‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘‘आसरा‘‘ द्वारा ‘‘ब्रज-शिरोमणि‘‘ सम्मान, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘‘भारत गौरव‘‘, अभिव्यंजना संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘काव्य-कुमुद‘‘, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ’महिमा साहित्य भूषण सम्मान’, अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था, ठाणे, महाराष्ट्र द्वारा ‘‘सरस्वती रत्न‘‘, अन्तज्र्योति सेवा संस्थान गोला-गोकर्णनाथ, खीरी द्वारा श्रेष्ठ कवयित्री की मानद उपाधि इत्यादि प्रमुख हैं। सुश्री आकांक्षा यादव को इस अलंकरण हेतु हार्दिक बधाईयाँ।

मंगलवार, फ़रवरी 22, 2011

आजमगढ़ : और भी पहचान है मेरी .....

1974 के मार्च महीने की एक तारीख...पटना जाने वाली तमाम रेलगाड़ियां निरस्त कर दी गई हैं। 18 मार्च 1974 को नौजवानों ने पटना विधानसभा के घेराव का ऐलान कर रखा है। इसकी अगुआई जेपी को करनी है। घेराव को नाकामयाब बनाने के लिए बिहार के साथ ही केंद्र सरकार भी जुट गई है। इस घेराव में तब का एक क्रांतिकारी समाजवादी नेता भी शामिल होने को तैयार है। किसी तरह वाराणसी पहुंच गया है। रेलगाड़ियां बंद कर दी गई हैं। इसी बीच पता चलता है कि कोई रेलगाड़ी मुगलसराय होते हुए पटना जा रही है। क्रांतिकारी नेता पर पुलिस की निगाह है। उसके गिरफ्तार होने का खतरा है। लिहाजा काशीहिंदू विश्वविद्यालय के कुछ छात्र नेता रणनीति बनाते हैं। तय होता है कि ये नेता बुनकर के तौर पर जाएगा। लुंगी कुर्ता और गोलटोपी पहने कुछ लोगों का एक ग्रुप वाराणसी के काशी स्टेशन पर पहुंचता है। पुलिस होने के बावजूद ये नेता अपने हाथों बुनी साड़ियों का बंडल लिए ट्रेन में सवार हो जाता है।
18 मार्च 1974 को पटना में जो हुआ – अब इतिहास है। इसी घेराव में इनकम टैक्स चौराहे पर जेपी पर पुलिस ने जमकर लाठियां बरसाईं। इन लाठियों की धमक इतनी दूर तक सुनाई दी कि इंदिरा गांधी की सर्वशक्तिमान सरकार हिल गई। यहां अब बता देना जरूरी है कि बुनकर के भेष में पटना गए वे नेता थे जार्ज फर्नांडिस और उन्हें स्टेशन पर चढ़ाने आए थे आज के कांग्रेस के प्रवक्ता मोहन प्रकाश। जो तब बीएचयू छात्रसंघ के प्रभावी नेता थे। जिन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश की खाक छानी है – उन्हें पता है कि आजमगढ़ से लेकर मऊ तक पहले हथकरघे का जाल बिछा हुआ था। गांव-गांव में दरी, चादर और गमछे के साथ ही बनारसी साड़ियां बुनीं जाती थीं। इन्हें लेकर एक खास ड्रेस में लोग गांव-गांव बेचने के लिए निकलते थे। तब उन पर कोई सवाल नहीं उठाता था। लेकिन इसी आजमगढ़ के सरायमीर के अबू सलेम की अपराध की दुनिया में चर्चा क्या बढ़ी – पूरा आजमगढ़ अपराधियों और आतंकवाद का गढ़ नजर आने लगा है।
लेकिन आजमगढ़ की यही पहचान नहीं है। आज राष्ट्रीय क्षितिज पर जब भी हिंदू-मुस्लिम समभाव की बात की जाती है – इस्लाम के विद्वान के तौर पर मौलाना वहीदुद्दीन खान के बिना पूरी नहीं होती। वे वहीदुद्दीन साहब भी इसी आजमगढ़ में पले – बढ़े हैं। कैफी आजमी ने उर्दू शायरी की दुनिया में जो नए प्रतिमान खड़े किए, सिनेमा के गीतों को नया अंदाज दिया – वे इसी आजमगढ़ के मेजवां से निकले थे। चंद सिरफिरों के चलते आज आजमगढ़ की एक पूरी पीढ़ी को देशद्रोही और आतंकवादी का तमगा दिया जा रहा है – ऐसे लोगों को जानकर हैरत होगी कि कैफी आजमी ने अपनी जिंदगी के आखिरी साल अपनी माटी – अपनी हवा के बीच मेजवां में ही गुजारे। जबकि देश के सपनीले शहर मुंबई में उनके पास जिंदगी के वे सारे साजोसामान मौजूद थे – जिसकी खोज में आज हर कोई हलकान हुए जा रहा है। और एक बार हासिल होते ही वह अपनी माटी की महक को भूल जाना चाहता है। कैफी उन लोगों में से नहीं थे।
आज हैरी पोटर की लेखिका जेके रॉलिंग की दुनिया में खासी चर्चा है। बच्चों की लेखिका के तौर पर विख्यात रॉलिंग को जानने वालों की कमी नहीं है। लेकिन कितने लोगों को सनीमासीन खान का नाम पता है। बच्चों के लेखक के तौर पर दुनिया भर में विख्यात इस लेखक की कृतियां मलय, पश्तो, अरबी से लेकर तमाम पश्चिमी भाषाओं में हो चुका है। मुस्लिम बहुल जनसंख्या वाला शायद ही कोई देश हो – जहां खान की किताबों की प्रदर्शनी ना लगी हो।
आजमगढ़ की स्थापना 1665 में एक दबंग जमींदार आजमखान ने की थी। दिलचस्प बात ये है कि यह एक हिंदू जमींदार की मुस्लिम पत्नी का बेटा था। इतिहासकारों के मुताबिक विक्रमजीत गौतम राजपूत था। मेहनगर की मुस्लिम पत्नी से उसके दो बच्चे थे। दूसरे बच्चे अजमत ने किला बनाया। जो आज भी आजमगढ़ में अजमत के किले के तौर पर विख्यात है। हिंदू पिता और मुस्लिम पत्नी की संतान आजमगढ़ में दंगों का कोई गहरा इतिहास नहीं रहा है। दोनों परिवारों का ही संस्कार था कि यहां गंगजमुनी संस्कृति की धारा लगातार बहती रही। आजमगढ़ में राष्ट्रवाद किस कदर हिलोरें ले रहा था – इसकी मिसाल 1857 का संग्राम भी है। आजमगढ़ की धरती पर ही वीर कुंवर सिंह ने अंग्रेजों के दांत खट्टे किए थे। इसी दौर में यहां एक बड़े इस्लामिक विद्वान शिबली नोमानी ने यहां की धरती के जरिए इस्लामिक दुनिया में अमिट छाप छोड़ी। सर सैय्यद अहमद खां के कभी सहयोगी रहे शिबली नोमानी इतिहास, इस्लाम, दर्शन और सूफीवाद के मशहूर मर्मज्ञ थे। उन्होंने मक्का तक हज की यात्रा की और मोहम्मद साहब से जुड़ी चीजों का संग्रह किया। इसे वे भले ही नहीं लिख पाए – लेकिन बाद में उनके उत्तराधिकारी सैय्यद सुलेमान नदवी ने लिखा। जिसे इस्लाम की दुनिया में आज भी खासे आदर के साथ लिया जाता है। शिबली के योगदान को आजमगढ़ ने आज भी शिबली कॉलेज के रूप में शिद्दत से याद रखा है। आजमगढ़ में उच्च शिक्षा के इस अहम केंद्र में ना सिर्फ मुस्लिम – बल्कि हिंदू छात्र भी अपना भविष्य संवारने का काम कर रहे हैं। शिबली की ही देन है कि आजमगढ़ कभी शिया शिक्षा का अहम केंद्र हुआ करता था। यहां दुनिया भर से लोग इस्लाम की शिया तहजीब का अध्ययन करने आते थे। इस धरती ने अमीन अहसान इस्लाही और जफरूल इस्लाम जैसे इस्लाम के जाने-माने विद्वान भी पैदा किए हैं तो इतिहासकारों की पंक्ति में आदर के साथ लिया जाने वाला नाम इश्तियाक अहमद जिल्दी भी यहीं के हैं और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं। इसी धरती के सपूत सम्सुर्रहमान फारूकी को भी भूलना कठिन है।
13 सितंबर के दिल्ली बम धमाकों के बाद आजमगढ़ एक बार फिर पूरी दुनिया की नजर में आ गया है। पिछले कुछ साल से आजमगढ़ की पहचान के प्रतीक बने हैं माफिया सरगना अबू सलेम। जयपुर और अहमदाबाद धमाके के मास्टरमाइंड के तौर पर जब से अबू बशर की गिरफ्तारी हुई है – पहचान की ये धारा और पुख्ता हुई। रही- सही कसर 13 सितंबर के धमाके में मारे गए आतिफ और साजिद के साथ ही सैफ की गिरफ्तारी ने पूरी कर दी है। इसके बाद आजमगढ़ को सिर्फ और सिर्फ आतंकवादियों के गढ़ के तौर पर पहचान दी गई है। यहां के ब्लैक पॉट्री नाम से दुनियाभर में मशहूर उर्दू पुस्तकालय के उल्लेख के बिना तो ये चर्चा अधूरी रहेगी। माना जाता है कि उर्दू अदीब की दुनिया में इस पुस्तकालय को काफी आदर के साथ देखा जाता है।
हिंदी के पहले महाकाव्य रचयिता अयोध्या सिंह उपाध्याय ’हरिऔध’ का नाम तो सभी जानते हैं। लेकिन इसी धरती के श्यामनारायण पांडे थे – जिन्होंने महाराणा प्रताप और अकबर के युद्ध को विषय बनाकर हल्दीघाटी नामक खंडकाव्य लिखा। राणा प्रताप के घोड़े चेतक का जो वर्णन उन्होंने किया है – उसे पढ़कर आज भी रोमांच हो जाता है। आजमगढ़ के मेंहनगर के विसहम में दाऊद इब्राहिम की रिश्तेदारी की जमकर चर्चा हो रही है। हाजी मस्तान की रिश्तेदारी को लेकर भी आजमगढ़ चर्चा में है। लेकिन लोग ये भूल गए हैं कि इसी जिले में हरिहरपुर नाम का एक ब्राह्मणबहुल गांव है – जहां तबला सम्राट गुदई महाराज की ससुराल थी। दूसरे तबला उस्ताद किशन महाराज और ठुमरी की विख्यात गायिका गिरिजा देवी की भी रिश्तेदारी इस गांव में है। आजमगढ़ में कला और संस्कृति की ये धारा ही रही है कि लोग फिल्म और टेलीविजन की दुनिया में भी जमकर नाम और दाम कमा रहे हैं। जीटीवी के मशहूर रियलिटी शो सारेगामापा के प्रोड्यूसर गजेंद्र सिंह और फिल्म निर्देशक राजेश सिंह भी इसी धरती के वासी हैं। राहुल सांकृत्यायन इसी जिले के पंदह के निवासी थे। जिनके दर्शन-दिग्दर्शन का लोहा पूरी दुनिया ने माना।
टाटा की नैनो कार को लेकर उत्सुकता अभी थमी नहीं है। पश्चिम बंगाल के सिंगूर से लेकर उत्तरांचल के पंतनगर तक इस कार की चर्चा है। लेकिन कितने लोगों को पता है कि आजमगढ़ के सत्रह साल के एक बच्चे चंदन ने दो सीटों वाली कार पहले ही बना ली है। जो एक लीटर पेट्रोल में चालीस किलोमीटर तक चल सकती है।
आजमगढ़ की इस गड्डमड्ड होती पहचान पर सबसे बेहतरीन टिप्पणी आतंकवाद से लोहा लेते रहे बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह की है। प्रकाश सिंह इसी धरती के बेटे हैं। उनका कहना है कि सरायमीर, निजामाबाद, खैराबाद, मुबारकपुर, बिलरियागंज, मोहम्मद खान और अतरौलिया से हजारों बच्चे दिल्ली, मुंबई, अलीगढ़, हैदराबाद और लखनऊ में पढ़ाई के साथ ही रोजी-रोजगार के लिए गए हैं। देश विरोधी ताकतें उन्हें बहका सकती हैं। लेकिन इसका माकूल जवाब इस पूरे इलाके को बदनाम करने की बजाय ऐसे मुकम्मल इंतजाम होने चाहिए – ताकि यहां के बच्चे बहकावे में आकर देशविरोधी ताकतों के हाथों का खिलौना ना बनें।
ये काम आजमगढ़ की मूल पहचान को बिगाड़कर तो नहीं ही किया जाना चाहिए। अन्यथा इससे जो नुकसान होगा – उसकी तासीर दूर और देर तक महसूस की जाती रहेगी।

साभार : उमेश चतुर्वेदी, balliabole

शुक्रवार, फ़रवरी 18, 2011

कृष्ण कुमार यादव को डा0 अम्बेडकर राष्ट्रीय फेलोशिप अवार्ड-2010

(कृष्ण कुमार यादव जी की रचनाधर्मिता बहुतेरे दिखती रहती है. समकालीन साहित्य में उभरते हुए वे एक सशक्त हस्ताक्षर हैं. मूलत: आजमगढ़ जिले के निवासी के.के. यादव जी वर्तमान में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं. अंडमान में रहते हुए भी हिंदी साहित्य के प्रति उनकी निष्ठा अटूट है. उन्हें यह भी गौरव प्राप्त है कि जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर आजमगढ़ के छात्र के रूप में उन्होंने ना सिर्फ प्रथम प्रयास में IAS जैसी कठिन परीक्षा पास की अपितु इन सेवाओं में चयनित वे पूरे भारत में प्रथम नवोदयी छात्र भी हैं. प्रशासन और साहित्य में सामानांतर स्थान रखने वाले युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव जी को हाल ही में भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने अपने रजत जयंती वर्ष में ‘’डा. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2010‘‘ से सम्मानित किया है। श्री यादव को यह सम्मान साहित्य सेवा एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान के लिए प्रदान किया गया है। इस सम्मान पर कृष्ण कुमार यादव जी को हार्दिक शुभकामनायें. आप यूँ ही सृजन कर्म में प्रवृत्त हों और प्रशासन के साथ-साथ साहित्य एवं ब्लॉग जगत को नए आयाम दें.)

सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय 33 वर्षीय श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य संग्रह), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह), अनुभूतियां और विमर्श (निबन्ध संग्रह) और इण्डिया पोस्टः 150 ग्लोरियस ईयर्स, क्रान्ति यज्ञः 1857 से 1947 की गाथा प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डाॅ0 राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुफ्तगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। शोधार्थियों हेतु आपके जीवन पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव‘‘ ( स0 डा0 दुर्गाचरण मिश्र) भी प्रकाशित हुई है। श्री यादव की रचनायें पचास से ज्यादा संकलनों में उपस्थिति दर्ज करा रहीं हैं और आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर और पोर्टब्लेयर से भी उनकी रचनाएँ और वार्ता प्रसारित हो चुके हैं. श्री कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ‘शब्द सृजन की ओर‘ और ‘डाकिया डाक लाया‘ नामक उनके ब्लॉग चर्चित हैं।

ऐसे विलक्षण व सशक्त, सारस्वत सुषमा के संवाहक श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्वे विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान -2009‘‘, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा काव्य शिरोमणि-2009 एवं महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, मध्य प्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी, प्रतापगढ द्वारा '' विवेकानंद सम्मान'' , महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ''महिमा साहित्य भूषण सम्मान'' नगर निगम डिग्री कालेज, अमीनाबाद, लखनऊ द्वारा ‘‘सोहनलाल द्विवेदी सम्मान‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘ व ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानोपाधि संस्थान, कुशीनगर द्वारा ‘‘राष्ट्रभाषा आचार्य‘‘ व ‘‘काव्य गौरव‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, दृष्टि संस्था, गुना द्वारा ‘‘अभिव्यक्ति सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘‘ब्रज गौरव‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘, खानाकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती, ठाणे द्वारा ‘‘साहित्य विद्यावाचस्पति‘‘, उत्तराखण्ड की साहित्यिक संस्था देवभूमि साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, सृजनदीप कला मंच पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘सृजनदीप सम्मान‘‘, मानस मण्डल कानपुर द्वारा ‘‘मानस मण्डल विशिष्ट सम्मान‘‘, नवयुग पत्रकार विकास एसोसियेशन, लखनऊ द्वारा ‘‘साहित्यकार रत्न‘‘, महिमा प्रकाशन छत्तीसगढ़ द्वारा ‘‘महिमा साहित्य सम्मान‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘ व ’’अक्षर शिल्पी सम्मान’’, न्यू ऋतम्भरा साहित्यिक मंच, दुर्ग द्वारा ‘‘ न्यू ऋतम्भरा विश्व शांति अलंकरण‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना (म0प्र0) द्वारा ’’अक्षर शिल्पी सम्मान-2010’’ , साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ''हिंदी भाषा भूषण-2010'' इत्यादि तमाम सम्मानों से अलंकृत किया गया है। ऐसे युवा प्रशासक एवं साहित्य मनीषी कृष्ण कुमार यादव को बधाईयाँ।

बुधवार, फ़रवरी 16, 2011

आज़मगढ़! बहुत बदल गया यह शहर...

आज़मगढ़! बहुत बदल गया यह शहर. हमारे बचपन मे यह हरा-भरा और खूबसूरत शहर हुआ करता था. पर आज़कल इस शहर में भीड़ बढ़ती जा रही है.जब भी घर जाता हूं, इसे और भी शोरगुल और भीड़ से भरा हुआ पाता हूं. इस बार जब रिक्शे पर बैठकर स्टेशन से घर की ओर चला, तो सड़क पर कुछ ज्यादा ही शोरगुल दिखा.टौंस पर बने पुल पर नए किस्म की लाइटें लगी हुई थीं. उस बड़े से मैदान जो अग्रेज़ो के ज़माने में पोलो ग्राउड हुआ करता था, में चल रहा आज़मगढ़ महोत्सव समाप्त हो चुका था. गिरजाघर चौराहा का नाम अब न्याय चौराहा हो चुका था. आज़मगढ़ महोत्सव इस बार काफ़ी भव्य रहा और हंगामेखेज भी. विवेकानंद की तस्वीर स्टेज पर रखने और स्कूली बच्चों द्वारा खेले जा रहे नाटक में सीता के जींस-टाप पहनने को लेकर खूब बवाल मचा।
देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी लोग धार्मिक रूप से काफ़ी संवेदनशील हो चुके हैं. हर बार की तरह इस बार भी टौंस नदी के घाट पर दोस्तों के साथ देर तक बैठा रहा. नाव की सैर की. नदी में नहाना भी चाहता था लेकिन अब टौंस का पानी इतना गदा हो चुका है कि नहाने लायक नहीं रहा. टौंस गंदी और छिछ्ली होती जा रही है. हमारे बचपन में टौंस के किनारे खेती होती थी अब इसके किनारे पर घर बनते जा रहे हैं. यही हाल रहा तो कुछ सालों में यह नदी गंदे नाले में बदल जाएगी. काश हम अपनी नदी तालाबों के प्रति भी थोड़े संवेदनशील हो पाते।


साभार : ब्रजेश का चायघर

मंगलवार, फ़रवरी 08, 2011

आजमगढ़ से आ रही है तुलसी की महक

भारतीय जनमानस की आस्था का केन्द्र मानी जाने वाली तुलसी अब आंगन की बजाय खेतों में लहलहा रही है। आजमगढ़ में जब तुलसी उगाने का विचार रखा गया तो किसानों को पहले-पहल अजीब लगा और किसी ने इसकी खेती करने के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

लेकिन जीवन के 87वें साल की दहलीज पर खड़े कैलाशनाथ सिंह ने आर्गेनिक इंडिया के प्रस्ताव पर विश्वास जताते हुए तुलसी की खेती को लेकर अपनी सहमती दे दी। बकौल कैलाशनाथ-``जब मैने फर्म की पद्धति को देखा तो मेरा संदेह विश्वास में परिवर्तित हो गया।´´ इस तरह एक वयोवृद्ध द्वारा दिखाए गया साहस बेहतर लाभांश दे रहा है। यही नहीं कैलाशनाथ की आय में बढ़ोत्तरी को देख अन्य किसानों भी उनका अनुसरण करने लगे हैं। आज पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों आजमगढ़, मऊ और सुल्तानपुर के अलावा सूखे की मार झेल चुके बुंदेलखंड के हजारों किसानों ने परंपरागत फसलों के साथ साथ नकदी फसल के रूप में तुलसी की खेती शुरु कर दी है। यहां करीब दो से ढाई हजार एकड़ जमीन में सालाना 2,000 टन से भी अधिक तुलसी का उत्पादन हो रहा है।

उल्ललेखनीय है कि आतंकवादियों की नर्सरी कहे जाने वाले आजमगढ़ में तुलसी की व्यावसायिक खेती से स्थानीय किसानों ने सफलता की एक नई कहानी का सूत्रपात किया है, जिससे किसानों के जीवन में प्रभावकारी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। कुछ समय पहले तक आजमगढ़ में धान और गेहूं की परंपरागत फसले पैदा की जाती रही हैं। लेकिन बेहतर मुनाफे के चलते रबी और खरीफ की परंपरागत फसलों के साथ साथ अब तुलसी की खेती पर स्थानीय लोगों की निर्भरता बढ़ती जा रही है।

आजमगढ़ राजनीतिक रूप से भले ही मजबूत रहा हो, लेकिन उद्योग धंधों की दृष्टि से पिछड़े इस क्षेत्र का अधिकतर कृषि क्षेत्र ऊसर है। किसानों के लिए कैश क्रॉप के रूप में पैदा होने वाले गन्ने की पैदावार में भी निरंतर कमी आई है, जिसके चलते यहां बची-खुची एक चीनी मिल को भी नहीं बचाया जा सका। लेकिन तुलसी की खेती ने स्थानीय लोगों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन किये हैं। बदलाव की कहानी आज़मगढ़ शहर से लगे कुम्हेपुर गांव से शुरु होती हैं। कुम्हेपुर में पैदा हुए डॉ. नरेन्द्र सिंह ने तुलसी के गुण, प्रभाव, उपयोग और इसकी मािर्कट वैल्यु को ध्यान में रखकर अध्ययन किया और अपने पैतृक गांव को ही इसकी प्रयोगशाला बनाया। वर्ष 2000 में कुम्हेपुर में डॉ. नरेन्द्र सिंह ने अपने ही खेतों में तुलसी की खेती शुरु कर दी। शुरुआती तीन वर्ष तो खेतों को रसायनिक खाद के दुष्प्रभाव से मुक्त करने में ही लग गए। इसके बाद वहां तुलसी के की जैविक पद्धति से खेती शुरु की गई। तुलसी की खेती के पीछे इस क्षेत्र के गरीब किसानों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने का उद्देश्य निहित था। कुछ समय बाद प्रयास रंग लाने लगा और करीब 6 साल के बाद कुम्हेपुर गांव में आरंभ हुई तुलसी की खेती आसपास के 13 गांवों में 700 एकड़ से अधिक क्षेत्र में की जा रही है और इससे यहां के किसान एक करोड़ रुपये तक सालाना कारोबार कर रहे हैं। जिसके कारण अन्य किसानों में भी तुलसी की खेती को लेकर रुचि बढ़ रही है।

कैलाशनाथ की सफलता के बाद किसानों को तुलसी की खेती के लिए राजी करना मुश्किल नहीं रह गया। लखनऊ स्थित संस्था `आर्गेनिक इंडिया´ ने जब उत्पादन लागत एवं फसल उत्पादन में जोखिम वहन करने की घोषणा कर दी तो काम और भी आसान हो गया। स्थानीय बाजार में तुलसी की कीमत 10 से 15 रुपये किलो बताई जाती है, जबकि आर्गेनिक इंडिया 80 से 90 रुपये देकर किसानों से तुलसी खरीदने लगी। संस्था के सीईओ एवं प्रबंध निदेशक कृष्ण गुप्ता आर्गेनिक इंडिया के लिए भी इसे फायदे का सौदा बताते हैं। वे कहते हैं कि-``जो तुलसी ये किसान पैदा कर रहे हैं, वह पूर्णत: आर्गेनिक होती है, जिसके चलते अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसके बेहतर दाम मिल जाते हैं। यही नहीं रसायनिक खाद का उपयोग ना होने से उत्पादन लागत भी सस्ती है।´´ गुप्ता के मुताबिक किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए सिरदर्दी भी मोल नहीं लेनी पड़ती और समस्त उत्पाद संस्था द्वारा खरीद लिया जाता है। जनवरी से जून के फसल सीजन के दौरान अच्छी पैदावार के लिए कंपनी किसानों की मदद हेतु फील्ड एवं टेक्नीकल मैनेजर तैनात करती है। डॉ. नरेन्द्र और भारत मित्रा ने मिलकर `आर्गेनिक इंडिया फांउडेशन´ नाम की संस्था गठित की और आजमगढ़ में ही अमेरिकी पद्धति से एक छोटा सा उद्योग लगाया, जिसमें जैविक खेती से उत्पादित तुलसी चाय के रूप में प्रयोग किया, जो आज अनेक प्रकार की गंभीर बीमारियों में दवा के रूप में प्रयोग की जा रही है। अब यहां के किसान तुलसी की तीन प्रजातियों रामा तुलसी, श्यामा तुलसी तथा वन तुलसी की खेती करते हैं। तुलसी की ये तीनों प्रजातियां अलग-अलग रंगों में होती हैं।

बकौल डॉ. नरेन्द्र सिंह-``पूरे देश के किसान अधिक अनाज उत्पादन के लिए रसायनिक खादों का प्रयोग करते हैं, जिसके कारण खेत की मिट्टी की उर्वराशक्ति दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही और उत्पादित होने अनाज के सेवन से लोग हृदय एवं रक्त संबंधी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। लगातार कम होती मिट्टी की ताकत से भविष्य में अनाज का उत्पादन मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में अब जैविक खेती ही एकमात्र रास्ता है, जिसे अपनाकर किसान इन गंभीर परिणामों से मुक्त रह सकते हैं। अब किसान तुलसी के अलावा मटर, गेहूं, चना, अदरक, हल्दी जैसी चीजों की खेती कर रहे हैं और बिना रसायनिक खादों का उपयोग किए भरपूर उत्पादन प्राप्त कर हैं।´´

हालांकि अब कई स्थानों पर तुलसी की खेती हो रही है, लेकिन इसकी शुरुआत का श्रेय आजमगढ़ को ही जाता है। यहां की जैविक खेती से उत्पादित तुलसी अमेरिका, जर्मनी, जापान, स्विट्जरलैंड समेत दुनिया के अनेक देशों में भेजी जा रही है। आजमगढ़ की तर्ज पर उत्तरप्रदेश के ही सुल्तानपुर जिले के किसानों ने भी तुलसी की खेती को अपनाया है। गोसाईगंज के शहादतपुर गांव के शरद वर्मा, जामो के रामयज्ञ यादव, गौरीगंज विकासखंड के पजेहरी निवासी रणंजय सिंह ने धान एवं गेहूं के साथ साथ तुलसी की खेती भी आरंभ कर दी है। विभिन्न योजनाओं के जरिये तुलसी की खेती को बढ़ावा देने के लिए अब सरकार भी विभिन्न कार्यक्रम शुरु कर रही है। कृषि, उद्यान एवं कृषि प्रसार विभाग भी तुलसी की खेती को बढ़ावा देने के लिए काम करेंगे, जिसके अन्र्तगत चुनिंदा किसानों को प्रशिक्षित करके उन्हें मॉडल खेती हेतु तैयार किया जायेगा। किसानों को बाजार उपलब्ध हो इसकी भी योजना बनाई जा रही है।

फरवरी के आखिरी दिनों में नर्सरी तैयार करने साथ तुलसी की फसल उपजाने की कोशिश शुरु हो जाती है। अप्रैल आते आते इनका खेतों में पौध रोपण आरंभ हो जाता है।एक हेक्टेयर में तुलसी के रोपण के लिए ढाई सौ ग्राम बीज काफी माना जाता है। करीब बारह दिनों में बीज उग आते हैं और छह सप्ताह में पौध तैयार हो जाती है। भारत में आमतौर पर दो तरह की तुलसी उगाई जाती है। इनमें से एक `इंडियन बेसिल´ है तो दूसरी का नाम पूसा बेसिल है। इंडियन बेसिल की खेती तेल उत्पादन के लिए होती है। इस तेल का उपयोग देश विदेश की की फ्लेवर एवं सुगंधी निर्माता औद्योगिक इकाइयों में होता है। इसके अलावा तुलसी के अनेक औषधीय गुण हैं, जिसके चलते इसकी मांग काफी है। तुलसी के पौधों की डाल व तनों से भी तमाम औषधियां, माला एवं धार्मिक वस्तुएं निर्मित होती हैं। इंडियन बेसिल प्रजाति की तुलसी कम समय में तैयार होने वाली फसल मानी जाती है। विभिन्न जलवायु की दशाओं में यह करीब 75 से 80 दिन में तैयार हो जाती है, जिससे 15 से 20 हजार रुपये की कीमत का करीब 50 किलोग्राम तेल प्राप्त किया जा सकता है। दूसरी ओर पूसा बेसिल के पत्तों का उपयोग दवाइयों एवं हर्बल चाय के लिए होता है। बहरहाल संशय की स्थिति से बचने के लिए उत्पादन शुरु करने से पूर्व इसके बाजार एवं उत्पादन प्रक्रिया की पर्याप्त जानकारी जुटा लेना बेहतर होगा।

(उमाशंकर मिश्र)

साभार : विस्फोट.काम

बुधवार, फ़रवरी 02, 2011

आ से आजमगढ़, आ से आईपीएल

सोहेल तनवीर और कामरान खान एक सिक्के के दो पहलू. एक के देश पर आतंकवादी का ठप्पा है तो दूसरे के जिले पर।

दोनों में अंतर इतना है कि पाकिस्तान का होने के नाते सोहेल आईपीएल में नहीं खेल पा रहा है, वहीं उसकी जगह कामरान को अवसर मिला है. बाएं हाथ से गेंदबाजी करने वाले सोहेल ने जिस तरह राजस्थान रायल्स को पहला आईपीएल जिताने में अहम भूमिका अदा की थी, उसी भूमिका में बाएं हाथ से 140 किमी की रफ्तार से गेंद फेकने वाले कामरान की यार्कर अपने विरोधियों के लिए खतरनाक साबित हो रही है. राजस्थान रायल्स के कोच डेरिन बैरी के शब्दों में “हमें एक युवा खिलाड़ी की जरुरत थी जो मैच का पासा पलट सके.” शायद इसी खूबी के चलते शेनवार्न ने कामरान का निक नेम बवंडर रखा है. इस बवंडर को क्रिकेटिया सांचे में ढालने वाले पूर्व रणजी खिलाड़ी उबैद कमाल कहते हैं “वो मेरी कल्पनाओं का इकबाल है.”

इस बवंडर की जड़ो की तलाश में जब पिछले दिनों आजमगढ़ रोडवेज पर पहुंचा तो चाय की दुकानों से लेकर पेपर वालों तक हर तरफ कामरान के उस विकेट की चर्चा हो रही थी जिसे उसने हाल ही में दिल्ली डेयरडेविल्स के खिलाफ लिया था. बातों ही बातों में चाय की दुकान पर बैठे मनोज सिंह से मुखातिब हुआ. बकौल मनोज सिंह “एक महीना पहले आया था तब उसे हम स्टेडियम ले गए थे. ऐसी शानदार गेंद फेंक रहा था कि हमें विश्वास नहीं हो रहा था कि ये वही कामरान है.” मनोज आजमगढ़ क्रिकेट संघ के सहसचिव हैं. उन्होंने बताया कि कामरान का घर आजमगढ़-मऊ जिले की सरहद पर बसे नदवासराय में है. वैसे तो उसका घर मऊ जिले में है पर उसने क्रिकेट सीखा और खेला आजमगढ़ में ही. इसलिए आजमगढ़ उसकी पहचान बन गयी.

शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी सुनील कुमार दत्ता हमारी ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि आजमगढ़ मीडिया का भुक्त भोगी है, कल वही लोग यहां की गलियों में खेलने वाले बच्चों के फुटेज दिखा-दिखाकर हमको आतंकवादी कह रहे थे, आज वही लोग अपनी जरुरतों के चलते फिर आ गए हैं.देश में हुई आतंकवादी घटनाओं के बाद आजमगढ़ के लोगों के पकड़े जाने और संदिग्ध बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद आज इस जिले के लोगों को लखनऊ, दिल्ली, मुबंई समेत पूरे देश में किराये पर कमरे तक नहीं मिल रहे हैं. क्रिकेट खिलाड़ी पंकज पाण्डे कहते हैं कि जो लोग हमें बदनाम कर रहे हैं, उन्हें जानना चाहिए कि कामरान ही नहीं अब्दुल्ला इकबाल जैसे आईपीएल खिलाड़ी से लेकर नोमान जैसे यूपी के सबसे तेज बालर आजमगढ़ की ही देन हैं. पंकज के साथ अब्दुल्ला के घर बदरका जाना हुआ. जहां अब्दुल्ला पुकारने पर उसकी छोटी बहन आयशा ने दरवाजा खोला- “भाईजान खलने गए हैं.” बाद में नियाज अहमद से मुलाकात हुई जो बेटे के क्रिकेट की प्रशंसा करते हुए बड़ी फिक्र के साथ कहते हैं कि पूरे देश में हमारे जिले के प्रति जो माहौल बनाया जा रहा है वो हमारे बच्चों की तरक्की में रोड़ा बन रहा है. बहुत तल्ख भाव से वे कहते हैं “ सबसे खतरनाक मीडिया है. उसका कोई उसूल नहीं रह गया है.” कामरान के भाई नौशाद कहते हैं- “ यकीन नहीं होता, लकड़ी के बैट से गली में क्रिकेट खेलने वाला मेरा भाई विलायत में खेल रहा है.” बहन कहकशां कहती हैं कि बिजली नहीं रहती पर भाईजान के मैच वाले दिन किराए का जनरेटर लेकर पूरे गांव के साथ क्रिकेट देखा जाता है. परिवार के लोग कामरान का क्रिकेट देखने के लिए दक्षिण अफ्रीका जाना चाहते हैं पर घर की माली हालत उन्हें इजाजत नहीं देती.
गरीबी-मुफलिसी की सौगात लिए कामरान के जीवन में पांच साल पहले एक अहम मोड़ आया, जब जिले के ही कोच नौशाद ने उसे मुंबई चलने को कहा था पर वालिद के इंतकाल के चलते वो नहीं जा पाया.

“आजमगढ़ के क्रिकेट का इतिहास बहुत रोचक है ”, कहते हुए मसीउद्दीन संजरी बताते हैं “ 80 के दौर में निजामाबाद में एक बंगाली बाबू हुआ करते थे, जिन पर क्रिकेट का भूत सवार था. जो अक्सर छुट्टियों के बाद अलीगढ़ में पढ़ने वालों के आ जाने पर मैदान में उतर जाता था.” वे याद करते हुए बताते हैं कि शायद यहीं से जिले में टूर्नामेंटों की शुरुवात हुई जिसका केंद्र सरायमीर हुआ करता था. जहां की देन कामरान और नोमान जैसे खिलाड़ी हैं. आजमगढ़ जैसे पिछड़े जिलों में सैकड़ों कामरान और नोमान हैं जिन पर उनके शहर की बिगाड़ी गई छवि का कोई असर नहीं पड़ेगा.दोनों के साथ खेले और साथ ही लखनऊ गए वसीउद्दीन कहते हैं कि दोनों का पढ़ाई में कभी मन नहीं लगा, शायद वे क्रिकेट के लिए ही पैदा हुए हैं. नोमान को फोन करके बाजार में आने के लिए कहते हुए बताते हैं “ दोनों का फार्म-वार्म हम ही लोग भरवाते हैं.”

सरायमीर के इसरौली गांव के रहने वाले मोहम्मद नोमान यूपी अण्डर 22 में खेलते हैं. कामरान और नोमान अल्फा क्लब इसरौली से खेलते थे, जिसके कप्तान नोमान हुआ करते थे. नोमान बताते हैं कि डेढ़-दो साल पहले दोनों लखनऊ गए, जहां कामरान को उबैद कमाल का सानिध्य मिला, वहीं मुझे पूर्व रणजी खिलाड़ी शाहनवाज बख्तियार का. नोमान बताते हैं कि ज्यादा मैच सरायमीर इलाके में होता था और हम लोग टेनिस बाल से खेलते थे. घर दूर होने के कारण कामरान मेरे ही घर रहता था. नोमान जनवरी 08 में हुए यूपीसीए कैंप को दोनों के लिए वरदान मानते हैं. नोमान कहते हैं “ उबैद सर के अण्डर में बीते दस दिनों ने हमारी लाईफ चेंज कर दी और जहां तक मेरा सवाल है तो मेरी पूरी गेंदबाजी को शाहनवाज सर ने निखारा.” उबैद कमाल कहते हैं “ कामरान जब मेरे पास आया था तो उसके रनअप आदि में खामियां थी जिसे मैने काफी हद तक सुधारने की कोशिश की और जहां तक नोमान का सवाल है तो नो डाउट वह भी एक दिन टीम इंडिया की टी शर्ट पहनेगा.” शाहनवाज बख्तियार कहते हैं कि आजमगढ़ जैसे पिछड़े जिलों में सैकड़ों कामरान और नोमान हैं, जिन पर उनके शहर की बिगाड़ी गई छवि का कोई असर नहीं पड़ेगा.

यहां एक तल्ख सच्चाई यह है कि कामरान हो या नोमान सभी ने उसी संजरपुर गांव के मैदान पर अपने क्रिकेटिया जीवन के शुरुआती मैचों को खेला और सीखा जिस पर आज आतंकवादियों के गांव का ठप्पा लगाया गया है. यहीं के तारिक शफीक के साथ आरिफ के घर जाना हुआ, जिस पर देश में हुए कई बम धमाकों का आरोप है. घर की खामोशी को तोड़ते हुए एक आवाज आई “ मेरे बेटे का क्या कसूर था ? सिर्फ यह ना कि उसे पढ़ने के लिए लखनऊ भेज दिया था.” यह बोलते हुए आरिफ की मां फरजाना बेगम आलमारी में भरे पड़े दर्जनों सील्डों और ट्राफियों की तरफ इशारा करते हुए कहती हैं “ मेरा बेटा मुल्क के लिए क्रिकेट खेलना चाहता था पर हुकूमत ने उसे अपने खिलाफ खेल खेलने के झूठे आरोप में फंसा दिया.”

सन्नाटा फिर पसर गया.

रविवार पर राजीव यादव का 29 मई, 2009 को प्रकाशित यह लेख साभार.

सोमवार, जनवरी 31, 2011

आजमगढ़ का पल्हना मंदिर (माँ पल्हमेश्वरी देवी सिद्ध पीठ)

माँ पल्हमेश्वरी देवी जी (पल्हना मंदिर) के नाम से जन जाने वाला देवी दुर्गा जी का सिद्ध पीठ जिला आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में स्थित है यह वाराणसी (बनारस) से ८२ किलोमीटर दूर है आप को इस स्थान के दर्शन के लिए वाराणसी से सीधे आजमगढ़ वाली बस पकड़ के लालगंज (मासिरपुर मोड़) उतरना होगा या आप बस वाले को बोलेंगे की माँ पल्हमेश्वरी के दर्शन को जाना है तो वो ख़ुद ही आपको लालगंज (मासिरपुर मोड़ ) पर उतार देगा वहा से सीधे ही जीप या ऑटो जाते है मसिरपुर मोड से तरवा मार्ग पर मात्रा १५ किलोमेटेर पर माँ भगवती का सिद्ध पीठ स्थान है यहा के जो ब्राह्मण है वो भारथिपुर गॅव के है जो माँ के मंदिर से मात्रा ३ किलोमीटेर पर है वो ही माँ भगवती का शृंगार करते है,पूजा अर्चना करते है,प्रातः काल एवम् संध्या के समय आरती करते है इन ब्राह्मणो के पूर्वजों को माँ भगवती ने सपने मे दर्शन दिया और कहा की तुम मेरी इस जगह पर पूजा करो, मेरा तुम मंदिर बनवओ मेरा यश अपने आप बढ़ेगा, महामाई बोली मै तुम्हारे वंश का कल्याण करूँगी और युग युगांतर तक तुम्हारे वंश के लोग ही मेरी पूजा का लाभ प्राप्त करेंगे और उनका उद्धार होगा, यह वो ही स्थान है जहा माँ भगवती के चरणो का उपर का हिस्सा पिंडलियो वाला (पालथी) गिरी थी जब मथुरा नरेश कंस ने देवकी के आठवे संतान के जन्म की सूचना मिली तो वह काराग्रह मे गया और देखा की ये आठवी संतान तो लड़का नहीं पैदा हुआ लड़की पैदा हूई है तो वह सोचा की ये जरुर् भगवान विष्णु की चाल है इस कन्या को मारना उचित होगा और उसने उस कन्या को जब हाथो मे पकड़ कर पत्थर पर पटकना चाहा तो वह देवी रूपी कन्या कंस के हाथो से उड़ कर आसमान मे जाकर आकाशवाणी की हे कंस तू मुझे क्या मरेगा जो तुझे मरने वाला है वो तो इस पर्थ्वी पर पैदा भी हो चुका है और फिर देवी माँ खंड खंड रूप मे विभाजित हो गई और जहा जहा जो जो अंग गिरा वो सिद्ध पीठ के रूपो मे पूजा जाता है उन स्थानो मे विंध्याचल (मिर्जापुर) , चौकियाँ माई ( जोनपुर,उत्तर प्रदेश ) आदि .... और भी सिद्ध पीठ स्थान है उन्ही मे से एक माँ पलह्मेश्वरी देवी (सिद्ध पीठ) भी है यहा जो माँगो वो मिलता है यह एक सच्चा दरबार है यहा माँ दरबार मे दोनो नवरत्रो मे भारी संख्या मे भीड़ लगती है .

पल्हना मंदिर के पुजारी ब्रह्मण संघ के सोजन्य से (09899890924)

शुक्रवार, जनवरी 28, 2011

आजमगढ़ का नायक : शकील भाई

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले/खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है।' अल्लामा इकबाल के इस शेर का इस्तेमाल अमूमन खास लोगों की हौसला-आफजाई के लिए होता है। यही शेर लाहीडिहां बाजार भटवां की मस्जिद में भी एक पान की दुकान पर सुनने को मिला। तभी सुनने वालों में से ही किसी ने पूछ लिया- इसका कद्रदां कौन है? सुनाने वाले ने भी देरी नहीं की और एक सामान्य कद-काठी के दाढ़ी वाले बंदे को पकड़ लाया और बोला-ये हैं शेर के असली कद्रदां-तोआं गांव के शकील भाई।

तोआं आजमगढ़ जिले के सरायमीर थाने का एक गांव है। सरायमीर का जिक्र पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर इस रूप में होता रहा है कि यहां बम धमाकों के सबसे ज्यादा आरोपी पकड़े गये हैं। भटवां की मस्जिद पर मिले लोग कहते भी हैं कि 'आजमगढ़ में आतंक की तो चर्चा सब जगह है, लेकिन इसी जिले में शकील भाई ने अकेले दम पर एक पुल का निर्माण, दूसरे के आधे से अधिक का काम पूरा कर और तीसरे की बनाने की योजना तैयार कर जो साहस दिखाया है उसकी चर्चा न तो मीडिया कर रही है और न ही सरकार प्रोत्साहित करने में दिलचस्पी दिखा रही है।'

बगैर किसी सरकारी सहायता के सिर्फ चंदा मांगकर पिछले दस वर्षों के अकथ प्रयास से शकील भाई ने जो कर दिखाया है, उसे सुनकर एक दफा आश्चर्य लगता है। चंदा मांग कर धार्मिक स्थल और स्कूल बनाने की परंपरा तो रही है लेकिन पुल भी चंदा मांग कर बन सकता है, ऐसा सोचना मुश्किल लगता है। इसमें दो राय नहीं कि प्रदेश के सांप्रदायिक सौहार्द वाले जिलों में हमेशा अव्वल रहे आजमगढ़ में फिर एक बार गंगा-जमुनी संस्कृति को हंगामा मचाये बिना ही शकील भाई ने समृध्द किया है।

जिला मुख्यालय से मात्र 40 किलोमीटर की दूरी पर मगही नदी पर बने इस पुल को शकील सामाजिक सहयोग की देन मानते हैं। लगभग 50 गांवों को आपस में जोड़ने वाले इस पुल ने दर्जन भर गांवों की जिला मुख्यालय और थाने से दूरियों को कम किया है। पुल ही बनाने की योजना शकील ने क्यों हाथ में ली ? इसके पीछे एक दिल को छू देने वाली घटना है। लेकिन इससे पहले शकील मीडिया को लेकर शिकायत करते हैं कि 'जिला-जवार के दलालों की खबरों को तो पत्रकार बंधु तवज्जो देते हैं मगर अच्छे कामों पर एक बूंद स्याही खर्च करने में कोताही क्यों बरतते हैं। खुफिया और सरकारी बयानों को सच की तरह पेश करने वाली मीडिया ने बाहर वालों के लिए कुछ ऐसी बना दी है कि लोग मानने लगें कि यहां के मुसलमानों में ही कुछ नुक्स है।'

जिस तरह पुल अपने ऊपर से गुजरने वालों की जाति-धर्म से मतलब नहीं रखता, वैसे ही शकील भाई भी सिर्फ इंसानी पहचान के ही पैरोकार हैं। टौंस नदी पर बन रहे पुल का काम कराने में व्यस्त शकील भाई से हुई मुलाकात में पूछने पर कि आपने पुल बनाने की शुरूआत कैसे की? वे कहते हैं, 'वैसे तो यह किस्सा हर कोई बता सकता है लेकिन मेरे साथ बस इतना हुआ कि मैं उस किस्से का होकर रह गया. मैंने उससे मोहब्बत कर ली।'

बरसात का मौसम था और मगही नदी उफान पर थी। सरायमीर जाने का एकमात्र आसान रास्ता नदी पार करना ही था। साल के बाकी नौ महीनों में तो बच्चे चाह (बांस का पुल) पार कर स्कूल जाया करते थे लेकिन बरसात में पार करने का जरिया नांव ही हुआ करती थी। उस दिन भी बच्चे इस्लहा पर पढ़ने जा रहे थे। नांव में बारह बच्चे सवार थे और नांव नदी के बीचो-बीच उलट गयी। सुबह का समय होने की वजह से उसपार जाने वालों की तादाद थी इसलिए बारह में से ग्यारह बच्चे बचा लिए गये, लेकिन शकील के गांव के सैफुल्लाह को नहीं बचाया जा सका। उस समय षकील सउदी अरब में नौकरी कर रहे थे। शकील उन दिनों को याद कर बताते हैं, 'जब मैंने यह खबर सुनी तो मुझे बेचैनी छा गयी। मुझे लगता था कि कोई मुझसे हर रोज कहता है कि गांव जाते क्यों नहीं।'

बकौल शकील, 'उसके छह महीने बाद जब मैं घर आया तो मानो किसी ने कहा हो कि क्यों नहीं एक पुल ही बनवा देते, लेकिन मेरी मासिक आमदनी कुछ हजार रूपये थी और पुल बनाने के लाखों रूपये वाले काम को हाथ में लेना संभव नहीं लगा। लोगों से बात करने, सुझाव लेने और आत्मविश्वास हासिल करने में दो साल और लग गये। फिर मैंने हिम्मत जुटाकर अकेले ही चंदा मांगना शुरू किया। बहुतों ने कहा कि कमाने-खाने का धंधा है। चीटर तक कहा, लेकिन मैंने न किसी का जवाब दिया और न ही आरोपों से आहत हुआ। मुझे अपनी नियत पर भरोसा था। अल्लाह को गवाह मानकर पुल बनाने की योजना पर आगे बढ़ गया। यहां आसपास के गांवों से सहयोग लेने के बाद मुंबई, दिल्ली, गुजरात ही नहीं दुबई जाकर भी मैंने चंदा जुटाया।'

चंदा के अनुभवों को साझा करते हुए शकील से पता चला कि कुछ ने दिया तो कुछ ने दुत्कार दिया। मददगारों में सबसे अधिक मदद गुजरात के वापी शहर के रहने वाले 85 वर्षीय हाजी इसरानुलहक ने की और कर रहे हैं। शकील के शब्दों में कहें तो 'हाजी साहब को तहेदिल से शुक्रिया करता हूं जिन्होंने भावनात्मक और आर्थिक दोनों ही स्तरों पर भरपूर मदद की। साथ ही मैं इंजीनियर संजय श्रीवास्तव की चर्चा करूंगा जो कि मेरे दोस्त भी हैं, जिन्होंने एक पाई लिये बगैर हमेशा सहयोग दिया।'

शकील यह बताना नहीं भूलते कि हाजी साबह ने कभी इसको रत्तीभर भी भुनाने की कोशिश नहीं की। आग्रह करके हम गांव वालों ने उन्हीं से बन चुके पुल का शिलान्यास भी कराया और अब इरादा है कि उस पुल का नाम सैफुल्ला के नाम पर रखें, जिसकी नदी में डूबने से मौत हो गयी थी। राजापुर गांव के मतीउद्दीन बताते हैं कि 'सैफुल्ला रिश्ते में सलीम का कुछ नहीं लगता था फिर भी उसने जो संकल्प लेकर किया उससे हजारों सैफुल्लाओं के परिजन हमेशा शकील को सलाम करेंगे, दुआएं देंगे।'

सामाजिक दायरे के अलावा क्या किसी और ने मदद की? इस पर शकील हंसते हुए कहते है,'सरकारी विभागों से हमने कई दफा मदद की दरख्वास्त की। सांसदों-विधायकों के यहां गुहार लगाने गये। प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे रामनरेश यादव के यहां भी गांववाले लेकर गये, पर बात नहीं बनी। इतना ही नहीं, मेरी आर्थिक और पारिवारिक औकात जानने के बाद तो मौके पर जगहंसाई भी करते थे। समाज के संभ्रात लोगों का यह रवैया देखकर मन भारी और थका हुआ महसूस करता था। कई दफा लगा कि पीछे हट जायें। लेकिन हताशा का विचार आते ही बचपन से जवानी तक सुने साहस के किस्से-कहानियों से मुझे बल मिलता था। अपने बुजुर्गों से सुने उन साहसिक कहानियों की यादों के साथ, वह पल भी याद कर मन ख़ुशी से भर उठता था जब कहानियों के नायक या नायिका लाख मुश्किलों के बावजूद संघर्ष के मुकाम तक पहुंचते थे।'

शकील के इस उम्दा प्रयास में गौर करने लायक बात यह है कि जिस समाज ने एक समय में इन्हें दुत्कारा, उसी समाज के कुछ लोगों ने शकील भाई की मदद भी की और आगे चलकर हाथों-हाथ लिया। इसलिए शकील कहते भी हैं कि 'पुल निर्माण सामाजिक सहयोग के बदौलत ही संभव हो पाया।' लगभग 60 लाख से ऊपर धनराशी खर्च हो चुकी है। यह पूंजी एक ऐसे आदमी ने जुटायी, जिसका न कोई सामाजिक रूतबा था और न ही कोई पारिवारिक रसूख। उसके पास ढंग का रोजगार तक नहीं था।

द पब्लिक एजेंडा में प्रकाशित और जनज्वार से साभार

मंगलवार, जनवरी 11, 2011

भोजपुरी लोकगायक बालेश्वर यादव नहीं रहे !

* निक लागे तिकुलिया गोरखपुर के
* मनुआ मरदुआ सीमा पे सोये , मौगा मरद ससुरारी मे.
* कजरा काहें न देहलू

                   अगर  आपो लोगन में से केहू ई गाना के ऊपर मस्ती से झुमल होखे या ई गाना कै शौक़ीन रहल होये तै अब ई आवाज अब कबहू न सुनाई देई. काहें से की ई मशहूर गाना  कै  गवैया बालेश्वर यादव जी अब ई दुनिया से जा चुकल बटे.
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                     बीते रविवार  ०९  जनवरी २०११ को इन्होने लखनऊ  के श्यामा प्रसाद  मुखर्जी अस्पताल में आखिरी साँस ली , जहाँ  ये कुछ समय से इलाज के लिये भर्ती थे. सन १९४२ में आजमगढ़ - मऊ क्षेत्र के मधुबन  कस्बे के पास चरईपार गाँव में जन्मे, बालेश्वर यादव भोजपुरी  के मशहूर बिरहा और लोकगायक थे.
                    अई...रई... रई...रई... रे  , के विशेष टोन से गीतों को शुरू करने वाले बालेश्वर ने अपने बिरहा और लोकगीतों के माध्यम से यू. पी.- बिहार समेत पूरे  भोजपुरिया समाज के दिलों पर वर्षों तक राज किया. वे जन जन के ये सही अर्थों में गायक थे. इनके गीत " निक लागे तिकुलिया गोरखपुर के " ने एक समय पुरे पूर्वांचल में काफी धूम मचाई थी.जन जन  में अपनी गायकी का लोहा मनवाने वाले इस गायक पर मार्कंडेय जी  और कल्पनाथ राय जैसे दिग्गज राजनीतिज्ञों की नज़र पड़ी तो तो यह गायक गाँव- गाँव की गलियों से निकलकर  शहरों में धूम मचाने लगा और कल्पनाथ राय ने  अपने राजनितिक मंचों से  लोकगीत गवाकर इन्हें  खूब सोहरत दिलवाई. बालेश्वर यादव २००४  में देवरिया के पडरौना लोकसभा सीट से कांग्रेस  पार्टी के टिकट पर जीतकर लोकसभा में भी पहुंचे.
                 इनके गाये गानों पर नयी पीढ़ी के गायक गाते हुए आज मुंबई में हीरो बन प्रसिद्धि पा  गये  , मगर ये लोकगायक इन सबसे दूर एक आम आदमी का जीवन जीता रहा. ये आम लोंगों के  गायक थे और उनके मन में बसे थे. अभी हाल में ही आजमगढ़ के रामाशीष बागी ने महुआ चैनल के सुर संग्राम में इनके गाये गीतों पर धूम मचा दी थी.  
            भोजपुरी के उत्थान और प्रचार  - प्रसार  में इनका महत्वपूर्ण  योगदान  है  . इनके गीत न केवल  अपने देश  में ही प्रसिद्ध  हुए बल्कि जहाँ भी भोजपुरिया माटी  के लो  जाकर  बस  गए , वहाँ   भी इन्हें गाने  के लिये बुलाया  जाता  रहा. इन्होने अपने भोजपुरी गीतों का डंका सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद, मारीशस, फिजी, हौलैंड इत्यादि देशो में भी बजाया  . सन १९९५ में बालेश्वर यादव को उत्तर प्रदेश की सरकार ने  लोक-संगीत में अतुलनीय योगदान हेतु ' यश भारती सम्मान 'से सम्मानित किया था. 

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शनिवार, जनवरी 08, 2011

भोजपुरी लघु कथा--छलिया प्रेमी

 सुबह जब  बुढाये   के साँझ के गोदी  सोवै  जात रहल तै वो बेला में रजमतिया के खेत के मेडी से गुजरत देख मिसिर के लौंडा रतन  के मन मचल गएल . आपन इशारा से रतन रजमतिया के मकई  के खेते में बुलावनै .
" ना बाब ना ,  केहू देख लेई तै का होई  " रजमतिया सकुचात  आपन बात कही के भागे  लागल.
" अरे नाहीं रे केहू देखि लेई तै का हो जाई. हम तै तोहरा से  पियार  करी  ला " रतन आपन  बाहीं कै सहारा देत रजमतिया से बोलनै.
" अगर कुछो गड़बड़ भई गयेल तब "
" तब का हम तोहरा से वियाह कई लेबी "
" अऊर  अगर जात बिरादरी कै चक्कर पड़ी गयेल तब "
" हम अपने साथै तुहके शहरवा भगा ले चालब ना........ " रतन रजमतिया के अपने  पहलु में समेटत कहने .
रजमतिया भी अब एतना आसरा  पाके मन से  गदगद हो गइल  और अपने भविष्य कै सपना सजावत   समर्पण कै दिहले.
कुछे देर बाद मिसिर बाबा अपने खेते के निगरानी बदे  वहां से गुजरने तै कुछ गड़बड़ कै आशंका तुरंते भाप  चिल्लैनन " कौने हई रे खेतवा में.. .. आज  लगत बाये कुल मकई टुटी  जाई ."
उधर रजमतिया के गाले  पै  रतन कै थप्पड़ पड़ल और चिलाये के कहनै ," दौड़िहा  बाबू जी हम रजमतिया के पकड़ लिहले बानीं ."  इ ससुरी आज मकई तोरै बदे खेत में घुसल रहे , " रजमतिया के तनिको  ना समझ  में आवत  की ई   का  होत बाये. मगर रतानवा  सब  समझ  गयेल रहेल की   अब  रजमतिया के ही चोर   साबित  कईके उ  रजमतिया से पीछा  छुड़ा  सकत  हवे . काहें के  की अब रजमतिया के भोगले के बाद अब उमें रतन कै तनिको इच्छा ना रही गएल रहल .  अऊर इसे उ बिल्कुले पाक साफ बच जात रहने अपने बाप    के नज़र मे.
फिर  तै  मिसिर  बाबा अऊर    रतन   दोनों  रजमतिया पै सोंटा और लात - घुसन    कै बौछार कई देहेनें. इधर रजमतिया छलिया प्रेमी के ठगल बस देखत रही गएल.
उपेन्द्र " उपेन " 

शुक्रवार, दिसंबर 31, 2010

नए साल की बधाइयाँ...


आप सभी मित्रों और शुभचिंतकों को नए साल के आगमन पर बधाइयाँ. आप सभी के लिये नव वर्ष सुख, समृद्धि, शांति, धन, वैभवदायक हो।
नव वर्ष-2011 की हार्दिक बधाई

कृष्ण कुमार यादव

चित्र साभार : वेबदुनिया